छत्‍तीसगढ़ी भाषा के मानकीकरण

व्‍हाट्स एप ग्रुप जनभाषा छत्‍तीसगढ़ी म भाषा के मानकीकरण के गंभीर बातचीत 02 दिसम्‍बर ले 07 दिसम्‍बर 2015 तक चलिस। हम अपन पाठक मन बर ये चरचा ल इंहा प्रकाशित करत हन, आपो मन अपन बिचार देके छत्‍तीसगढ़ी भाषा के उन्‍नति म सहयोग देवव।

नरेन्‍द्र वर्मा : मानकीकरण काये  ? कोन- कोन भाषाविद्  छत्तीसगढ़ी म का-का पुस्तक लिखे हे ? येकर जानकारी होही ह बताहू उही मन ल पढ़ के देखहूँ ।

अरूण निगम : आदरणीय नरेंद्र भाई, नान्हेंपन ले जउन ला बोलत अउ सुनत आय हौं मोर बर यही मानक छत्तीसगढ़ी आय । नो स्टडी नो कन्फ्यूजन, मोर स्टडी मोर कन्फ्यूजन वाले सिद्धांत अपनाये ले भाषा के सहजता बने रहिथे ।ये मोर निजी विचार आय । मानकीकरण के बात चलथे तो मोला ये कन्फ्यूजन हो जाथे कि मानक शब्द का छत्तीसगढ़ी शब्द आय ? विद्वान मन ले निवेदन हे कि मोर कन्फ्यूजन बर कुछु समाधान होही त बताये के किरपा करिहीं ।

वैभव शिव पाण्‍डेय : जेन ल जइसे बोलथव वोला वइसे लिखव अउ पढ़व । मोर मानक छत्तीसगढ़ी इही आय, छत्तीसगढ़ी म मोर जइसे उच्चारन हावय उही लिख हव । आप वइसे ही लिखव गुरूजी

डॉ. सुधीर शर्मा : गजब बियाखया

नरेन्‍द्र वर्मा : कई घौं (घँव) अलग-अलग उच्चारन होथे तब सोंचे बर लागथे। पाण्डेय जी मोर तो जेन मन आथे लिखथँव फेर कभू-कभू जाने के मन लागथे.. सिरिब, सिरिफ मोर या लिखईया भर के उच्चारन  ले का होथे, डा साहेब 🙏🙏🙏🙏🙏 बढ़िया बियाखया

रामेश्‍वर वैश्‍णव : होथे भाई बहुत  कुछ होथे,अइसने मं मानकीकरण  होथे,एकक झन लिखइया ले फरक परथे फेर ये बियाखया का ए,एकर जघा ब्याख्या लिखे ले छत्तीसगढी ह हिन्दी लहुट जाही का? रा.वै.

सरला शर्मा : वैश्णव जी ! छत्तीसगढ़ी मं व शब्द तो हवय हमन व के जगह ब काबर लिखीन व्याख्या लिखे ले गलत हो जाही का ?

नरेन्‍द्र वर्मा : 😃😃😃😃😃 येकरे सेती पूछत रहेंव

शकुन्‍तला तरार : नरेंद्र भाई चलन दव अभी तक ले जइसे चलत हे, कान म फ्यूजन 😜😜😜

नरेन्‍द्र वर्मा : चलते रइही

अरूण निगम : कान म फ्यूजन 👌😃😃😃

अशोक तिवारी : अरे कैसनो लिखे लिखाए तो छत्तीसगढ़ी म ओहि काफी हे।

डॉ.अनिल भतपहरी : छत्तीसगढ़ी के 16 सरूप हे।3 कोस म पानी अउ 9 कोस म बानी बदल जथे। अब सासन प्रसासन के कारज कइसे होही। एक सब्द के अर्थ जइसे अंबिकापुर म होथे उही कांकेर म होना चाही ।इही हर मानकी करन आय। ये काम ल राजभासा आयोग ल करना चाही। फेर ये दिसा म आजतक काहीच नई हो पाय हे। जब रवि शंकर वि वि म छग म एम् ए खुलिस त राजभर के 100 विद्यार्थी पढ़े बर भरती होइस। अब अलग अलग ढंग से बोले लिखे म पेपर कइसे जाचे जाय काबर जचइय्या हर तो एके रकम के ल जानथे। फेर पढ़ोइय्या मन अपन अपन क्षेत्र के च्लाग्न के हिसाब से लिखही। तब मानकी करन के जरूरत महसूस करे गईस। हमन जतका प्ढ़ोईया रहेन 5 दिन ले बड़ उदिम करेन अउ काम चलाय के पुर्तिन जोखा करेन। रायपुर दुरुग   के भासा ल मानकीकरन के रूप म बउरे बर तको कहेन। काबर ये म्न्झोत अउ जादा झन के समझ मेंआथे।  अईसनेहेच उदिम बेरा बेरा म करे के लईक हे। तब हमर छग अउ पोठाही। जय छत्तीसगढ़ी।

सरला शर्मा : कोस कोस मं बदलय पानी ,चार कोस मं बानी ….। म तो बिलसपुरिहा अन जी ……😊😊

डॉ.अनिल भतपहरी : हा हा रायपुर दुरुग बिलासपुर के म्न्झोत म बिलासपुर ल तको मिन्झार ले भई ।काबर इहि मैदानी भाग म छत्तीसगढ़ी के जउन रूप हे वही सब जगा आसानी से समझे जा सकथे। हमर इही जोरहा कथन पहली से अब तक हावे। कई जगा तको समे अउ मौका मिलथे त कहिबेच करथन ।वि वि म यहीच बात ल राखे रहेन अउ येमा लगभग सहमती बने घलव रहिस।

डॉ.अनिल भतपहरी : कोस का धाप म पानी बदल जथे। फेर 3 के तिन गुना 9 कहें सेती “तीन कोस म पानी अउ नव कोस म बानी “कहें जाथे हमर डहन।

सरला शर्मा : अनिल भाई ! मोर इसारा ल ठीक समझे …हमर डहर ….इही तो सब बक्वाय के जरी आय …मानकीकरण के रस्ता के बाधा ..अभी सबो साहित्यकार लिखत चलीन ….धीरे धीरे भाषा फरि यात जाही काबर के चारों मुड़ा के लेखक एक दूसर ल पढ़हीं जंजीन ,समझही त जउन हर जादा उचित अउ सम्प्रेषणीय शब्द होही तेला अपनहीँ … । जानहीं

डॉ.अनिल भतपहरी : सिरतोन ……फेर मानकीकरन घलाव खच्चित जरूरी हवय। हिंदी आज ले सहजता पूर्वक सर्वग्राह्य नइये। पहली जोन आमिर खुसरो  के रंग में रंगे हिन्दुई पना रहिस आज धीरे धीरे संस्कृत निष्ठ हो गय। प्रेमचन्द जनेंद्र  मंटो इस्मत चुगतई राजेन्द्र यादव  मैथिलिशरण अज्ञेय मुक्तिबोध ले बिचक के आजकल जन से विमुख होत चले जात हे।अइसने झन हो जय येखरो जोखा मढ़ाय ल परही। भाषा सहज सरल होय ओला समझे अउ समझाय बर कोन्हो के जरूरत झन परय या कम परय। जइसे कानून बने हे जनता बर फेर जनता ल समझाय बर बीच म वकील हे। ओइस्ने भासा ल समझे बर कोन्हो  वकील लगाय के जरूरत झन परय।

सरला शर्मा : वकील के तो नहीं फेर गुरूजी के जरूरत  हमेसा रहिही …आप तो खुदे शिक्षा से जुड़े हव ।

डॉ.अनिल भतपहरी : जेन भासा हर समझ में नई आय ओहर सोसन करे के हथियार कस बउरे जाथे। सहर के सिन्धी मरवाड़ी दुकान म जाके देख कइसे लुटे जाथे। आजकल दुकानेच भर नई कई जगा पर  प्रान्तिक बैपारी मन के अपन भासा म गिट पिट सिट पिट करके लुटाई चल्तेच हे। गुरुजी तो प्ढ़ोईया बर रहिबे करही ।मानकी करण म अतका कठिन झन होय कि वकील सरीख भासा ल समझइय्या के जरूरत झन परे।हमर कहें के मतलब यही समझे जाय।

रामेश्‍वर वैश्‍णव : बहिनी सरला जी,हर भाखा केएक सुभाव होथे ओहर खुदे अपन रस्ता बना लेथे, आप ला कोन बोल दिस कि छत्तीसगढी मं व होथे,असल मं देवनागरी मं होथे जइसे उर्दू  मं बाम्हण ला बिरहमन कहिथें ओइसने छत्तीसगढी मं ब्याख्या ह जादा ठीक लगही।रा.वै.

