छत्‍तीसगढ़ी, छत्‍तीसगढ़ी चिल्‍लाने वाले भी छत्‍तीसगढ़ी पढ़ना नहीं चाहते

logoफेसबुक में छत्तीसगढ़ी, छत्तीसगढ़िया और छत्तीसगढ़ जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर हम आत्ममुग्ध हुए जा रहे हैं। इन शब्दों के सहारे हम अपनी छद्म अस्मिता से खिलवाड़ कर रहे हैं और अपनी पीठ खुद थपथपा रहे हैं। मुखपोथी में सक्रिय छत्तीसगढ़ी भाषा के योद्धा नंदकिशोर शुक्ल जी लगातार जिस बात को दोहराते रहे हैं यदि उनकी बातों को ध्यान में नहीं रखा गया तो यह निश्चित है कि हमारी फेसबुकाइ हुसियारी धरी रह जायेगी और आपके देखते-देखते ही छत्‍तीसगढ़ी नंदा जायेगी। उनका स्पष्ट कहना है कि छत्तीसगढ़ी भाषा को प्राथमिक पाठ्यक्रम में भी लागू किया जाए तभी छत्तीसगढ़ी भाषा बच पाएगी। फेसबुक में हो हल्ला करना मोदियापा है, चरदिनिया है, हम अति उत्साह से छत्तीसगढ़ी को खत्म करने पर उतारू है। विगत दिनों मुझे सुकवि बुधराम यादव जी का फोन आया था, मैंनें उन्‍हें बताया कि आपकी रचना ‘गांव कहां सोरियावत हे‘ के टेक्‍स्‍ट से ज्‍यादा वाईस पोस्‍ट पर ज्‍यादा क्लिक आ रहे हैं। तब उन्होंने बिना आश्‍चर्य के कहा कि धीरे-धीरे छत्तीसगढ़ी पढ़ने वालों की कमी होते जा रही है, लोगों को लगता है कि छत्तीसगढ़ी कठिन भाषा है, वे भले छत्तीसगढ़ी में बोल-चाल कर ले किंतु छत्तीसगढ़ी पढ़ने की उनकी प्रवृत्ति समाप्त होते जा रही है। उन्‍होंनें सकुचाते हुए कहा कि यह कह सकते हैं कि यह प्रवृत्ति विकसित ही नहीं हुई है। वाह, हम बड़े उत्साह के साथ छत्तीसगढ़ी छत्तीसगढ़ी चिल्लाते हैं किन्‍तु हम छत्तीसगढ़ी पढ़ ही नहीं पाते।

उनसे चर्चा के दौरान मैने सोशल मीडिया और इंटरनेट में पाठकों की आवाजाही, ब्लॉग और साइटों के सर्च इंजन ऑप्टिमाइजेशन पर मेरे निजी अध्ययन की बातों को शेयर किया। इंटरनेट में छत्तीसगढ़ी भाषा के प्लेटफार्मों के आ रहे पाठकों, उनकी रुचियों, उनके भौगोलिक क्षेत्रों, उनके डिवाइसों का अध्ययन मैं विगत कई सालों से लगातार कर रहा हूं। जिससे आधार पर मुझे भी प्रतीत होता है कि छत्तीसगढ़ी गानों और वीडियो पर सबसे ज्यादा क्लिक हो रहे है क्‍योंकि यह सहज है, सरल है उसे पढ़ना नहीं पड़ता। छत्तीसगढ़ी भाषा की वेबसाइट या ब्लॉग पर पाठकों की बेहद कमी है, इंटरनेट के पाठक उसे पढ़ना नहीं चाहते। जो गिने-चुने छत्तीसगढ़ी भाषा के ब्लॉग या वेबसाइट हैं उसमें वही लोग आते हैं जो रचनाकार हैं या स्‍वयं लेखन धर्मी हैं। उसमें से भी अधिकांश, सिर्फ अपनी रचनाएं पढ़ते हैं दूसरों की रचनाओं को पढ़ने का ज़हमत भी नहीं उठाते। इस लिहाज से आज भी छत्तीसगढ़ी इंटरनेट में पूरी तरीके से विपन्न भाषा है।

