किताब कोठी : अंतस म माता मिनी

अंतस म माता मिनी

छत्तीसगढी राज भासा आयोग के आर्थिक सहयोग ले परकाशित

प्रकाशक
वैभव प्रकाशन
अमीनपारा चौक, पुरानी बस्ती रायपुर ( छत्तीसगढ)
दूरभाष : 0771-4038958, मो. 94253-58748
ISBN-81-89244-27-2
आवरण सज्जा : कन्हैया
प्रथम संस्करण : 2016
मूल्य : 100.00 रुपये
कॉपी राइट : लेखकाधीन

अंतस म माता मिनी
( जीवनी)
“दु:ख हरनी सुख बंटोइया, आरूग मया छलकैया
बनी मंदरस, फरी अंतस, मरजादा धन बतइया
माथ म चंदन, चंदा बरन, सेत बसन चिन्हारी
नाव व धराये मिनीमाता, छत्तीसगढ के महतारी”
अनिल जाँगडे
ग्राम- कुकुरदी, पो-जिला बलौदा
बाजार-भाटापारा (छ.ग. )पिन 493332
मो. 8435424604

समरपन

सिरीमती दुर्गा जाँगडे सुख-दु:ख के जीवन सँगनी ल…
‘”गुनवतींन नारी दुर्गा, विपदा म रिथे संग
भाग सहराथौ पा के, मोरा आधा अंग
मोरा आधा अंग दुई परानी ठठा सुख
संतोस बर रहचुल, लोभ बढाये जग म दुख
कहे अनिल जाँ गडे, राखै मान कुलवतींन
बिगडे ले बनाथे, लाथै सुमत गुनवतींन” ।।
अनिल जाँगडे

मिनी माता : अनिल के कलम

श्रीमती सुधा वर्मा मन लिखे हें के-
मैं औरत नहीं सदी हूँ अनवरत बहती नदी हूँ ।
जाने कितनी विभूतियाँ कोख में मैंने पाली है।।
चीर कर देखो मेरा कलेजा जाने कितना छाले हैं ।।
जे समाज म नारी शक्ति जाग जाथे त ओ समाज म मरद जात के मरजादा अऊ मान बाढ जाथे। पुरुष के संग शक्ति जरूरी हे। बिगर शक्ति के पुरुष म पुरुषारत न नारी गिरहस्ती के धारंग ए त सिंगार के आधार ए। वंश चलाए के ए त दया-मया के सोन–दोना ए। नारी के पाँव म सम्मान रथे त हाथ म मरजाद के दीया बरथे। बानी म दूध-दही घुरथे त ओकर बेवहार म मथला तरिया कस लहरा पैदा होथे। नारी के सुभाव, चंद्रमा के शीतलता ए तन हिरदे, दही के कोमलता ए…. पर जब जेवनी गोड आगू बढा के खोभ दिस त सरग के तारा अपने–अपन धरती म टूट के झरे लगथे। कथें न के तिरिया बिन सूना संसार… फूल बिगर पराग शोभा नइ देअ। खुशबू अऊ रंग ओकर आकर्षन ए तइसे नारी संसार के शोभा ए।
लुगरा के अँचरा त मया के पसरा-तिरिया ए, दीदी, नोनी, बहिनी, फुफु, मोसी, मामी, काकी, दाई, भौजी, ननद, जेठानी, भतीजी, देवरबेटी, भांची, नतनीन, बहू (पत्तो-बहुरिया) मितानीन, ममादाई अऊ बडकादाई (दुदुदाई) परोसीन, ढेढिन–सुहासीन, समधीन, सास, न जाने एक आत्मा के कतका नाव अऊ रिश्ता.? एहर ओकर रुप अउ महिमा के पहचान ए | भारतीय संस्कृति के आधार ए। सद् संस्कार के संवाहक, पहार कस अचल अऊ सहे के शक्ति रखथे त गंगा जमुना कस मया के धार ए। सतनामी समाज म नारी मन के प्रतिभा, कला, गुन, सिंगार अऊ विभूति के दर्शन होथे। पुरुष म पुरुषार्थ होथे त नारी म पुरुषार्थ ल सँवारे के ताकत होथे। नारी सबले पहिली माँ होथे बाद म तिरिया के ना ना रुप… माँ के गोरस मनखे के सिरजनहार ए…. ओकर सफेदी म सत अऊ संसार भरे हे। कहे गए हे के-
लबो में उसके कभी बददुआ नहीं होती।
बस एक माँ है जो कभी खफा नहीं होती ।।