शकुन्‍तला तरार : होली हांडा कितरो के मानकीकरण करासे जाले-शकुंतला तरार

सरला शर्मा : ठीक कहत हव वैष्णव जी …फेर हमन  खाथव , आवव  मं तो व के प्रयोग करथन , मोला जादा जानकारी नइये । शकुन ,लिखे ठीक हस एहर हल्बी  आय छत्तीसगढ़ी के रूप फेर हमर असन मन तो  गोडी मुड़ी नई समझे सकन …

कामेश्‍वर पाण्‍डेय : कई झन संगी मन के ए मत ल जान के अचरज होइस के मानकीकरण के कउनो जरूरत नइ ए। वाचिक भाखा के मानकीकरण तो खैर संभव नइ ए। कहुँच भाखा म नइ ए फेर लिखित भाखा ल तो मानक होनेच चाही। लेखन म भाखा के एकरूपता के महत्व ल कोन इन्कार कर सकत हे। ज्ञान के नाना अनुशासन के भाखा बर पारिभाषिक शब्दावली के बिना काम नइ चल सकै। भाखा के मानकीकरण के दू स्तर हे। पहिली तो वर्ण अउ पद के मनकीकरण जरूरी हे। जइसे श स व ण ज्ञ श्र क्ष आदि वर्ण ल अपनाए जाए के नहीं? दूसर रूप के मानकीकरण जेमा आहू-आहा; आवव-आवा जइसे प्रयोग म ले एक ठन ल ठउकाए बर परही। वर्ण अउ पद के मानकीकरण बर जादा झंझट नइ होना चाही। ए काम ल राजभाषा आयोग हर तुरते कर सकत हे। बशर्ते आयोग के कर्ता-धर्ता मन ए दिशा म सोच सकैं अउ कछू ठोस काम करे के मन बनावैं। डॉ रमेशचंद्र मेहरोत्रा जी वर्ण अउ पद के मानकता ल ठउका गए हें। ओकरेच पालन कर लेहे जाए त बहुत-कुछ मानकता कोती बढ़ जाबो। रूप के मानकता बर थोरकन विवाद हो सकत हे। कउन-कउन क्षेत्र के रूप ल अपनाए जाए अउ काला छोड़े जाए एमा अलग-अलग मत हो सकत हे। काबर; एमा बोलइया मन के भावना हर जुड़े हे। एकर बर राजभाखा आयोग ल चाही के सबो क्षेत्र के भाषाविद मन ल जोर के रूप ल ठउकाए के काम ल सॅंउपै। लेकिन ओहर फकत कवि-सम्मेलनी मूड से ले उबरही अउ योग्य आदमी मन उहॉं पहुॅंचही तभे ए काम हर बन सकत हे। डॉ.भतपहरी कहत रहिन रायपुर-दुर्ग के भाखा ल मानक मान लेहे जाए। सरला दीदी एमा आपत्ति करे कस करिन त कहिन बिलासोपुर ल शामिल कर लेहे जाए। कल आने क्षेत्र के मन आपत्ति करहीं त का ओहू मन ल शामिल करहीं। फेर तो होगे मानकीकरण। एला अतेक हलका ढडडढंग से लेहे म काम नइ चलै। मोर दुनो उपन्यास बिलासपुर अउ जॉंजगीर क्षेत्र के भाखा रूप हे लेकिन आप मन के साथ गोठियाए बर मैं हर ‘जावा’ के जघा म रइपुरिहा ‘जावव’ के प्रयोग करे के कोशिश करथौं। लेकिन एक झन के करे भाखा के रूप हर मानक नइ बनै। एकर बर हमर भाखा विद मन ल जुर-मिल के बइठे बर परही अउ मानक रूप बर एकमत होए बर परही। लेकिन ए उदीम ल तो आयोगेच ल उठाए बर परही। ए दिशा म आयोग हर कउन-कउन ठोस काम करे हे कहूं बताए सकहीं?

सुधा वर्मा : यमा दू मत नईये के राजधानी के भासा मानक होथे ।तब हमन ल रायपुर दुरुग के भासा ल मानक माने ले परही ।ये विचार ल भुलाके एती औती के सोचत हावंय

संजीव तिवारी: बहुत सुग्घर अउ गुने के गोठ चलत हे, बड़े भाई अउ बहिनी मन ल पैलगी।

रामेश्‍वर वैश्‍णव : आवा अउ आवव, छत्तीसगढी के आदरसूचक  शब्द आय आवा एकबचन ए अउ आवव बहुबचन।जइसे तूं आवा अउ तूंमन आवव। रायपुरअउ दुर्ग केछत्तीसगढी मं एकर अभाव ह। हर क्षेत्र  के एप्रोप्रिएट शब्द ला अपनाय ले मानकीकरण  के काम सरल हो जाही।रा.वै.

सुधा वर्मा : हाँ

शकुन्‍तला तरार : ठीक बात

सरला शर्मा : माई के कोंख ,कोहार के आवा …कहिथें …ए मेरन भी तो व शब्द आये हे ….। कामेश्वर भाई के विचार ऊपर भी धियान देना परही । सबले पहिली तो वर्णमाला चाही , शब्द , कारक चिन्ह , पारी पारी आघू

बढ़े बर परही ।

वैभव शिव पाण्‍डेय : आवा अउ आवव आवा मानक रूप सही हे। आवब कहिथे। आवब तब बताबो । व अउ ब के परयोग त अउ थ के परयोग दूनो के होथे । फेर आने आने सब्द संग मानकीकरन बर ठाड़े छत्तीसगढ़ी के सब्द सबले सही हे।

सरला शर्मा : अरे ददा रे !  ये ठाढ़े छत्तीसगढ़ी काला कहिथें जी ?

वैभव शिव पाण्‍डेय : जेमा लय नइ रहय लहर नइ रहय । बिलासपुर रायगढ़ सरायपाली कस मिठास कम रहिथे । ठाड़े छत्तीसगढ़ी रइपुर राज के भांखा हरय

सरला शर्मा : 2 …4 .ठन शब्द नहीं त वाक्य लिखते त जल्दी समझ मं आतिस भाई ….बिनती ए …।

वैभव शिव पाण्‍डेय : लिखें अउ पढ़े म रइपुर राज के छत्तीसगढ़ी ह जादा सहज हे

रामेश्‍वर वैश्‍णव : मैं ये नइ बोले हंव कि छत्तीसगढी मं व नइ होवय हां छत्तीसगढीलिपि मं व शब्द नइ रहिस, ओमांसिरिफ छत्तीस शब्द हावय फेर जब हम देवनागरी लिपि अपनाय हंन त व लेना उचित  हे बस दूसर भाषा  के शब्द लेहे के बखत छत्तीसगढी केसुभाव ला ध्यान  मं रखना हे, भइगे। रा.वै.

वैभव शिव पाण्‍डेय : रइपुर- तोला पूछत रहिस, बिलासपुर- तोका पूछत रहिन, रायगढ़- तुहला पूछत रहिन। मैं जेन सुनेव तेला लिखव हव, सुधार हो सकत हे।

नरेन्‍द्र वर्मा : मोर एक ठन निवेदन रहिस कोन-कोन भाषाविद्  छत्तीसगढ़ी म का-का पुस्तक लिखे हे ? येकर जानकारी होही ह बताहू। मोर

सरला शर्मा : नेट मं उपलब्ध हे । सुधीर शर्मा के वैभव प्रकाशन मं। लइका मन ल पढ़ाये बर विशेषकरके व्याकरण बर मनगत रवीन्द्र के पुस्तक उपयोगी हे । एहर मोर विचार आय काबर के मैं मनगत रवीन्द्र के पुस्तक ल पढ़े हंव ….। मंगत रवीन्द्र ….पढ़े जाय 🙏

संजीव खुदशाह : बेलासपूर सही है ✔✔🙏

सरला शर्मा : नहीं … बेलासा के नगरी नोहय ..बिलासा के नगरी आय ते पाय के बिलासपुर सही हे …

अशोक तिवारी : पर मै ओ कोती के मनखे मन ल बेलासपुर अउ ब्लासपुर घला काहत सुने हवव

सरला शर्मा : आपके सुनना सही हे ..पर एहर उच्चारण भिन्नता आय   .कोनो कोनो मन छाता ल साता कहिथें ..।

शकुन्‍तला तरार : भिन्ने भिन्ने मति भिन्ना, देहात के मन बिलासा ल का जानहीं, तभे बेलासा कही देथें

वैभव शिव पाण्‍डेय : हम सब देहात ले आथन मैं निच्चट देहाती आव, मोर ये चिन्हारी कभू झिन मिटावय

अशोक तिवारी : अब देहाती अउ सहराती के भेद होये लागिस।हमन जम्मो झन गवांई के आन।मोला तो डर लागथे कोनो छत्तीसगढ़ी ल घलाय देहाती मन भासा आय झन केहे लागय

कामेश्‍वर पाण्‍डेय : सुधा दीदी राजधानी के भाषा के मानक होए के मतैक्य ल कहॉं मेर पाया? ए हर राजधानी म रहइया मन के एकाधिकार ए का? त तो बाकी जघा म पहरो ले आवत भाखा रूप मन अकारथे जाही। ए बात सही हे के मानकीकरण बर सबो रूप मन  थोर-बहुत त्याग करे बर परही लेकिन लेहे-छोड़े के काम हर सबो रूप के बोलइया भाषाविद मन के विमर्श अउ सहमति ले होना ठीक रइही।

वैष्णव जी हमर इहॉं एकवचन बर आ अउ बहुवचन-आदरसूचक बर आवा चलथे। इहॉं एकवचन बर आवा कहिबो त कन्फ्यूजन हो जाही। ओइसे लिखित म आवव हर बहुत चलागन म आ गए हे त अही ल चले देना चाही। लेकिन अा के जघा अावा बर बिचार करना जरूरी हे।

छत्तीसगढ़ी म शब्द के प्रथम अक्षर व हर ब हो जाथे। जइसे बियंग। ए हर देसज बोली के प्रभाव ए। मोर परभाव लिखे के मन होवत हे। लकिन कृति; कार्यक्रम; श्रेष्ठ; क्रम जइसन शब्द मन ल लिखना समस्या हो जाही। मोला लगथे संयुक्ताक्षर मन ल प्रवेश देहेच बर परही। खड़ी बोली घलउ हर परिष्कृत होए के बाद मानक रूप ल पाइस। एकर बर श ष ण श्र उवा मन ल अपनाए बर परही।

सरला शर्मा : मैं कामेश्वर भाई से सहमत हंव । मोर तो विचार हे देवनागरी लिपि ल अपनाये हन त देवनागरी के वर्ण ल काबर नहीं ?आखिर  अंग्रेजी के गिनती ल अपनाये च हन आजकल  1 2 3 लिखथन न …अभी 28 नवम्बर के आयोग के कार्यक्रम मं भी मैं अपन विचार रखे रहेंव । होवत ये हे के बहुते जोगी मठे उजार ….।  त लिखे काबर हस बाबू ?

