अलकरहा के घाव : एमे के ओमे

राज्‍य बनने के बाद से इसकी अस्मिता पर चिंता और चर्चा करने वालों की संख्‍या में बेतहाशा वृद्धि हुई है। चिंता में दुबले होते लोग बाल्‍मीकि और कालिदास को सोरिया रहे हैं। चर्चा के सहारे चर्चित लोग पुराणों में गोता लगा लगा कर, इस धरती में राम और कृष्‍ण के पांवों की फुतकी खोज रहे हैं। इनके साथ ही हमारे जैसे बात-बेबात बेगानी शादी में बेवजह दीवाना हो जाने वाले जन दू रूपिया किलो चाउंर और सुलभ चेपटी में संतोष कर रहे हैं। तस्‍मई उड़ाने वाले अधिकारी, नेता, व्‍यापारी और नक्‍सली सब खुश है। सर्वत्र राम राज्‍य की परिकल्‍पना साकार हो गई है। सफलता के इन पंद्रह वर्षों में महानता के कई किस्‍से आये गए। क्‍या क्‍या बखान करूं, सभी क्षेत्रों सहित शिक्षा क्षेत्र में कीर्तिमान बांचे गए। चर्चित लोगों नें मंगलाचरण पढ़ते हुए याद दिलाया कि इसी संस्‍कारवान, संस्‍कृतिसम्‍पन्‍न प्रदेश की धरा में लव और कुश जैसे प्रतापी राजाओं नें शिक्षा ग्रहण किया.. फलाना ढेकाना.. । ये सब सुन सुन के कोरा की सोरा बाई, सोरा आना नम्‍बरों से अव्‍वल नम्‍बर से पास हो गई, पप्‍पू फेल हुआ।‘
‘इधर हमारे प्रदेश में जब से सोरा बाई की महानता के किस्‍से आम हुए । सभी मेरिटोरियस पढ़ाकू टाईप पप्‍पु-पप्‍पी चिंतित हो गए । मुन्‍ना भाई फिल्‍म से निकल कर सभी विद्यार्थियों के आदर्श हो गए। अपनी जिद पूरा कराने के माध्‍यम के रूप में यूज एन थ्रो फुंसुक वांगडू इडियट का इडियट बन गया। पप्‍पु लोग कहने लगे कि, सोरा बाई नें हमारे प्रदेश की शिक्षा व्‍यवस्‍था का मान बढ़ाया है। हम सोरा के इस महान परम्‍परा के वाहक क्‍यूं ना बनें।‘
‘अब तो इस परम्‍परा नें उत्‍तरोत्‍तर विकास कर लिया है।‘ पप्‍पु तमंचा की बातों से बोर होने लगा, उसने गुटका फाड़ा, मुह में डाला और गुटके के पीक को मुह में भरे हुए कथा आगे बढ़ाया। तमंचा चकराया, पूछा कैसे.. अब पप्‍पु रहस्‍य उद्धाटित करते हुए बोलने लगा ‘अब तैं सुन.. सोरा के नदिया अब बन गए नदिया, गोठ है ताजा बज गए हे बाजा। एक साहब के हाथ में शिक्षा का लगाम आते ही उनकी मैडम की पढ़ने की ललक परवान चढ़ने लगी। मैडम जानती ही थी कि, सैंया भयो कोतवाल तो डर काहे का। यहां तो कोतवाल ही नहीं एसपी तक सैंया के इशारों में नाचते फिर रहे हैं तो, थोड़ा और छूट ले लिया जाये। मैडम नें सोचा ये दारी बिना परीक्षा दिलाए एमे करना चाही। पर कामा करे, कईसे करे, कहां ले करे इस बात की चिंता है। मैडम की चिंता राष्‍ट्रीय संकट है, चमचे सक्रिय हो गए और सहज में ओमे करनें का जुगाड़ बनाया । साहब का कान ‘तुम ना कुछ नहीं जानते’ सुनते सुनते पहले से ही पक चुका है सो साहेब नें कान में ठेठा बोज लिया।‘
‘परीक्‍छा का दिन है, साहेब किंचर रहे हैं और मैडम घर में टीभी देख रही है, बड़ी बहन के लिए छोटी बहन परीक्षा दिला रही है। परीक्षा केन्‍द्र में पकड़ा गई, हो-हल्‍ला, पेपर-बाजी, फुरा-जमूंगी, थुवा-थुवा.. । ये क्‍या कम बात है लोग तो अपने जगह पर किसी को भी परीक्षा में बैठा देते हैं, मैडम नें अपने खून को परीक्षा में बैठाया। पर समाज भी ना… इसीलिए तो साहेब सहीं गाते हैं कुछ तो लोग कहेंगें.. कहने दो। साहेब नें अब फिर कानों में ठेठा बोज लिया है।‘
बोलते-बोलते पप्‍पु का सांस फूल रहा है। बात तमंचे का पूरी करनी है सो..
‘साहब नें स्‍वयं काड़ी म कोंचक के अलकरहा म घाव कर लिया है, अब ससुर के बैदी में न बता सके ना झंका सके। लोग उंगली उठा रहे हैं, घाव सड़ने लगा है, दुर्गंध चारो तरफ फैल गई है। अब कोई चारा बचा नहीं है इलाज जरूरी है।‘
-तमंचा रायपुरी