सतनामी समाज के नारी मन, राजनीति, शिक्षा, संगीत अऊ खेलकूद म अपन भूमिका देहे म अगुवाई करे हें। लक्ष्मीबाई, शांतिबाई चेलक, उषा बारले, शामे शास्त्री, जलेश्वरी देवी, किरण भारती, गरिमा दिवाकर, पुष्पा दिवाकर, भगवती टांडेश्वरी, क्षमा पाटले, डॉ. इन्दु अंनत, जैसे नारी ऊर्जा, लोक संगीत साहित्य के नवा अंजोर बगरावत हें त राजनीति म पाँव कतको नारी जइसे मिनीमाता, कमलादेवी पाटले ल कोन भूल सकत हे। नारी के दया-मया तो धरती के गरुवाई ले जादा गरू हे। भाई श्री अनिल जाँगडे सुभाव म सरल, मधुरभाषी अऊ कलम के धनी ए। जाँगडे जी हर नारी के ऊर्जा, गरिमा, दया-मया अऊ ऊँकर कर्मक्षेत्र ल पहचान के दाई मिनीमाता के योगदान, कर्म, जस, अऊ मानव समाज के सेवा ल पहचान के निर्मल आकाश म चांदनी बगरा दिस अतका कम उम्र म चार-चार किताब मंजूर झाल, मउहा झरे झउंहा झउंहा, नाचा अऊ चंदन अस माटी, रच के समाज म नाव कमा डारिस। ए पडत मिनी माता ऊपर अपन भाव के माला गूंथत हे जेकर एक-एक शब्द म मोती कस चमक हे।
मिनी माता के बचपन के नाव मीनाक्षी रहिस जेकर जनम असम प्रांत के लोदे गाँव म होए रहिस | मीनाक्षी, नानकन ले प्रतिभावान रहिस। पिता बुधारी के मया असीस ले बेटी संसार म जस कमाइस । गुरु गोसाई श्री अगमदास जी हर अपन सतनाम यात्रा के दौरान हीरा ल पहचान के अपन अर्धागिनी बनाइन फेर भंडारपुरी ले सतनाम सेवा, नारी उत्थान, शिक्षा अऊ राजनीति म पाँव रख के नारी शक्ति के सफलता ल पूरा करिन। भाई अनिल जाँगडे जी हर माता जी के संपूर्ण जीवनगाथा ल पंक्ति बद्ध करके एक सबूत बतावत हें के समाज म
ऊँकर कतका ऊँचाई हे, नि:संदेह ए कृति, समाज के धरोहर रही। साहित्यकार तो बौद्धिक श्रमजीवी होथे। ओकर कलम म संसार के भाषा समाए रथे। अनिल के मिहनत अऊ सोच जरूर रंग लाही। ऊँकर कलम से स्याही कभू खतम मत होवै लगातार लाइन के शब्द अऊ भाव हर उबकै। ओमा रस, छंद के सिंगार के सुघरता एइ आशा हे…… ।
अनिल तोर कोंवर-कोंवर शब्द गीत बनै ग।
सतनाम के जपड्या बर सुघर मीत बनै ग ।।
घासीदास ल छोडौ नहीं सतनाम ल जपत ग।
अनिल के लिखे किताब मन ल पढत रइहौ ग ।।
डॉ. मंगत रवीन्द्र
शा.उ.मा.शा.कापन
दिनांक जिला-जांजगीर चांपा, छ.ग. 495552
14-6-16
मो. 9827880682