सुधा वर्मा : उच्चारण म अंतर हावय न। क्इसे अपनाबो

शकुन्‍तला तरार : मोर कहे के मतलब गँवई गाँव के उच्चारन म  अउ सहर वाले मन के फरक

सुधा वर्मा : छत्तीसगढ़ी सब्द म जातीगत भिन्नता हावय उच्चारण म।ओला ही ठीक करना हे ।मजदूर वर्ग सब्द ल बिगाड़ के बोलथें या फेर उच्चारण नई कर संकंय

डॉ.संध्‍या रानी शुक्‍ल : सुधा दीदी ठीक कहत हावंय उच्चारण नई कर सकय तेकर सेति बिगाड़ के बोलथे हमन बेलासपुर नही बिलास पुर बोलबो टाइम ल मजदूर मन टेम कहिथे त हमन वइसन थोड़े बोलबो

सुधा वर्मा : बिल्कुल, मोर घर म ज्इसना मै बोलथंव व्इसने छत्तीसगढ़ी बोलत रहिन हे ।तोर घर संध्या दादा जी के छत्तीसगढ़ी अइसन रहिस हे नहीं ? बाम्हन पारा  तात्यापारा बनिया पारास।पुरानी बस्त म अइसने बोलथन

वैभव शिव पाण्‍डेय : टेम बोले जा सकत हे नइ तो बेरा बने हे

सुधा वर्मा : बेरा ही ठीक हे टेम तो अंग्रेज के देन हे

डॉ.संध्‍या रानी शुक्‍ल : हाँ अंग्रेजी के बिगड़े रुप हरे हाँ दादा  जी के छत्तीसगढ़ी अइसने रहिस

सुधा वर्मा : अब ये मन सब्द ल बिगाड़ बिगाड के मोरो छत्तीसगढ़ी ल बिगाड़ डारे हें समझ ले बाहिर होगे छत्तीसगढ़ी ह

अशोक तिवारी : बहस में उलझे सबो भाई बहिनी मन सो मोर बिनती हे के अपन घर म छत्तीसगढ़ी माँ गोठियाये के सुरुआत करय अउ नहीं तो ये सब फोकट के बहस कहाही।अपन ऊपर कंट्रोल करे बर नियम बना लें के  जतका वाक्य आने भासा म घर म बोलही ओतका घव एकक रुपिया एक ठन डब्बा म डारत जाहि अउ ए ला पाछु भासा के बिकास बर काम म लाये जाहि।

संजीव तिवारी: सिरतोन कहे भईया, अड़बड़ पइसा सकलाही! मानकीकरन एसनेहे जादा ले जादा भाखा के प्रयोग अउ सबद ऊपर गोठ बात के उदीम ले होही। कोनो बइठका, कार्यक्रम, कार्यशाला ले उदुक ले नई हो जाय, रामेश्वर भैया जइसे कहिन के ये ह लंबा चलथे अउ धीरे धीरे सही सब्द खांचा म बइठत जाही

डॉ.अनिल भतपहरी : एंडराइड चलइय्या मन के घर कतका छत्तीसगढ़ी के शब्द बोले जाथे ?सउक से नाती पोता कना छग गुठियात सियान दई -ददा ल डपट देथे -“बच्चों को बिगाड़ रहें हो चुप रहों …त ये हाल हे हमर छग भासी मन के !अब का करे जाय?

वैभव शिव पाण्‍डेय : तुरते-ताही करव सुरवात, तोर घरे साग मोर घर दार-भात

संजीव तिवारी: अब लोगन छत्तीसगढ़ी म गोठियाये लागे हें फेर लइका मन मेर अभी घलव हिन्दी बोलथें

अशोक तिवारी : ओहि ल सुधारे के ज़रूरत हे

वैभव शिव पाण्‍डेय : सुन ग सियान सुन जी लइका, बोलव छत्तीसगढ़ी खोलव राचर-फइका

नरेन्‍द्र वर्मा : आप सब झन ल🙏🙏🙏🙏

सुधा वर्मा : मै छत्तीसगढ़ी सुने रहेंव मोर माँ बोलत रहिस हे ।हमर घर म हमन हिंदी बो.त रहेन  बिहाव के बाद छत्तीसगढ़ी बोलेव काबर के मोर ससुरार म कोनो हिंदी नई बोलत रहिन हे । मोर बर बोले गीस के जब छत्तीसगढ़ी बोलही तभे बोलना नई ते बात मत करव ।ये हमर जेठ के फरमान रहीस हे ।बस मै बोले बर शुरू करेंव अउ सीख के बनके चंदैनी उपन्यास लिख डारेंव काबर के बोलव अउ लिखंव ।पर चार महिना मे होगे ।हमन छत्तीसगढ़ी घर म नई बोलन पता चलथे ।मै अपन बेटा साथ कभू छत्तीसगढ़ी बोले नईअंव फेर पहू ह छत्तीसगढ़ी लिखथे अउ बाहिर म दोस्त मन संग बोलथे ।

नरेन्‍द्र वर्मा : कहूँ अइसनहे चर्चा सरलग चलही त  मानकीकरण बर कोनो भाषाविद् के रद्दा देखे ल। कहूँ अइसनहे चर्चा सरलग चलही त  मानकीकरण बर कोनो भाषाविद् के रद्दा देखे ल नइ परही तइसे लागत हे

अशोक तिवारी : नई परही

नरेन्‍द्र वर्मा : सिरतोन 🙏🙏🙏🙏🙏

अशोक तिवारी : ज़रूरत घला नई आय।रैगढ़िया ल रैपुरिहा बोले बर मज़बूर करना या ऐसानीहे कुछ करे के का मतलब

सुधा वर्मा : बिल्कुल ये मन नईमकरय हमन कर डारबो ।संध्या ल जिम्मेदारी देय जाये पूरा नोट करे जाय ।व्हाट्स आप के उपलब्धि

सुधा वर्मा : अशोक भाई ये मजबूरी नहीं मानक आय ।येला अलगसनजर ले देखना चाही जेन जगह म हमन जाथन तिंहा कै भाषा ल सिखथन

अशोक तिवारी : मोला एमा खतरा दिखत हे

सुधा वर्मा : कोई खतरा नईये ।दूसर भासा सिखे ले अपन भासा नई भुलावंय ।ये तो एके भासा आय ।कुछ  सब्द के फेर रहिही ।

नरेन्‍द्र वर्मा : नई करे जा सकय फेर लिखे म एकरूपता होना जरुरी हे।  कहाँ कोन से शब्द ला कइसे लिखना हे। ये

सुधा वर्मा : भासा पढ़ही त मानक होही रयपुर ल ।बोले बर सब छत्तीसगढ़ी

अशोक तिवारी : ओ बेरा,ओ समे, ओबखत,ओ टाइम,ल ओ खानी कहाँ कथे तेला कतका झन जनथें।

नरेन्‍द्र वर्मा : इही तो मानकीकरण ये। जेला दू चार झन बइठ के तय करे के प्रयास करही त कोन मानही

सुधा वर्मा : बनाये के बाद परिक्षण होही ।बनही एक महिना म अउ परिक्षण होही एक साल म 😄😄😄😄😄

अशोक तिवारी : रइपुर ह रायपुर होंगे, रहाउद ह राहौद अउ गंडई होंगे गंढइ ह।एही सायद मानकीकरण होही न के हम जउन काहत हान तउन हर ही ठीक हे अउ अगर तैँ नई जानत  अस त लेड़गा अस।

डॉ.अनिल भतपहरी : नवा रइपुर कहें म का के लाज  हे ?जब कलकत्ता हर कोलकाता होगे मद्रास हर चेन्नई अउ बेंगलोर ल बेंगलुरु त “नवा रइपुर “कहें म का के   कनउर रे भई!

नरेन्‍द्र वर्मा : 😃😃😃😃😃

डॉ.अनिल भतपहरी : बाम्बे हर मुम्बई त एक समे आही जब इहचो अइसने हे करे बर उमयाही !

वैभव शिव पाण्‍डेय : नवा रइपुर ही सही हे

डॉ.अनिल भतपहरी : जय छत्तीसगढ़

अरूण निगम : जय छत्तीसगढ़ 🙏🙏🙏🙏🙏

शकुन्‍तला तरार : शुगर के देसी दवई ल एक घांव फेर देहु कोनो त किरपा होतिस

अशोक तिवारी : आज मानकीकरण वाले मन कहाँ नन्दा गें।मोला लागथे के कहूँ मानकीकरण हो जाहि त मनखे जउन ल बोलथे तेला धीरे धीरे छोड़त जाहिं अऊ ultimately का होही ओ शब्द के विलोप जेला रोकना जादा ज़रूरी हे बनिस्बत ओला ख़त्म करे बर् मार्ग प्रसस्त करे के।

कामेश्‍वर पाण्‍डेय : मानकीकरन वाले मन कभू नइ नॅंदावैं। काबर; लिखित भाखा बर मानकता हर पहिली शर्त ए। मानक होए बिना छत्तीसगढ़ी ल संविधान के अष्टम अनुसूची म कभू जघा नइ मिल सकै। अतेक महत्व के मुद्दा ऊपर चर्चा होइस त कहूॅं के मूड़ पिरा गे; कहूॅं कंझा के नामाकूल चुटकुला सुना डारिन; कहूॅं अतेक कल्ला गए हें; मानकीकरन वाला मन के नॅंदाए बर सॅंउर डारिन। मोला पीरा के संगे-संग लाजो लगत हे। दूसर भाखा के मन हमर ए किसम के चर्चा ल अगर सुन पारहीं त हमर ऊपर हॉंसे बिना नइ रहैं। हमन ल उछलू बुद्धि के आदमी समझहीं। सब ले बढ़िया छत्तीसगढ़िया भोंदू।

डॉ. सुधीर शर्मा : मय तो रोथंव कका

डॉ.अनिल भतपहरी : अब रोय गाय हासे म काम नी चलय भलुक गहिर गुनान अउ कारज करे ल परही।

शकुन्‍तला तरार : सुधीर 😫😫😫

डॉ.अनिल भतपहरी : काबर देखते देखत 16 साल होगे कब तक ले नदानी चलही? अउ सियानी ल कब तब बिराने मन करते रही!