डिजिटल इंडिया में भी छत्तीसगढ़ी भाषा के जो थोड़े बहुत पाठक हैं वे समाचार पत्रों में निकल रहे परिशिष्ट के सहारे ही बचें हैं। इस प्रकार यह मान लिया जाए समाचार पत्रों के परिशिष्‍ठों में जो छप रहे हैं वही असल में छत्तीसगढ़ी के लेखक हैं। आयोग से भीख (आयोग के सचिव महोदय नें कई बार मंचों में कहा है कि, आयोग गरीब साहित्‍यकारों को पुस्‍तक छपवाने के लिए सहायता प्रदान करता है) में प्राप्‍त रूपयों से या अपनी गाढ़ी कमाई के हिस्‍से से प्रकाशित सर्वश्रेष्‍ठ किताब को भी सामान्य पाठक वर्ग नहीं मिलते क्‍योंकि वह महान साहित्य सहज रूप से उपलब्ध नहीं हो पाता जबकि समाचार पत्रों के परिशिष्टों से आपकी रचना सामान्य पाठक वर्ग तक सहजता से पहुंचती है।

इससे बेपरवाह, फेसबुक में छत्तीसगढ़ी के बाना संभालने वाले और छत्तीसगढ़ी पर बात करने वाले लाखों लोगों का हुजूम है। कई ग्रुप और कई पेज हैं जिसमें छत्तीसगढ़ी के लिए मरने-मारने पर उतारू युवाओं की भीड़ है। वे सिर्फ छत्तीसगढ़ी संस्कृति व लोक कला के फोटो और चार लाइनों के कमेंट को लाईक-शेयर करके उंगली कटा के शहीदों की सूची में नाम लिखवाने को उतारू हैं। फेसबुक के ये तथाकथित भेंड छत्तीसगढ़ी भाषा को पढ़ना ही नहीं चाहते, साहित्य का अध्ययन तो दूर की बात है। वे डिजिटल इंडिया में जी रहे हैं, कट-पेस्ट-शेयर सब सटा-सट, बिना देखे-पढ़े। शिक्षा में छत्‍तीसगढ़ी जब लागू होगा तब होगा, सबसे पहले हमें इन मोबाईल धारी जिनमें से कुछ बाप के पैसे से टेस मार रहे लोग भी हैं, को छत्तीसगढ़ी पढ़ने का अभ्यास कराना होगा तभी हम लोगों का छत्तीसगढ़ी छत्तीसगढ़ी चिल्लाना सार्थक होगा।

adsenceमैं इंटरनेट के तकनीकी मामलों थोड़ा बहुत दक्ष व्यक्ति हूं और अपने ब्‍लॉग व वेबसाइटों में पाठकों को लाने के हर संभव प्रयास करते रहता हूं। मेरे ब्लॉग आरंभ और साईट गुरतुर गोठ में आए पाठकों की संख्या आप नीचे दिए गए चित्र में स्पष्ट देख सकते हैं। यह मेरी दक्षता है या कहें इंटरनेट में भारत से इतर दूसरे देशों में निवासरत छत्‍तीसगढी भाषा प्रेमियों का कमाल है। छत्‍तीसगढ़ के अधिकाश मोबाईलधारी छत्‍तीसगढ़ी के दिखावटी प्रेमी फेसबुक से बाहर निकलना ही नहीं चाहते और फेसबुक में भी छत्‍तीसगढ़ी के दो लाईन से ज्‍यादा पढ़ना भी नहीं चाहते।
संजीव तिवारी

 