दु आखर

दाई मिनीमाता के सुधी आते नारी के झलक आँखी म झुलथे जेकर असथान छत्तीसगढ म आज तलक कोनो नीं ले सके ए। ओहर एक बेटी, महतारी, बहिनी, पत्नी, समाज सेविका, गुरूमाता के रुप अउ राजनीति म अपन अलग छाप छोडिस। दु:ख हरनी, सुख बांटत परमारथ म जिनगी होम दीस । समाज के उद्धार कइसे होही ? संसो करै, गुनान म बुडे राहै।
गुरुगद्दी के मान रखिस, सतनामी समाज ल बल दिस। गाँव के मनखे ल लेके बडडका राजनेता अउ प्रधानमंत्री तक ओकर बात कान देके सुनै, सलाह लेवै, मान–सनमान दै। छत्तीसगढ म हसदो बांध, विधान सभा भवन, रयपुर बस स्टैंड, चंडक चौराहा कतको महाविद्यालय माता के नाव म रख के सनमान दे हवै। समाज सेवा करइया महिला या संस्था ल हर बछर दू लाख रूपया अउ बडाई मान पाती (प्रंशसा पत्र) देके तियाग के सुरता करे जाथे।
समाज, देसराज म काकरो गुनगान, मान तभे होथे जब परमारथ म अपन सुख तेज के दूसर के विपद म खडा होथे, दुख हरथे। अट्टसने तियागी, गठ सुभाव के माता जी रहिस | माता के महान कारज ल गुनीजन के मुख ले सुनेंव, समझेंव अउ कतको संत, महंत, लेखक, कवि, कलाकार, गीतकार, के अंश ल समोवत जतेक मोर मति पुरीस, दु बूँद माता जी के सिरी चरन म अरपित करत कोरा कागज म अपन सरदा के भाव चढाये के उदीम करेंव। ये कारज म पंदोली देवइया गुनवन्ता पूजनीय डॉ. मंगत रवीन्द्र, डॉ. अनिल भतपहरी, सिरी डी. एल.
दिव्यकार, सिरी पुरानिक लाल चेलक, भाई संतोष कुर्रे, अजय अमृतांशु अउ दीदी उषा बारले जी (पंडवानी गायिका) के मैं अंतस ले गुनमानिक हव माता जी बिसाल हिरदे के रहिस, उँकर कतको परमुख कारज परगट करे बर बिना आरो के छूटगे होही तब संत, मंहत गुनी पाठक मन सम्हार लेहू अउ ‘जकहा’ समझ के छिमा करिहा।

सुझौती के अगोरा म…
असीस लोभिया
अनिल जाँगडे
कुकुरदी- बलौदा बाजार
तारीख-20 जुन 2016

नार–पात

1. भाग-एक : दु:ख के हवे लागे आगी
2. भाग- दो : मीनाक्षी ले मिनी गुरूमाता
3. भाग-तीन : सतनामी रीत के बनइया पहिचान
4. भाग-चार : घर अंधियार, मंदिर म दीया बारे ले का होही ?




भाग एक
दु:ख के हवे लागे आगी

बिसाल बिरछा नानकुन बीजा भीतर समाये रिथे, इही बीजा खातु, माटी म बडका होके फूलथे, फरथे अउ देथे। मनखे भीतर अन्तर्मन म समाये सक्ति बिरवा बीजा बरोबर होथे। जेन सुन्दर गुनान (विचार) संस्कार रूपी जल पा के अमोल सक्ति के परगट होय म मनखे महान बनथे | गुनी, संत, महात्मा कहाथे | संत, महात्मा के मुखारबिंद ले विचारे गियान ले सीख मिलथे. .. सब नर के भीतर नारायन (सतपुरुष) बसथे। गीद गायन मन पंथी गीत म गाथें…

“घट-.धट म बसे हे सतनाम!
खोजे ल हंसा कहाँ जाबें जी” ?

मनखे जिनगी, सतनामपिता! के देये वरदान आय। निरमल जल म काया ल धोके जइसे साफ रखे जाथे, वइसने मन वचन के निरमल रहे म अपन अंतस भीतर के सक्ति जब कोनो मनखे चिन्ह लेथे अउ परमारथ म जिनगी अरपन कर देथे तहाँ उल्लू पूजनीय हो जथे। छत्तीसगढ के महतारी मिनीमाता परे, डरे, दु:खी, भूखी, अनाथ, लचार बर अपन जिनगी अरपित कर दिस। छत्तीसगढ के कोन अभागा होही ? जेन माता जी के दुलार नट पाय हो हय ? दुकाल के कोख म जनमें माता जी दु:ख हरनी, तियागी रहिस।

भारत के आतमा गाँव म बसथे, हिरदे कहाथे छत्तीसगढ | छत्तीसगढिया के सिधवा, भोलापन ल देस, दुनिया जानथे। इहाँ के मनखे खेती- किसानी म रमे रिथि। संतोस सुख, मरजाद धन होथे। छत्तीसगढी म कहावत हे..जान जाय फेर मरजाद झिन जाय।

छप्पन के अकाल, अघारी अउ परवार के गाँव छोडना —

छत्तीसगढ के खेती-किसानी सरग भरोसा, कभू धरती के पियास बुझाथे, त कभू पियासा रहि जाथे। सन 1896 से 1899 तक तीन बछर के सरलग दुकाल कभू नीं भूलाये जा सकै।