शकुन्‍तला तरार : झन रो गा ए बात ल तो आयोग ल सोचना हे। बनाए काबर जाथे दू अघ्यक्ष मन का करीन

डॉ. सुधीर शर्मा : मोटरा ले के मोटर चघिन

शकुन्‍तला तरार : हाथ गोड़ चले नहीं मंच म दूसर मन हाथ धर के चघाही फेर साद गए नइये

डॉ.अनिल भतपहरी : तीरथ बरत बर कि अउ काही कछु बर ….मोटर चघिन

डॉ. सुधीर शर्मा : सुसु करे हर घलो लेगे ल परे

शकुन्‍तला तरार : 😜😜😜

डॉ. सुधीर शर्मा : सरकार जानबूझ के करथे ताकि कुछु बूता मत होय। आपस म लड मरय। मगन रहे।

अऊ हवन

शकुन्‍तला तरार : कहाँ के तिरत बरत जांगर चलही त तो लाल बत्ती अनिल दाऊ

डॉ. सुधीर शर्मा : अब तोला बनवाबो

शकुन्‍तला तरार : काबर लड़बो हमन, सूत  न कपास

डॉ. सुधीर शर्मा : भाई बहिनी म पटकी पटका

शकुन्‍तला तरार : कभू हो नई सके, मैं तोर विद्वता के  सनमान करथंव

डॉ.अनिल भतपहरी : 💐✌💐, हमू हर

शकुन्‍तला तरार : आज जादा चुरपुर होगे का मोर बात

डॉ. सुधीर शर्मा : मय अभी सीखत हंव , नहीं बने हे

शकुन्‍तला तरार : भाषाविद् अस भाई

डॉ. सुधीर शर्मा : दूसर मन के सांझ ल कार मतावत हस बहिनी । अइसन मोर बर सब खार खाय हे। जात हंव बरात जाना हवय

शकुन्‍तला तरार : डॉ अइसने बनथे का बिन पढ़े

सरला शर्मा : जेमन जादा सोचे समझे नई सकय ,विद्या बुद्धि कम रहिथे तंनमन के मूड पिरवाय होबे करही जी काबर के मानकीकरण हर बड़ गहन गम्भीर बात आय । कामेश्वर भाई ! माफी दे दे जी ….

कामेश्‍वर पाण्‍डेय : 🙏🙏🙏 अउ लजलजवा झन दीदी!

अशोक तिवारी : हम जउन बोल्थन तउन ही हर हमर बर मानक आय अउ ए बात सबोझन के भावना होही।सबो उम्मीद राखथि के ओखर बोलाई संग कोनो छेड़छाड़ झन होवय।अउ बिद्वान मन से अपेक्षा हे के ओ मन ए भावनात्मक पक्ष ल घला धियान म राखहीं।

नरेन्‍द्र वर्मा : आयोग ह जइसने मानकीकरण करही वोला सब मानही का ? आयोग के बुता देख के लागथे मानकीकरण अभी करही का ?

सरला शर्मा : डॉ . सुधीर शर्मा असन विद्वान ,महाविद्यालय मं भाषा विज्ञानं के प्रोफेसर चुप हे त जरूर कोई बात हे ..चिटिक धीर धरिन आयोग एक्के झन ए काम नई करे सकय , प्रशासन ,शिक्षा विभाग ,संस्कृति अउ साहित्य के जानकर सबो के सहयोग चाही , सेतुबन्ध बांधे मं तो गिलहरी घलाय के मेहनत जुड़े रहिस ।

नरेन्‍द्र वर्मा : 🙏🙏🙏🙏🙏

संजीव तिवारी: आयोग कहूँ मानकीकरन करही त डॉ. सुधीर शर्मा भईया जइसे भाषाविद् संग संस्कृतविद् आयोग म चाही, पूरा दायित्व अउ अधिकार सहित। तभे भाषा के आत्मा बांच पाही, प्रयोजनमूलक भाषा ल पहिली ढिले ल परही जउन आयोग के शब्दकोश के प्रकाशन ले सुरु होये रहिस हे। एखर ले सरकारी कार्यालय मन म भाषा के प्रयोग सुरु हो जाही अउ गैर छत्तीसगढ़िया मन घलो बोले के उदीम करे लागहिं। मानकीकरन एक प्रकार ले साहित्य के हंटर आय, शिष्ट अउ लोक साहित्य के अंतर हमेशा बने रहीही, एला कउनो हंटर काबू नई कर सके। मोर मति म आयोग ल साहित्य बर भाषा के स्थापना म मुड़ धुनाइ के बल्दा भाषा के अधिकाधिक प्रयोग, खासकर सरकारी काम काज म चालू कराना हे। रहिस बात सुधीर भईया ले लोगन के खार खाये के तो मोर जानकारी अउ अनुभव म ये ग्रुप के हर सदस्य सुधीर भईया के सम्मान करथे अउ मया करथे ये अलग बात हे के सब के तरीका अलग हो सकत हे।

डॉ.संध्‍या रानी शुक्‍ल : आज से५,६साल पहिली छत्तीसगढ़ी अंग्रेज़ी हिंदी शब्दकोश ल राज्य शैक्षिक अनुसंधान अऊ प्रशिक्षण परिषद हर बनवाइस तेकर पीछू संस्कृत मंडलम् हर घलोक ओहि शब्द मनके संस्कृत शब्द बनवाये हावय जेमा संस्कृत के जानकार डां नन्हे प्रसाद द्विवेदी, डां सुरेश शर्मा, डां संध्यारानी शुक्ला, डां कादम्बरी शर्मा डां विद्या वती चन्द्राकर, डां कल्पना द्विवेदी मिलके बनाये हावय मानकीकरण के बेरा एकर से सहयोग मिल सकत है मानकी करण मा एक संस्कृत के विद्वान जेन छत्तीसगढ़ी भी जानय उन्कर होना जरूरी है अइसे मोर विचार है संजीव भाई से मै सहमत हव

शकुन्‍तला तरार : 16 बछर होगे  अभी अउ धीर धरना हे

नरेन्‍द्र वर्मा : संजीव भाई 🙏🙏🙏 मैं तो अनुभव करे हँव राजभाषा के कोनो काम सुधीर भाई बिन होबे नई करय । मानकीकरण के काम राजभाषा ह डाॅ सुधीर बिना कर सकही मोला नई लागय।

संजीव तिवारी: त कइसे करबे बहिनी, काखरो मुरुवा धर के तो काम नई कराये जा सके। 16 का 66 बछर हो जाय

शकुन्‍तला तरार : चापलूसी के हद पर होगे संजीव  भाई, पार, सुधीर का जिनगी भर संयोजन करत रही, ओला कब ओखर अधिकार मिलही

संजीव तिवारी: मैं सुधीर भईया जइसे कहेंव

नरेन्‍द्र वर्मा : 😃😃😃😃😃

संजीव तिवारी: मैं चिल्हराच् सहीं

नरेन्‍द्र वर्मा : अभी उमर कमती हे

शकुन्‍तला तरार : अउ मैं सुधीर कहेंव  50 बछर कमती नई होवय

नरेन्‍द्र वर्मा : लाईन लंबा हे

वैभव शिव पाण्‍डेय : बिन पानी नागर जोतागे, छत्तीसगढ़ी म सब बोहागे

शकुन्‍तला तरार : त लगव न  लाइन म भाई हो ए तो बने बात हर ए

संजीव तिवारी: आयोग जब तक साहित्यकार के निसेनी ले चढ़े के उदीम करत रही एसनेहे होही

शकुन्‍तला तरार : वैभव✋✋✋

वैभव शिव पाण्‍डेय : बुताय कंडिल ल बार दव जी, लाइन वाला मन के हाँका पार दव जी

शकुन्‍तला तरार : भईगे जावत हों कईयो झिन आज मोल तरेरत होहीं

संजीव तिवारी: विश्वविद्यालय अउ शैक्षणिक अनुसन्धान परिसद तको छत्तीसगढ़ी भाषा ऊपर काम कर सकत हे

शकुन्‍तला तरार : सकत हे करही का

वैभव शिव पाण्‍डेय : आयोग अंधियारी रात म अंजोर होवत हे हिंदी म कामकाज अउ छत्तीसगढ़ी के सोर होवत हे

संजीव तिवारी: कोनो नंदकुमार जइसे IAS के जरुरत हे

वैभव शिव पाण्‍डेय : आईएएस के नही अंतस ले परयास के जरुरत हे

वैभव शिव पाण्‍डेय : मन भर से आयोग वाला मन लगे नइहे , संस्कृति बिभाग घलोक काही करे नइहे

नरेन्‍द्र वर्मा : जब तक अपन ढपली अपन राग चलही इही हाल रइही। सब झनके सहयोग ले ही काम हो सकत हे। का मानकीकरण बिन काम नई चलत हे ? चलत हे चलत रइही। बड़े बात ये हे हम अपन काम करत रहन। तैं का करेस सुने ल झन परय।

वैभव शिव पाण्‍डेय : दे ह बात के बड़े बात हे, अपन हाथ ही कुछ् बात हे

शकुन्‍तला तरार : बिना कोनो पद पाये नरेंद्र भाई निस्वार्थ छत्तीसगढ़ के पुस्तक अउ लेखक सूचि बनाए हे कमती बात नोहय

वैभव शिव पाण्‍डेय : 🙏

नरेन्‍द्र वर्मा : हमन आपस म गोठियावत हन इहू म मानकीकरण होवत जात हे।

सरला शर्मा : सुधीर ओ दिन कहे रहिस के हमला जुर मिल के काम करना हे ,अलग अलग दिसा मं दौड़बो त थक मरबो ..हमन ल एक झन जोरईया चाही ओहू बहुभाषी होही तभे छत्तीसगढ़ी अउ आने भाषा मन के तुलनामुलक अध्ययन वाला होवय  तभे बात बनही ।