दोहा के रंग : दोहा संग्रह

छत्तीसगढ़ मा छन्द-जागरण

doha-ke-rangये जान के मन परसन होईस कि नवागढ़ (बेमेतरा) के कवि रमेश कुमार सिंह चौहान, दोहा छन्द ऊपर “दोहा के रंग” नाम के एक किताब छपवात हे। एखर पहिली रमेश चौहान जी के किताब “सुरता” जेमा छत्तीसगढ़ी कविता, गीत के अलावा कई बहुत अकन छंद के संग्रह हे, छप चुके हे. कुछ दिन पहिली ईंकर छत्तीसगढ़ी के कुण्डलिया छंद संग्रह ““आँखी रहिके अंधरा” के विमोचन घलो होय हे।
हमर देश के साहित्य अमर साहित्य आय. कई बछर पहिली गढ़े रचना मन ला आज भी हमन पढ़त औ गूनत हन. भक्ति रस, वीर रस, सिंगार रस, करुण रस, वात्सल्य रस जइसे जम्मो रस के समुन्दर समाय हे हमर तइहा के जमाना के साहित्य मा. जीये के रीत अउ सत चरित के नीत घला सिखाय हे हमर पुरखा कवि मन ह। वो जमाना मा छापाखाना के सुविधा नइ रहिस. फेर ऊँकर कविता मा गेयता रहिस. ये गेयता उनकर छंद के अनुसासन मा बंधे के कारन आइस ते पाय के ऊँकर कविता सुनइया मन के मन मा रच-बस के आज हमर तीर पहुँच सकिस. काव्य के अमरता बर अनुसासन जरुरी हे अउ अनुसासन बर छन्द जरुरी हे।
अब छत्तीसगढ़ के बात करे जाय त इहाँ घला बड़े-बड़े कवि मन जनम ले हे अउ अमर साहित्य के सिरजन करीन हे। इही साहित्य हमर थाती आय। मोर अपन जानकारी मा पण्डित सुन्दरलाल शर्मा के छन्द युग जनकवि कोदूराम “दलित” के युग तक बढ़िया चलिस तेखर बाद छन्द मा लिखे के चलन बिलकुल बंद तो नइ होइस फेर बहुते कमती होगे. पण्डित दानेश्वर शर्मा, लक्ष्मन मस्तुरिया, रघुवीर अग्रवाल पथिक, मुकुंद कौशल जइसे कवि मन छन्द विधा ला आज भी बचा के रखे हें। हमला इंकर साहित्य ला सुन के, गून के छत्तीसगढ़ी साहित्य ला अउ समरिध करे के उदिम करना चाही।
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कहानी : पछतावा

एक गाँव में एक झन बुधारू नाम के मनखे राहे ।वोहा बचपन से अलाल रहे।ओकर दाई ददा ह ओला इस्कूल जाय बर अब्बड़ जोजियाय ।त बुधारू ह अपन बस्ता ल धर के निकल जाय,अऊ चरवाहा टूरा मन संग बांटी भंवरा खेलत राहय।छुट्टी होय के बेरा में फेर बस्ता ल धरके अपन घर आ जाय ।
बुधारू ह जइसे – जइसे बाढ़त रिहिस ओकर आदत ह बिगड़त जात रिहिस ।वोहा अपन संगवारी मन संग लुका – लुका के बिड़ी अऊ गांजा पीये ।तम्बाकू अऊ गुटखा घलो खाय।कोई कोई लइका मन ह ओकर ददा ल घलो बताइस ।ओकर ददा ह बुधारू ल अपन आदत ल सुधारे खातिर बहुत समझाइस ।फेर बुधारू ह कहां सुधरने वाला हे ओकर तो आदत बिगड़गे रिहिस ।
अब बुधारू ह बिड़ी गांजा अऊ गुटखा खाय बर अपन घर से पइसा तक चोराय बर धर लिस।
काबर रोज रोज फोकट में कोन खवाही ।एक दू बार ओकर ददा ह पइसा काबर चोराथस कहिके दू चार राहपट मारे तक।त ओकर दाई ह लइका जात ए बाद में सुधर जाही कहिके छोड़ा देवे।
धीरे धीरे बुधारू ह जवान होगे फेर ओकर आदत ह नइ सुधरिस।अब तो वोहा बड़े चोरी करे ल धर लीस ।ओकर दाई ददा ह बुधारू के बिहाव कर दीस अऊ अपन डऊकी लइका ल पोस कहिके अलग बिलग कर दीस ।
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