सम्वत के हिसाब ले ये दुकाल छप्पन के बनथे, येकर सेती छप्पन परगे छत्तीसगढी मुहावरा बनगे | ये दुकाल घेरी–घेरी विपदा के सुरता कराथे। कुँआ, तरिया, नदिया, नरवा, डबरी-पोखर जम्मो सुखागे | चहूँ ओर हाहाकार मातगे । चिरई-चुरगुन अउ कतको जीनावर पियास म परान तेज दिन। बडे-बडे गौटिया, जमींदार मन के कन्हिया ढिल्ला परगे। भूख म बेहाल परान बचाये के उदीम खोजैं। कमाये खाये बर परदेस जाये के सिवाय कोनो रद्दा दिखीस | कलकत्ता, असम, खडकपुर, कोइलारी (बिहार) बर सब बगरगैं।

छप्पन इही के दुकाल म बिलासपुर पंडरिया जमींदारी गाँव सगोना के मालगुजार अघारीदास मंहत अउ परवार फसगे। दाना-दाना बर तरसगैं, कइसे परान बाँचय ? उदिम करै जोखा नइ माडिस। परवार लेके घर छोडे बर परगे । सुवारी बुधियारिन, बेटी चाउँरमती, पारबती अउ देवमती ल लेके अघारी गौटिया गाँव छोड दिस, बिलासपुर रेलवाही आगे। राहत के नाव म अंग्रेज सरकार जगा-जगा सरकारी कीचन म बघरी बांटय । रेल्वे टेसन के कीचन म बघरी खाय बर मिलगे। ओ बखत के सियान मन किच्चक खाना काहैं। खाय के बाद परवार सहित टेसन के रुख तरी सोगैं, नींद कहाँ आवै ? विपदा आगू ठाढे। असाम चाय बगान के अड्कारी (ठेकादार) ठउका मिलगे। भूख मिटाये बर बटोही मिलिस। असाम जाय बर अघारी तियार होगे। परवार ल लेके रेलगाडी म चढगैं, बिना बिलमे रेलगाडी छुक-छुक दउडे बर धरलिस । नान्हे-नान्हे लइका भूख म बियाकुल, एक दाना अन्न निंही, भूख म अतङडी अइठे लागीस ।




रेलगाडी म बेटी पारबती बेमार परगे । भूख-पियास म काया रूरगे राहै, हाथ म कौडी पइसा निंही, कहाँ ले दवई-दारु लानै ? रद्दा म बेटी के हंसा उडगे। करम ठठावत रहिगे अघारी |

महतारी के आँसू कहाँ थरकै ? चेत ल बिचेत होगे। बेटी के काया धरती ल कइसे सउँपै ? अघारी गौटिया सदगुरू बाबा घासीदास जी ल सुमरिस । बिचारिस रद्दा म गंगा माई दरस देतिस त सउँप देतेंव, रेल दउड्ते रहिस, गंगा के पाट दिखगे । बेटी के काया महतारी बुधियारिन के गोदी ले उठावत अघारी के हाथ थर-थर काँपत रहै, सतनाम! ल सुमरके चलती गाडी म गंगा माई ल सउँप दिस…अभागिन ल तार लेबे दाई…

‘कठिन कल्पना म डारे साहेब मोला
काबर तैंहा अवतारे साहेब मोला”?
रेल म बइठे मुसाफिर मन घटना ल सउँहात देखिन, सबके करेजा फाटगे । महतारी बिसुध, दुनों बेटी रहिगे चांउरमती अउ देवमती ।
“माटी के काया
माटी के चोला
के दिन रहिबे बतादे मोला”?
कलकत्ता से असाम बर गाङी बदलीन, येती बेटी चाउँरमती घलु मुरछा खागे, अघारी निच्चट कठवाये निहारत राहै, करम के रेख कोन टारै ? देखते देखत दूसर बेटी चाउँरमती परान तेज दिस’…। हाय मोर दाई…! गोहार पार के महतारी रोय लागीस आँखी उसवागे राहै।

“‘चार खुरा चार पाटी, पाटी म बरे दीया”।
संतन बोह ले जाही, तरही माटी म काया
चार खुरा, पाटी न दीया–बाती, चार संत मुक्तिधाम नहीं, भट्टगे! बाप अकेल्ला, बेटी चाउँरमती के काया पद्मा नदिया म सउँपत गुरु ल सुमरथे…
‘”दु:ख हो गुरू मोरा, हरिहा गुरु मोरा
तन दुरखिद, मन के विपदा हटैहा गुरु मोरा
दु:ख के हावे लागे आगी
जीव लेके उठही कहाँ भागी ?
अरजी सुनिहा साहेब मोरा”।
दाई बुधियारिन कंदरन लागिस, कोरा सुन्ना होगे…. ।
दुनों नोनी दाई के कोरा ले उतरगे, गंवा डारीस बेटी मन ल…. अघारी के आँखी पथरागे, रोवै फेर आँखी म आँसू नीयें…. रहिगे छ: बछर के बेटी देवमती।