अशोक तिवारी : मानकी करण के चक्कर छोड़ के मन के करन तव ठीक होही

शकुन्‍तला तरार : अपनी ढपली। अपना राग

सरला शर्मा : ठीक कहेव भाई ,बहिनी मन फेर हम तो अपने च लिखे ल पढ़थन आने कोनो काय

लिखत हैं जाने के कोसिस करबे नई करन त कइसे नवा विचार ,नवा शब्द ल जानबो ।

नरेन्‍द्र वर्मा : दूसर के, भाषाविद् के बात छोड़व। हमन तय कर लन कि बीच बीच में कुछ शब्द उपर चर्चा करके  वोला कइसे लिखा जाय ये तय करत चलबोन।

सरला शर्मा : सुग्घर विचार नरेंद्र भाई ।

सुधा वर्मा : भाषाविद् के बिना मानकी करण नई हैवय

शकुन्‍तला तरार : एदे अभी आवत हे सुते के बेरा सुधा हर

सुधा वर्मा : शादी मे गे रहेंव आके पढ़े हंव तब लिख देव 😄😄, काली भी नई राहंव

शकुन्‍तला तरार : चल कोनो बात नई कभू कभू दूध भात

सुधा वर्मा : हाँ

सरला शर्मा : हाजरी रजिस्टर होना चाही ,कोन कय बजे आईस ,कोन आबे नई करिस पता चलही ..।.।

सुधा वर्मा : तै रख ले दीदी इही ठीक हे

सरला शर्मा : अरे नहीं ! एडमिन साहेब के जिम्मेदारी मं रजिस्टर रहिही त फर्जी हाजरी , संगी जवरिहा के मितानी ले बांचत बनही ।

शकुन्‍तला तरार : सरला दी हमर  आज के उपस्थिति दर्ज होगे

सरला शर्मा : बिहनिया बेरा के होंगे …संझा बेरा के अलग … थोरकुन एडमिन साहेब ,सुहबा  मन ल डराये मं बनथे …।

कामेश्‍वर पाण्‍डेय : मैं भाषाविद तो नोहौं लेकिन भाषाविद मन के बताए रस्ता अउ अपन लेखन के अनुभव के अधार म अपन बिचार ल रख पारथौं। बकौल जायसी; ‘हौं पंडितन केर पछलगा किछु कहि चला तबल दइ डगा।’ मोर बिचार से भाषा चाहे रचनात्मक लेखन के होवै चाहे शैक्षणिक या सरकारी काम-काज के; मानक होनेच चाही। एकर मतलब ए नइ ए के जब तक मानकीकरन न हो जावै तब तक लिखना बंद कर देना चाही। कोशिश करबो त मानकता ल एक दिन पाबेच करबो। हिन्दी के रचनात्मक लेखन के मानकीकरन बर पं. महवीर प्रसाद द्विवेदी ‘सरस्वति’ के माध्यम से जबड़प्रयास करिन। उन कर पहली भारतेन्दु युग म खड़ी बोली म ब्रज अउ अवधी के कारक रूप के धड़ल्ले से प्रयोग होवै। दू-तीन दशक पहिली ‘करावें’ अउ ‘कराऍं’ दुनो रूप मन चलत रहिन। अब ‘करावें’ हर चलन से बाहर हो गए हे। मानकीकरन हर एक दिन के काम नोहै। लिखत-लिखत व्यवहार म आही। लेकिन लिखे कइसे जाए एकर निर्धारन तो होनेच  चाही। ए काम ल अधिकार प्राप्त समितिच हर कर सकत हे। मोर तो सुझाव हे; वर्ण; पद; कारक; रूप उवा मन के निर्धारन करे के बाद आयोग हर एको ठन पत्रिका निकालै जेमा मानके रचना मन ल छापे जाए अउ कहूॅं शब्द हर मानक नइ ए त ओला सुधार के छापे जाए। ओइसनहे स्कूल- कॉलेज मन म मानक छत्तीसगढ़ी लेखन के प्रतियोगिता कराए जाए। मानकता के ए मतलब नइ ए के आने भाखा के शब्द मन ल जरूरत के अनुसार न लिए जाए। आने भाषा के शब्द मन ल जरूरत के अनुसार बउरे म भाषा के संप्रेषणीयता अउ सटीकता हर बाढ़ जाथे। तमंचा रायपुरी के हिन्दी म छत्तीसगढ़ी शब्द मन अइसे घुल-मिल जाथें के ओकर अरथ के गहराई अउ सौंदर्य हर बाढ़ जाथे अउ रूपो हर नइ बिगड़ै। अइसनहे छत्तीसगढ़ियो म होना चाही।

सरला शर्मा : वाह! कामेश्वर भाई बढ़िया लिखे …आप भाषाविद् नोहव ..एकर शिकायत हर धोवा ,पोंछा गे ..।

मैं आपसे सहमत हौं …फेर धीर लगा के काम करे बर परही ….हिंदी ल बृज ,अवधी ,खड़ी बोली के छाँव ले निकले मं भी तो समय लगबे करे रहिस ….।

कामेश्‍वर पाण्‍डेय : हॉं दीदी आप मन ठीक कहत हावव। अइसनहे गोठियावत रहिबो त हमर भाषा म सुधार आवत जाही।

संजीव तिवारी: सिरतोन कहे कामेश्वर भाई, तथ्य सहित गंभीर गोठ लिखेव। मानकीकरन बर आपके चिंता जायज हे 🙏🙏🙏🙏

डॉ.अनुसूईया अग्रवाल : कामेश्वर भाई के आज के अभिव्यक्ति है गज्जब महत्वपूर्ण हे; वोखर उपर धियान देना चाही।

कामेश्‍वर पाण्‍डेय : अखिल भारतीय प्रशासनिक शब्दावली बर आयोग कोती ले प्रस्तावित छत्तीसगढ़ी शब्द मन  ऊपर अचानक मोर नजर पर गइस। ओमा उपशमन करना के पर्याय जरोना; जराना; लेसना लिखाए हे। जबकि एला बुताना या बुझाना होना चाही। प्रस्तावित शब्द मन ल कहूॅं अधिकारी विद्वान मन एक फइत देख लेतिन!

नरेन्‍द्र वर्मा : 😳😳😳😳😳

डॉ. सुधीर शर्मा : 🙏

डॉ.अनुसूईया अग्रवाल : बढ़िया!!!! कामेश्वर भाई।

कामेश्‍वर पाण्‍डेय : 🙏🙏🙏

डॉ.अनिल भतपहरी : कौनो भी भासा में साहित्य लेखन अउ ओ भासा म सरकारी काम काज करई अलग चीज आय। साहित्य म भासा के सुघरई रहिथे जबकि काम काज म थोरिक अलग सरूप हो जाथे। जइसे छायावादी भाषा शैली म कोन्हो सरकारी आफिस म दरखास्त नई दे सके। ये अंतर हिंदी म देखे जा सकथे। ओइस्नेहेच छग म लेखन अउ साहित्य के अलग रूप रही। भले कामकाज बर प्रसानिक शब्द गढ़े ल परही। ये अलग तरह के मानकी करन होही। लेखन अउ काम काज के भासा ल मिन्झारना सही नोहे ओला  अलिगाये रखे जा सकथे। फेर ये रचनाकार के स्वतंत्रता ये ओला का अउ कइसे लिखना हे। प्रसासनिक

नरेन्‍द्र वर्मा : साहित्य के मारे काहीं नई बाँचय मिंझारे ल परही। प्रसासनिक म साहित्य  भले नई आवय फेर साहित्य म प्रशासनिक बात तो आ सकथे ।

डॉ.अनिल भतपहरी : इही सेती तो कहत हन भई लेखन बर मानकीकरन के जरूरत नइये। भलुक राज काज अउ स्कुल कालेज म पढ़ाय के भासा ल मानक करे के जरूरत हावे।

नरेन्‍द्र वर्मा : भतपहरी जी आप का कहत हव ? सुधीर भाई का आपो भतपहरी जी ले सहमत हव।

डॉ.अनिल भतपहरी : लेखन के मतलब साहित्य  रचना प्रक्रिया समझे जाय। येमा अपन अपन अंचल में जोन चलत हे लिखे जा सकथे। फेर परसासनिक अउ पाठ्यक्रम म मानकी करन के जरूरत हे। हमर कहें के इहि मतलब हे। कोनो भी अपन च्लाग्न म  कहें कि हमर  डहर ,डाहर डहन, डाहन ,अलंग, अंग ।फेर एमा एक ठन ल ओला चिन्हित करे के मानक करे जाय। अउ ओला काम काज म बउरे जा जाय। फेर साहित्य लेखन म ये झन सरत राखे जाय कि फलानाच रही।लेखक  अपन सुविधानुसार ओतका म जोन ल सही समझे उन ल  लिखे के आज़ादी रहय।

नरेन्‍द्र वर्मा : आप हिन्दी के प्रोफेसर अव उहू म डाॅ,  आप जादा जानहू। हम हिन्दी वाला नोहन। जइसे पाथन अगड़म-बगड़म लिख लेथन उहू कभू-कभू।

डॉ.अनिल भतपहरी : कोन का हे सवाल नइये वर्मा जी सवाल ये हे कइसे छतरंग म एक रंग दे जाय ताकि सब झन एक शब्द के एके अरथ समझे। इहि मानकी करन आय।

नरेन्‍द्र वर्मा : भतपहरी जी समस्या अलग-अलग शब्द म जादा नई आवय।  समस्या तब होथे जब एक शब्द ला अलग-अलग तरीका से लिखे जाथे। जइसे वोदिन गोठ चले रहिस व्याख्या के  बियाखया , बयाखया,  ब्याखया, बियाख्या, ब्याख्या

अजय साहू अमृतांशु : 👌👌👌👌

सरला शर्मा : क्षमा सहित …। छतरंग …या …सतरंग ..सतरंग माने सात रंग …मोर विचार मं …।

अशोक तिवारी : जय हो महतारी तोर मानकीकरण बर सब झन लाठी लेके पाछू परे हांवय।मोला लागथे ए सब भासाविद् अउ साहितकार मन के नेतागीरी  जादा आय।एखर कोनो ज़रुरत नई ए।ससंस्कृति कर्मी मन कभू नई चाहिही के संस्कृति के कोनो भी तत्व भले ही ओ हर मात्र एक ठन शब्द ही काबर होय ओला दबाये मेटाय के काम के हमेशा विरोध कराही।मैं ओहि बिरादरी के आव तेखर सेती सहमत नई अव।आपो मन एक साधारण भासा भासी के नजरिया ले एक घव बिचार करके देखव।कोनो अगर कहिहि के अइसे झन बोलके फलाना असन बोलव तव आपल् कईसे लागही।

नरेन्‍द्र वर्मा : मैं उपर म लिखे हँव वोला आप नई पढ़ेव तइसे लागत हे। वो दिन मैं  नइ शब्द लिखेंव आप फटले नई लिख देव काबर ?

डॉ.अनिल भतपहरी : छतरंग मतलब 6 रंग नोहय ।भलुक अब्बड़ अंकन सरूप या रंग आय। सतरंग मतलब जरुर 7 रंग होथे। संस्कृति के काम अवघड ल सुघड़ करना आय। फेर मूल तत्व ल तको बचा के रखे के भाव तको ओमे सन्घरे रही। अब ये कइसे होही ये गुने जा सकथे।

अशोक तिवारी : ठीक कहत हव

डॉ.अनिल भतपहरी : जइसे कुम्हार के नव सिख्हा लईका चाक म माटी के मरकी बनात रेचका कर डरिस अब ओकर बबा आके ओला सोझिया दिस ये संस्कृति के काम ये।

नरेन्‍द्र वर्मा : तिवारी भाई ये तो मोर सवाल के जवाब नोहय।बबा कोन

डॉ.अनिल भतपहरी : बने पढ़ ओ लईका के सियन्हा ( हुनरमंद )बबा। अउ का के  कोन वर्मा भाई!

अशोक तिवारी : आप सवाल नई करे अव अपन बिचार बताये हव अउ मैं ओला पढ़े हव।

नरेन्‍द्र वर्मा : कहूँ अइसनहे चर्चा सरलग चलही त  मानकीकरण बर कोनो भाषाविद् के रद्दा देखे ल नइ परही तइसे लागत हे । ये मैं पोस्ट करेंव आप तुरते पोस्ट करे रहेव नई परही

अशोक तिवारी : अनिल भाई भासा हर संस्कृति के अभिन्न अंग आय।अउ कई किसम के कारण सेती हर हफ्ता दुनिया म कहू न कहू एक ठन भासा विलोपित होत जात हे।एखर सेती सब ल चाही के कोई भी फितुरी काम झन करे जाय जउन भासा ल नुकसान करय

नरेन्‍द्र वर्मा : नहीं  बर नइ ठीक हे या नई

डॉ.अनिल भतपहरी : नइ सही हे। नई मतलब हिंदी म नवा हो जथे। तिवारी बड़े भइय्या जी सिरतोन कहें हव। आज क्त्कोन जिनिस नंदावत जात हे। उनखर फ़िकर तो करेच ल परही। नही त हमू मन नंदा जबोन तब कोन भला सोरियाही?

संजीव तिवारी: अइ लंग चुप रहे ल पर जथे गियाँ  (अइ म इ के चरन्नि उच्चारन)

नरेन्‍द्र वर्मा : भतपहरी भाई सवाल तिवारी जी से हे

अशोक तिवारी : हव जउन लिखे हव तउन ही सही ए लेकिन मोर मोबाईल म ओइसनहा नई टाइप होइ ओहर नै, नाइ, नई, ने अउ नए के आप्सन देथे त मैं नई ल ले लेथव

नरेन्‍द्र वर्मा : अइसे का

डॉ.अनिल भतपहरी : ग्रुप चरचा येस्नेहेच होथे। नही त सेपरेट चरचा करव।

अशोक तिवारी : हव।लेकिन मोला ए ताजुब्ब लागथे के मोला अतेक लेड़गा कइसे समझ लेव भई के मैं नई अउ जउन मोर म टाइप नई होते तेखर फरक ल घला नई जानहुँ।

नरेन्‍द्र वर्मा : भतपहरी भाई तिवारी जी ल समझाये के प्रयास करत रहेंव  ये चर्चा सामूहिक ही हो सकथे आप ल बुरा लगीस त छमा (क्षमा) चाहत हँव । तिवारी जी बहुत से शब्द म भोरहा हो जाथे बात लेड़गा के नोहय। मैं अब्बड़ दिन ले कई ठन वर्ण ल गलत लिखत रहेंव।

डॉ.अनिल भतपहरी : कोन्हो बात नइये !अउ बुरा माने के सवाले नइये वर्मा भाई।असल में नइ अउ नई के फरक ल बताय बर हमी उमिहा गेन ।येखर बर जरुर हम ल क्षमा कर देहू यदि क्न्झा के ये कहें होहू कि सवाल तिवारी  जी बर हे!

नरेन्‍द्र वर्मा : भतपहरी जी अउ तिवारी जी बढ़िया बात चलिस धन्यवाद । बाकि मन तो मजा लेवत हें।  शुभरात्रि ।

डॉ.अनिल भतपहरी : अधरतिहा के जोहार।

संजीव तिवारी: मजा नही भईया , जानकारी बाढ़त हे । आपमन् के चरचा म

डॉ. सुधीर शर्मा : अनिल सही बोलत हे

डॉ. सुधीर शर्मा : तकनीकी मानकों का विकास करना एवं उन पर सहमत होना मानकीकरण (Standardization or standardisation) कहलाता है।

मानक भाषा – मानक का अभिप्राय है—आदर्श, श्रेष्ठ अथवा परिनिष्ठित। भाषा का जो रूप उस भाषा के प्रयोक्ताओं के अलावा अन्य भाषा–भाषियों के लिए आदर्श होता है, जिसके माध्यम से वे उस भाषा को सीखते हैं, जिस भाषा–रूप का व्यवहार पत्राचार, शिक्षा, सरकारी काम–काज एवं सामाजिक–सांस्कृतिक आदान–प्रदान में समान स्तर पर होता है, वह उस भाषा का मानक रूप कहलाता है।मानक भाषा किसी देश अथवा राज्य की वह प्रतिनिधि तथा आदर्श भाषा होती है, जिसका प्रयोग वहाँ के शिक्षित वर्ग के द्वारा अपने सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक, व्यापारिक व वैज्ञानिक तथा प्रशासनिक कार्यों में किया जाता है।किसी भाषा का बोलचाल के स्तर से ऊपर उठकर मानक रूप ग्रहण कर लेना, उसका मानकीकरण कहलाता है।मानकीकरण (मानक भाषा के विकास) के तीन सोपान निम्नलिखित हैं-

प्रथम सोपान- ‘बोली’ – पहले स्तर पर भाषा का मूल रूप एक सीमित क्षेत्र में आपसी बोलचाल के रूप में प्रयुक्त होने वाली बोली का होता है, जिसे स्थानीय, आंचलिक अथवा क्षेत्रीय बोली कहा जा सकता है। इसका शब्द भंडार सीमित होता है। कोई नियमित व्याकरण नहीं होता। इसे शिक्षा, आधिकारिक कार्य–व्यवहार अथवा साहित्य का माध्यम नहीं बनाया जा सकता।

द्वितीय सोपान- ‘भाषा’- वही बोली कुछ भौगोलिक, सामाजिक–सांस्कृतिक, राजनीतिक व प्रशासनिक कारणों से अपना क्षेत्र विस्तार कर लेती है, उसका लिखित रूप विकसित होने लगता है और इसी कारण से वह व्याकरणिक साँचे में ढलने लगती है, उसका पत्राचार, शिक्षा, व्यापार, प्रशासन आदि में प्रयोग होने लगता है, तब वह बोली न रहकर ‘भाषा’ की संज्ञा प्राप्त कर लेती है।

तृतीय सोपान- ‘मानक भाषा’- यह वह स्तर है जब भाषा के प्रयोग का क्षेत्र अत्यधिक विस्तृत हो जाता है। वह एक आदर्श रूप ग्रहण कर लेती है। उसका परिनिष्ठित रूप होता है। उसकी अपनी शैक्षणिक, वाणिज्यिक, साहित्यिक, शास्त्रीय, तकनीकी एवं क़ानूनी शब्दावली होती है। इसी स्थिति में पहुँचकर भाषा ‘मानक भाषा’ बन जाती है। उसी को ‘शुद्ध’, ‘उच्च–स्तरीय’, ‘परिमार्जित’ आदि भी कहा जाता है।

मानक भाषा के तत्व ऐतिहासिकता स्वायत्तता केन्द्रोन्मुखता बहुसंख्यक –प्रयोगशीलता सहजता/बोधगम्यता व्याकरणिक साम्यतासर्वविध एकरूपता मानकीकरण का एक प्रमुख दोष यह है कि मानकीकरण करने से भाषा में स्थिरता आने लगती है। जिससे भाषा की गति अवरुद्ध हो जाती , साभार

सरला शर्मा : धन्यवाद सुधीर ….अब जाकर मानकीकरण और मानकीकृत भाषा की अवधारणा स्पष्ट हुई । इस चर्चा के  प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सहभागियों को लाभ हुआ ।

डॉ.अनिल भतपहरी : बिहनिया के जोहर 💐🙏💐 सुधीर भैय्या जी आभार..