असाम के चाय बगान म रहिके मंझली बेटी देवमती, दाई संग काम–बुता सीखे ल धर लीस । कोरा ले उतरे दुनों बेटी के चिंता म दुरखियारिन दाई रूरगे…परगे बेमार, खटिया धरलीस, अघारी अब्बड दवा करीस खर नीं खाइस, दुनों बेटी के संगवारी होगे… धरती के कोरा म समागे दाई ह। अघारी के मुड उपर पहाड अस दु:ख, का करै बिचारा…? गाँव के बडका किसान अघारी गौटिया काहत लागै…कभू बुता करे नइ रहिस जीव बचाये बर का करही…? बुता करे बर परगे | रात-दिन के संसो, सरीर निच्चट सोखवा होगे… दुकाल लपेटलीस अघारी ल…।

देवमती मुरही बनगे, दाई न ददा सात बछर के नान्हे लडका कहाँ जावै ? कोन ल गोहरावै? बेमार परगे, कोनो सहारा निहीं.. एक झिन दयालु मनखे दोलगाँव के अस्पताल म भरती कर दीस ।
‘तरफत मछरी ल गुरु
पानी म ढीले हो
उदी दिन मछरी ल
नवा जनम मिले हो’।




दोल गाँव के अस्पताल म देवमती के ईलाज–पानी होइस, बने होगे। बिचारी कहाँ जातीस ? अस्पताल धाम बनगे, अउ नसबाई मन के दुलौरिन होगे, बेसहारा ल परवार मिलगे। उमर संग भूख बाढत गिस, बुता धरलीस, रोजी एक तांमा पइसा। बुडत ल तिनका सहारा। अस्पताल म बूता करइया बगांलीन मौसी मिलगे, अपन घर ले आइस, सिखाइस-पढाइस मन ल बोधिस ।

मीनाक्षी के जनम —
असम के जिला नवागाँव ग्राम सलना निवासी बुधारी दास मंहत, सतनामी समाज के भंडारी रहिस। एक दिन मौसी संग भेंट होगे, कैसे भंडारी…? भंडारी जी इस कन्या (देवमती) का हाथ पीला कराकर ठौर ठीकाना नहीं लगवागें…? भंडारी देखिस…. सगियाँन, हसमुख, जात–जतुवन देवमती ल… मौसी ल कहिस, तोर मन असीस त मौसी… अपन घर के लछमी बना लेतेंव । बुधारी अउ देवमती के जोडी बनगे, नता–गोता, संगी-सजन, जान-पहचान सबो सुग्घर असीस दिन। मुरही ल घर मिलगे, देवमती आरुग मन के राहै, नता-कुनेता ल चुम्मुक असन अपन कोती खींच लेइस ।

आसा-बिसवास अउ सुन्ता बने रहे ले जिनगी भर नर-नारी सुख के रहचुल घर-अँगना मया म बगिया असन गमकत रिथे। इही मया संसार बसाथे; दू जिनगी ले बिस्तार बाढथे।

जोडी-जाँवर सुख-दु:ख के संगी होथे, मया-पिरीत पूजा ये, जान डारीन देवमती अउ बुधारी, बिसवास के गठरी म बँधागे । दूनो के संग नइ छूटै। बारह महीना बीतिस, देवमती ल आओकियासी आइस, सखी-सहेली आरो पाइन, कहिन, देवमती भारी पांव हे, बुधारी के भाग खुलगे, सुनतें मन म खुसी समागे, सोचे लागीस मोरो अँगना म किलकारी ।

हिन्दू धरम के परमुख तिहार होली के दिन 13 मार्च सन 1913 के अधराति नोनी अवतरीस । (माता जी के जन्म दिन पर लेखको का मत भिन्न है रायपुर के बस स्टैंड में माता जी की आदमकद प्रतिमा के शीला पट्टी पर जन्म तारीख 15 मार्च सन 1911 अंकित है) घर-परवार म उछाह मंगल मनाइन। कोन जानत रहिस ? दुरखियारिन देवमती के कोख ले अवतरे बेटी एक दिन छत्तीसगढ के महतारी कहाही ।

नान्हेपन ले आजादी के लडई म संघरना —

नोनी के जनम बाद बुधारीदास परवार सहित सलना ग्राम ले जमुना मुख आगे इहाँ गाँव म मीनाक्षी हर मिडिल तक पढहिस, इही सिक्छा नवा रद्दा देखाइस । जमुना मुख के मदरसा म मिले गियान छत्तीसगढ के अंधियारी म अंजोर बगराये के उदीम होइस | मीनाक्षी हर पुन्नी कस चंदा सुग्घर रहिस, पढई-लिखई म गुनवतींन। हिन्दी, अंग्रेजी, असमी भाखा म गियान पाइस ।