नरेन्‍द्र वर्मा : धन्यवाद सुधीर भाई 🙏🙏🙏🙏🙏 आपके दे जानकारी अउ डाॅ रमेश चन्द्र महरोत्रा जी के पुस्तक छत्तीसगढ़ी परिचय और प्रतिमान पढ़े के बाद समझ म आइस छत्तीसगढ़ी के मानकीकरण अभी संभव नई हे। हमन फोकटे-फोकट येकर बारे म गोठियावत हवन।

कामेश्‍वर पाण्‍डेय : भतपहरी सर आप मन नराज झिन होहा त एक बात कहत हौं। हिन्दी म धर्मनिष्ट कलानिष्ट तो नइ होवै। धर्मनिष्ठ अउ कलानिष्ठ होथे। आप जइसे विद्वान के देखा-देखी हमू मन ओइसनहे लिखबो त गड़बड़ हो जाही। जइसे सरला दीदी लिख पारिन।

मानकीकरन के बारे मबतावत घानी आप मन डहर; डाहर; डहन; डाहन; अलंग; अंग शब्द मन म एक ठन ल चिन्हित कर के ओला मानक बनाए के सुझाव देहे हावव। ए मन दिशा सूचक शब्द आएॅं। जइसे हिन्दी म ओर; तरफ। ओइसनहे संयोजक शब्द और; एवं; तथा अउ किन्तु; परन्तु; पर। ए मन के मानकीकरन से कउनो संबंध नइ ए। जरूरत के अनुसार ए सब के उपयोग होथे। जइसे कई ठन वाक्यांश ल जोड़ना हे त हर बार ‘और’ न लिख के एवं अउ तथा घलउ के प्रयोग करे जाथे। जइसे के मैं कहत आवत हौं मानकीकरन वर्ण; पद अउ रूप उवा मन के करे जाथे। एक बात अउ कहना हे। शब्द coin करत घानी ओकर ओकर अर्थवत्ता अउ सटीकता के धियान रखना चाही। छतरंग शब्द हर मोला निरर्थक लगत हे। छत शब्द के मतलब अब्बड़ अकन मैं कभू नइ सुनेंव। होही त जानकार मन बताहीं।

नरेन्द्र वर्मा भाई! सुधीर भइया के देहे जानकारी अउ प्रात: स्मरणीय मेहरोत्रा जी के पुस्तक पढ़े के बाद आप मन ल छत्तीसगढ़ी के मानकीकरन हर संभव नइ लगत हे। मोर बिचार से मानकीकरन म कउनो जादा कठिनाई नइ ए।  एमा मुख्य रूप से वर्ण मन म कउन-कउन ल लेना हे अउ कउन-कउन ल छोड़ना हे; संयुक्त अक्षर मन म कइसना मन ल चले देहे जाए अउ कइसना मन ल सरल बनाए जाए एकर निर्धारन करना परही। जिहॉं तक रूप के सवाल हे; प्रथम पुरूष अउ अन्य पुरूष के रूप मन म जादा फरक नइ ए; मध्यमेच पुरूष के तीनो काल के रूप मन म जादा फरक हे। एकर समाधान ल सबे रूप के बोलइया भाषाविद मन के समिति बन जाए त ओहर सोच-बिचार के कर सकत हे। मोला बिसवास हे एकर बर  कहूॅं रूप वाले मन हठधर्मी नइ बनहीं। मानकीकरन असंभव नइ हे। करे बर धरतिन त अभी तक कर डारतिन। सुधीर भाई मानक भाषा के साभार जानकारी दिहिन। महत्वपूर्ण हे। छत्तीसगढ़ी के मानकीकरन बर गोठिया देतव त हमू मन ल दिसा मिलतिस। आसा हे आगे मिलही।

असली कठिनाई तो शब्दकोश के निर्मान म हे। अभी आयोग के वेब साइट म जउन हिन्दी-छत्तीसगढ़ी शब्दावली हे ओमा गलती के भरमार हे। हिन्दी के पारिभाषिक शब्दावली संस्कृत ऊपर आसरित हे।  छत्तीसगढ़ी काबर नइ हो सकत हे? फिलहाल एला वेब साइट ले निकाल लेना ठीक रइही।

शकुन्‍तला शर्मा : Vohar sudhar jahi g kameshvar bhai . Hamare chook ho gay havay hami man vola sudhar ghala lebo, achchha hoge tor nzar par ge au tain har bata dehe .

डॉ.अनिल भतपहरी : धर्मनिष्ठ अउ कलानिष्ठ  ही पढ़े जाय भाई। सोसल मिडिया म लिखत ऐस्नेच गलती हो जथे ।अल्प अउ पूर्ण विराम सहित योजक आदि के भी गलती होते रहिथे। येला सहज भाव लेके अउ लिखैय्या मन के उत्साह वर्धन करव् ।काबर कई स्थिति परिस्थिति म रेगत बुलत यात्रा करत गप्प सप्प मारत येमा लिखे ल परथे। त त्रुटी होनच हे। धियान देवाय एकर बर आप के आभार  कामेश्वर जी।

कामेश्‍वर पाण्‍डेय : 🙏🙏🙏

नरेन्‍द्र वर्मा : कामेश्वर भाई मैं  संभव नहीं भलुक अभी संभव नइये लिखे हँव।

अशोक तिवारी : ए मेर, ए सो, ए करा, ए कोती, ए सो, ए लंग, ए अंग म ले के ठन नंदाहि अउ कउन हर बांचाहि थोर कन मानकीकरण वाले मन बताये के किरपा करय।

कामेश्‍वर पाण्‍डेय : अशोक तिवारी जी हमर पोस्ट ल थोरकन धियान से पढ़े के किरपा करे करव। कालिच हम लिखे रहेन; डहर; डाहर; अलंग; अंग शब्द मन दिसा सूचक आएॅ। ए मन के मानकीकरन के जरूरत नइ परै। अवसर अउ रुचि के अनुसार सबो के प्रयोग हो सकत हे। ओइसनहे ए मेर; ए सो; ए लंग; ए अंग मन घलउ दिसा सूचक शब्द आए। ए मन के मन के मानकीकरन नइ होवै।

अशोक तिवारी : धन्यवाद कामेश्वर एसनहे समझावत् रहे करव।मैं तो न साहितकार आंव अउ न ही  भसविद्।

कामेश्‍वर पाण्‍डेय : आप मन चेत करत हावव ओहू हर कम बात नोहै तिवारीजी!

 

लक्ष्मण मस्तुरिया के खण्‍ड काव्‍य : सोनाखान के आगी

लिखे-पढ़े के सुख

Sonakhan Ke Aagiकोनो भी देस-राज के तरक्‍की के मूल म भासा. संस्कृति अउ जनम भुंई के महात्‍तम माने जाथे। एकर बिना कोनो भी किसम के विकास प्रगति बढ़ोत्तरी अकारथ होथे। छत्‍तीसगढ़ राज नई बनेरिस वो समे बीर नरायेन सिंह के ए बीरगाथा सुनके नौजवान मन के मन म भारी जोस अउ आत्म गौरव के भाव जागतरिस, कवितापाठ के बीच बीच म जय छत्‍तीसगढ़ के नारा लगावंय। छत्‍तीसगढ़ राज बने के बाद एकर महत्व बाढ़गे हे, नवा पीढी ल अपन पुरखा मन के त्‍याग बलिदान अउ जोम के जानकारी होना चाही।

“सोनाखान के आगी” के पहली प्रकासन 1983 म, स्व. स्वरूप सिंह पोर्ते (तात्कालिक जिलाध्यक्ष दुर्ग) के प्रेरणा प्रोत्साहन ले होय रिहिस। समे के संगे संग रचना के महत्व घलो बाढ़थे। जब राज नइ बने रहिस तब छत्‍तीसगढ़ी नौजवान मन के मन म स्वाभिमान जाए के भाव लेके, अमर शहीद वीरनारायण सिह के वीरगाथा के रचना 1972-73 म होय रहिस, वो समें याद रखे के सुबिधा ल धियान म रखके अउ कतको पद ल छांट के अलग करना पहिस। वो गलती होगे। जगह जगह भटके के कारन कतको रचना के संग वोहू गंवागे। छपे रहिस तब ए बांचगे। कतको नौजवान संगी मन एकर मांग करथे, श्री मधुकर कदम जी हर एकरे अधार म एक उन सिनेमा घलो वना डारे हे। कतको जगह वोला देखाए जाथे।

अपन पूर्वज पुरखा मन के जयकार करे म मन म स्वाभिमान के भाव जागथे। इही विचार ले एकर नवा संस्करण नौजवान मन बर प्रकाशित करे के मन होइस। पढ़ के कहूं तुंहर मन म अपन शहीद बीरनारायन सिह के त्याग बलिदान के किस्सा के झलक जागही तब मोर ए बड़ भाग होही, ए रचना सार्थक होही। लिखे पढे के सुख इही हे, के पढ़इया सुनइया मन ल मंजा आय, आनंद आय, अउ हिरदे म ऊंचा उठे के भाव जागे।

लक्ष्मण मस्तुरिया


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छत्‍तीसगढ़ी उपन्‍यास : जुराव