भारत भर अंग्रेजी सासन उखान फेंके बर अंग्रेज भगाव के नारा सुनई देत रहिस। इही बीच असम म जगा–जगा हडताल सुरु होगे, महिला दल के संग महतारी देवमती संघरजै अउ आने महिला असन खादी के कपडा पहिरय, घर म चरखा चलावै; महतारी ल देख के बेटी कहाँ पीछू राहै ? मीनाक्षी घलु बालपन सुभाव म आजादी के लडई म संघरगे आगू चलके बच्चा दल के अगुवई करीस । सन 1920 म भारत भर स्वदेसी ओनहा अपनाये बर आंदोलन चलीस, अंग्रेज ल हीनहर करके भगाये खातीर बिदेसी कपडा-लत्ता के होरी बारीन स्वदेस म बने जीनिस बढउरे बर जन–जागरन चलाइन। असम म मीनाक्षी लइका दल संग घर-घर जाके बिदेसी कपडा-लत्ता सकेलय, तहाँ चउँक-चौराहा म आगी लगा देवयं | राजनेता मन के आंदोलन देख के नकल करत बच्चा दल ल उछाहित करै. नवा जोस भरै, ये बुता म खुब्बेच नाव कमाइस |

मीनाक्षी, ले मिनी गुरूमाता




देस सुतंत्र होगे। सतनामी समाज उपर अट्दताचार कम नई होइस । अनुमान मुताबिक सन 1880-85 के तीर-तार छ.ग. छेत्र म सिक्छा के दुवार खुलगे रहिस । सहर अउ कस्बा म मदरसा (पाठशाला) खुलीस | भेदभाव के चलते समाज म सिक्छा उपर चेत नट करत रहिन तभो ले समाज के मालगुजार अठ गौटिया परवार के कोनो-कोनो लइका पढे-लिखे बर धरलिन। आजादी के बाद भारतीय संविधान म छुआछूत ल अपराध माने गिस । उल्लंघन करइया ल दंड के भागी बनाइस | तब जाके सोसित समाज म सिक्छा पाये के हिम्मत आइस | भंडारपुरी गुरुद्वारा सामाजिक दसा के सुधार बर चिंतन-मनन के ठउर रहिस। संत, महंत, भंडारी, साटीदार मिलके गुरु अगम दास जी के संग समाज के बेवस्था बनाये रखे बर गुनान करैं । जेन गाँव म भंडारी, साटीदार नइ रहिस उहां चुने गिस। समाज ल एक फेट करे खातीर दुरिहा-दुरिहा बसे खातीर दुरिहा–दुरिहा बसे सतनामी समाज के बीच पहुँच के गुरुजी संत समाज के बिचार जानै, समाज के बढोत्तरी (विकास) अउ सुमत बर जोर दै।

रामत म गुरू अगम दास जी के असाम पहुँचना —

सतनामी समाज के जगत गुरु अगमदास जी अपन सेवादार, सिपाही, राजमहन्त मन ल लेके समाज सुधार बर रामत निकलै । बाबा गुरू घासीदास जी के सतनाम संदेस के परचार-परसार करत सन 1932 म असाम पहुँचगे, भंडारी बुधारी घर डेरा पारीस। असाम के सतनाम पंथी नर-नारी अउ भंडारी बुधारी के परवार सहित गुरु दरसन पा के मगन होगैं.

अपन भाग सहरावत कहिस–

“मोर सोये भाग आज जागे हो साहेब
हमार अँगना म आइके बिराजे हो”…।

गुरू के चरन पखारके परवार सहित भजीन…दाई-ददा संग मीनाक्षी घलु भजीस । मीनाक्षी ल देख के गुरुजी नांव पूछीस | पढई-लिखई अउ नाव बताइस । गुरूजी के एको झिन संतान नीं रहिस। गद्दी के अधिकारी बर संसो राहै, गुरुजी के इसारा समझ के राजमहन्त मन बात चालीन, बुधारी अपन भाग सहरावत हामी भर दिस।

“कंहुवा ल लानव साहेब, आरुग फुलवा
कइसे के तोला आरुग फुलवा”?




इही ओ समे ये छत्तीसगढ के भाग सँवारे बर बुधारी अउ देवमती बड सर्वा के संग फूल असन बेटी मीनाक्षी ल गुरूजी के चरन सौंप दिस। देवमती उही महतारी ए, दुकाल, छत्तीसगढ ले दुरिहा दाई-ददा संग असाम के चाय बगान पहुंचा दे रहिस । गुरुघासीदास बाबा जी के लीला देख, गुरूमाता कणुका देवी के कोख ले 07 दिसम्बर सन 1895 ग्राम तेलासीपुरी धाम ‘ अम्मरदास बाडा’ म जनमें अपन तीसर पीढी के गुरु अगमदास जी पिता सिरी अगरमन दास गुरू गोसाई संग नाता जोर के पैंतिस बछर ले छूटे छत्तीसगढ भूईंया म फेर लहुटा लिस।

मीनाक्षी के बिहाव

मीनाक्षी हर परवार संग छत्तीसगढ आगे। गुरू अगमदास जी सतनामी समाज के राजमंहत, सेवादार, भंडारी, साटीदार, अउ लाखों लोगन के बीच म गाँव बरडीह (खरोरा) जिला–रइपुर 2 जुलाई सन 1930 म बिहाव रचाइस । सब संतन जयकारा बोलाइन, नाव बदलगे, मीनाक्षी ले मिनीमाता कहाइस ।

“छत्तीसगढ के धन भाग
बिहाव रचाये गुरू अगमदास
गुरुमाता के दरजा पाइस,
मीनाक्षी, मिनीमाता कहाइस” ।




मिनीमाता के गिरहस्ती जीवन हर सुख म बितीस, संतोसी सुभाव के, छल-कपट, ईरखा, लोभ माता जी के तीर आये बर डर्रावय। फेर एको झिन संतान नीं रहिस, नारी जात के कोख सुना रहें ले, संतान सुख नइ पाये ले भीतरे-भीतर उंखर मन म चिंता के घुना खावत रडथे जिनगी अबिरथा अड्डसन म जेन नारी हर दूसर के लइका ल अपन समझ के संवास लेथे अउ मया बरसाथे तहाँ आधा दु:ख भुला जाथे गुरू माता घलो स्त्री ये, संतान नई रहे ले अंतस म पीरा काबर नइ रहिस होही ? फेर छोटे बहिनी करूनामाता के पुत्र विजयकुमार गुरू ल खुद के संतान ले कम नई समझीस, घाद-दुलार पुरोइस । संगे संग लाखो सतनामी समाज ओकर बेटा-बेटी बरोबर रहिन।

जब देस अंग्रेजी गुलामी से छुटे बर जुझत रहिस, उही समे गुरू परवार म माता के गिरहस्ती बसीस । माता जी गुरु परवार के चंदा रहिस । गुरु अगम दास के संग भारत के सबों जगा जाय–आय के मउंका मिलीस अ देस-परदेस म जनता के समस्या ल जानिस, समझिस। गुरूजी घर सुराजी जोधा मन चिंतन-मनन करै। रयपुर मं मोवा भाठा के मकान आजादी बर लडइया सेनानी मन के बइठका ठउर राहय । पंडित सुन्दरलाल शर्मा, ठाकुर प्यारेलालसिंह, डॉ. खूबचंद बघेल, कान्तिकुमार भारती, मंहत नैनदास महिलांग, मंहत भुजबल जइसन देसभक्त मन गुरू परवार के घरौधी बरोबर रहिन। सतनामी समाज के गुनीजन, जोद्वा आजादी के लडई म समरपित होके लडीन अउ अगवई करीन । ये जोधा रहिन राजमंहत नैनदास महिलांग सलौनी (बलौदाबाजार) अंजोरदास कोसले देवरी (मुंगेली) रतिराम मालगुजार केंवटा डबरी, राजमंहत अंजोरदास सोनवानी हरिनभठ्ठा, (सिमगा) मूलचंद जाँगडे, रेशमलाल जाँगडे परसाडीह (बिलईगढ) नकुलढीढी भोरिंग (महासमुन्द) नन्दू भतपहरी जुनवानी (पलारी) अउ हजारो सतनामी बघुवा अपन तन, मन, धन निछावर कर दिन। देस के आजादी खातीर जेल गिन । बडका नेता सुराजी मन के सांघरो माता जी पाइस, काम करे के मंउका मिलीस । गुरू अगमदास बघुवा बेटा मन ल तियार करै। रयपुर अउ भंडारपुरी के गुरूद्वारा म बडका बइठका करके लडे के रद्दा तियार करत अंग्रेजी सत्ता ल उखान फेंके बर उदीम करैं। अंग्रेज सोचय सामाजिक सुधार बर बइठका म एकर सेती नजर नई फायदा सुराजी मन ल मिलै।