कामेश्‍वर पाण्‍डेय

Jurav Kameshwar Pandey‘कुस’ का बड़बड़ाइस, भीड़ के हल्ला-गुल्ला मं समझ मं नइ आइस। नवटपा के ओहरत सुरुज हर खिड़की मं ले गोंड़ जी के डेरी कनपटी लऽ तमतमावऽथे। भीड़ के मारे सीट मं बइठइया सवारी घलउ मन के जी हलकान हे। देंव हर ओनहा-कपड़ा के भीतर उसनाए कस लगऽथे। ऊपर ले पंखो हर गर्राटेदार तफर्रा लऽ फेंकऽथे। मनखे के मुँह बार-बार सुखावऽथे। कतको झन के दिमाग तो टन्न-टन्न करऽथे। डब्बा हर कोचकिच ले भर गै हे। सीट मं तो खूब करके रिजर्वेसन वाला मद्रासीच मन बइठे हें। छत्तीसगढिय़ा मन बर तमिल, तेलगु, कन्नड़, मलयाली, सबे मद्रासी। लिंक एपरेस हर ओमन लऽ अपन देस जाए बर सीधा अउ सुभीता परथे। बाकी लोकल बैपारी, कामगार, किसान बोगी मं भरे हें। सीट मन के बीच तक मं इहॉ-उॅंहा ले अकबकावत अउ बकबकावत मुंडीच-मुंडी। गठरी-मोटरी लेहे आदमी औरत धंसे परऽथें। ओला रोके के बहाना करत ‘कुस’ अपन डेरी गोड़ लऽ सामने प्रभा के सीट मं तान देहे हे जउन भीड़ के दबाव मं ओकर सरीर लऽ छूवऽथे। प्रभा ‘जय’ कती खसक के ए समस्या के निराकरन करिस अउ ‘कुस’ अपन गोड़ लऽ हटा लिहिस, लेकिन नीचे ओकर पॉंव तक अड़ाएच रखिस, ताकि भीड़ हर धॅंसे मत पावै। बइठइया तक मन लऽ अपन जघा मं हलाई-डोलाई हर मुस्किल हो गए हे, लेकिन ए फेरी वाले सिंकिया सूर मन कइसे अपन बड़े-बड़े बाल्टी, टुकनी, पेटी मन ल धरे, गुंथाए भीड़ लऽ अपन कोहनी में हुदरत अउ तॅंउरत कस आत्ते-जावत रथें।
(उपन्‍यास अंश)
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तॅुंहर जाए ले गिंयॉं

Tuhar Jaye le giyanतॅुंहर जाए ले गिंयॉं श्री कामेश्वर पांडेय जी द्वारा लिखित आधुनिक छत्तीसगढ़ की स्थिति का जीवंत चित्रण तो है ही, संघर्ष की राह तलाशते आम आदमी की अस्मिता के अन्वेषण की आधारशिला भी है। इसे छत्तीसगढ़ की अस्मिता पर लिखित और ‘हीरू के कहिनी’ के बाद प्रस्तुत 21वीँ सदी का श्रेष्ठ औपन्यासिक साहित्य भी कहा जा सकता है। छत्तीसगढ़ के माटी पुत्र श्री कामेश्वर पांडे पिछले 10 वर्षोँ से लगातार श्रम और शोध के द्वारा इसे परिष्कृत—परिमार्जित करते हुए अब प्रकाशन के लिए तैयार हुए है।
उपन्यास मे जहाँ छत्तीसगढ़ी मजदूरों के पलायन की पीड़ा है, वहीं छत्तीसगढ़ी जनजीवन पर वर्चस्ववादी सभ्यता का दबाव, स्थानीय जनपत पर परदेसियों के शोषण का प्रभाव, अपने ही घर में मेहमान के रुप में तब्दील हो जाने का उदभाव और नव उदारवादी औद्योगिक सभ्यता के प्रलोभन और प्रदूषण से उन्मुक्त होने का सात्विक भाव उद्घाटित है। उपन्यासकार इसमें यह स्वप्न भी देखता है कि छत्तीसगढ़ी मनुष्य आलस्य को त्याग कर श्रम—साधना और कर्मठ जीवन को अंगीकार करें,उंच—नीच व अमीर—गरीब जाति—पाति के अलगाव से अलग होकर पारस्परिक सद्भाव को अंगीकार करें तथा उदार सांस्कृतिक विरासत को संजोते हुए अपनी सामासिकता, विशाल हृदयता और भलमनसाहत की छाप छोड़ने में सक्षम हो सके, अपनी निरीह छवि से मुक्त हो सके। इस उपन्यास की एक और खूबी यह भी है कि यह केवल पारम्परिकता और ग्रामीण जीवन को ही आंचलिकता का पर्याय न मानकर आधुनिक जीवन—बोध की जटिलता, नागर संस्कृति की संवेदनहीनता और अभीजन वर्ग की चेतनता से सरोकार रखकर सर्वथा युगीन संदर्भों से जुड़ती है।
डॉ. विनय कुमार पाठक
(फ्लैप मेटर)

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संपादकीय : मोर डांड तो छोटे तभे होही संगी, जब आप बड़का डांड खींचहू

ST1111संगवारी, गुरतुर गोठ के हमर उदीम इंटरनेट (मेकराजाला) म छत्तीसगढ़ी भाखा के साहित्य ल आघू लाये के हे। हम ये वेब साईट म 2008 ले छत्तीसगढ़ी के रचनाकार मन के रचना सरलग डारत आवत हावन। हम चाहत हावन के हमर भाखा के जादा ले जादा साहित्य इंटरनेट म आवय। ये खातिर हम जमो संगी मन संग गिलोली करथन के, आप अपन ब्लॉग या बेवसाईट बना के अपन अउ अपन संगी साथी मन के रचना घलव ला डारव। हम सब जुरमिल के उदीम करबोन त हमर साहित्य सहजे म इंटरनेट के माध्यम ले हमला पढ़े-गुने ल मिल जाही।
मोर एके ठन अउ गिलौली हावय के ये बेवसाईट या कोनो ब्लॉग म एक पईत छपे रचना ला घेरी बेरी इंटरनेट म छापे के बजाए नवा रचना ल इंटरनेट म डारव। येखर ले हमर भाखा के साहित्य इंटरनेट म घलव बने पोठ होही अउ पाठक मन ल घलव बने रकम-रकम के बिसय पढ़े ल मिलही। ये बेवसाईट के रचना ल कापी करके कहू आप अपन ब्लॉग या बेव साईट म डारहू त पाठक ल नवा का मिलही। आप अपन दाई भाखा छत्तीसगढ़ी बर सिरतोन म मया करथव त नवा रचना अपन बेव साईट या ब्लॉग म डारव। ये साईट के कोनो रचना ल आप कहूं अपन ब्लॉग या बेवसाईट म डारना चाहत हव त बने होही के हमर साईट के पूरा रचना डारे के बजाए, हमर साईट म छपे रचना के लिंक ल अपन म लगा लव। येखर ले पाठक ल आपके वेब साईट या ब्लॉग के रचना के संगें संग हमरो साईट के रचना पढ़े ल मिलही।
आप अपन दाई भाखा छत्तीसगढ़ी बर अपन असल मया देखाव, अउ इंटरनेट म हमर भाखा के भंडार ल भर दव। मोर डांड तो छोटे तभे होही संगी, जब आप बड़का डांड खींचहू। मोर मिहनत ले बनाए ये साईट के रचना मन ल अपन साईट म छापे के बजाए आप छत्तीसगढ़ी के ई पेपर (भास्कर, पत्रिका, हरिभूमि) अउ आरकाईव म चल देहे देशबंधु मड़ई के रचना मन ल अपन साईट म जघा देहू तभो छत्तीसगढ़ी बर बड़का काम हो जाही। एखरो ले आप ल संतोस नई होही त हम तो पहिलीच ले कहत हन संगी, आवव, आप सम्हाल लव ये गुरतुर गोठ के बाना ल। हमर मेर अपन दाई भाखा बर काम करे के अड़बड़ अकन बुता बांचे हे।
पाछू कुछ हप्ता ले बने रमके ये साईट म सरलग रचना छापत रहेंव, अब मन खट्टा होगे। अब ये साईट म जइसे मोला उसरही रचना छापहूं, सरलग हप्ता-महीना के बंधना नई राखंव।
जय छत्तीसगढ़, जय छत्ती‍सगढ़ी।
संजीव तिवारी
संपादक: गुरतुर गोठ डॉट कॉम

 

सरला शर्मा के उपन्‍यास : माटी के मितान

Cover Pageसरला शर्मा का यह छत्तीसगढ़ी उपन्यास अपनी विशिष्ट शैली के कारण पठनीय है। यह उपन्यास यात्रा- संस्मरण का पुट लिए हुए सास्कृतिक-बोध के लिए आधार-सामग्री प्रदान करता है। छतीसगढ़ की सास्कृतिक चेतना का स्वर उपन्यास के पात्रों, स्थलों और उसकी भाषा में गूंजता दिखाई देता है। इस उपन्यास में शासन के स्तर की अनेक योजनाओं का प्रचार-पसार है तो दूसरी ओर गाँवों के समग्र विकास का सपना भी है। इस सपने को हकीकत में बदलने की कोशिश की कुछ झलक भी इसमे प्रदर्शित है।

छत्तीसगढ़ की जांज़गिरी मिठास इस उपन्यास की भाषा का प्राण-तत्व है। उपन्यास के पात्रों के साथ घुल मिलकर पाठक छतीसगढ़ के रतनपुर, बिलासपुर और मल्हार के साथ- साथ संपूर्ण छतीसगढ़ को जीता है ।

इस सास्कृतिक चेतना के उत्सव में यह उपन्यास पाठक को अपनी आत्मीय सहभागिता के लिए आहवान करता है ।

-डॉ. सुधीर शर्मा

ये किताब ल बड़े करके पढ़व अउ डाउनलोड करव.

 

टिकेश्‍वर सिन्‍हा ‘गब्‍दीवाला’ के छत्‍तीसगढ़ी काव्‍य संग्रह : ठूठी बाहरी

Thuthi Bahiriभूमिका : टीकेश्वर सिन्हा के कविता संकलन “ठूठी बाहरी ” ल पढे कं वाद सोचें बर परिस आखिर ठूठी बाहरी काबर? बाहरी ह ठूठी कब होथे? जब बाहरी ह घर दूवारी के कचरा ल बाहर के सकेला करथे। ओखर वाद ओला घर गोसइन ह र्फकथे। वइसनेने ये टीकेश्‍वर के कलम ह बाहरी बनके घर द्वार, गाँव, त्तरिया, खेतखार, समाज सब ल बाहर के साफ करे हावय। … सुधा वर्मा.