गुरु अगम दास जी सन 1932 म रयपुर मं जमीन बिसाइस जिहां सतनामी आसरम बनाइस | जेला साहेब बाडा के नाम से जाने जाय। सन 1937 मं ग्राम बरडीह (खरोरा) ले छोड के परवार सहित बलौदाबाजार तहसील के गाँव खडुवा (सिमगा) म बसगे ।

छत्तीसगढ के हर गाँव गुरूजी के अपन गाँव रहिस, गाँव के मन परवार। रामत म कोनो गाँव पहुँतीस, सरद्वा म लोगन मन के माथ नव जाय, पानी ओछारैं, गुरुजी अउ माता के चरन पखारके असीस लेवैं। गुरूजी असीस देत गियान बांटत काहै…..’संसार विराट हे, जउन नजर म देखत हन इही सत आय, जेला देख नई सकन, संग म गोठिया नई सकन, ओकर जगा अपन दुख गोहराथन, फूल, पातर चढाथन, मठ, मंदिर के चक्कर म पंडा, पुरोहित मन करा लुटाथन, कुछु नइ मिलै तभो ले फोंफा असन झपावत दुख मोल लेथन । कस्तुरी मिरगा कस भटकत र्थिन। जब अपन अंतस के देव ल जान-परख लेबोन, पहिचान जाबो, तहाँ कोनो मंदिर म जाके ठोकर खाय बर नट परै । सतनाम! के संदेस ल जानव, गुरू घासीदास बाबा के बताये मारग म चलव। गीत गायन मन पंथी गीत म गाथें…

‘”मंदिरवा म का करे जइबो ?
अपन घट के देवा ल मनइबो’।

बाबा जी के सतनाम! रूपी डोंगा म भवसागर ल पार करे जा सकथे।

गो रक्षण समिति म गुरू अगमदास जी —

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस बने के पाछु जुलई 1888 म गो रक्षण समिति बनाय गिस | आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयांनद के सुझाव म देस भर समिति गठन होइस | गो रक्षण समिति म बाल गंगाधर तिलक, मदन मोहन मालवीय जी मन घलो रहिन। छत्तीसगढ म पंडित सुन्दरलाल शर्मा, धर्म गुरू अगमदास जी, राजमंहत नैनदास महिलांगे, राजमहन्त रतिराम मालगुजार, महंत अंजोर दास सोनवानी, महंत बिसाल दास, महंत बिसौहाराम अउ मदन ठेठवार जी जट्टसन देसभक्त, समाज सेवक मन समिति म रहिन।

बलौदाबाजार (नवा जिला) के नजीक गाँव ढाबाडीह, करमनडीह म अंग्रेज मन बूचडखाना चलात रहिन। जिहां हर सप्ताह सैंकडों मवेशी (गाय-बैल) काटे जाय तहां मांस ल भाटापारा रेल्वे टेसन से मद्रास, कलकत्ता बर भेजे जावै। कत्लखाना अंग्रेज के देख-रेख म चले के सेती बिरोध करे के ताकत कोनो कर नट सकत रहिन। गुरु अगमदास के असीस पा के राजमहन्त नैनदास महिलांगे आगू आइस । सन 1914 से 1924 तक बूचडखाना बंद कराये बर आंदोलन करिस। ये आंदोलन म पंडित सुंदरलाल शर्मा, राजमहन्त रतिराम, महंत अंजोर दास सोनवानी, मदन ठेठवार मन पूरा संग दिन। आखिर म बूचङडखाना बंद होगे। सन 1924 म राजमहन्त नैनदास महिलांगे ल कानपुर कांग्रेस अधिवेशन म देस के परथंम ‘गो रक्षक सपूत’ के उपाधि देके सम्मान करे गिस। गुरु अगमदास साहेब धर्म गुरु होय के नाते सतनामी समाज के समाज सेवक, देसभक्त मन ल असीस अउ बल देत राहै।




गुरू अगमदास के सतलोकी होना —
संसार म प्रकृति के नियम हे, सिरजन अउ बिनास। सिरजन संग अवरदा लिखा जथे, चेतन होय या अचेतन अवरदा भर र्थि। बिसाल महल एक दिन खंडहर दिखथे । जनम के पीछु मिरतुका अटल सत ए। आतमा (जीव) मर्जी के मालिक होथे, जाय के बेरा धरे-बाँधे, रोके–टोके नीं जाय सकै। लाख छेका पर जाय, चाहे कछु उदीम होय, चोला ले हंसा कब उड जथे ?

गम नी मिलै। सन 1952 म गुरू अगम दास जी आपसरू सतलोकी होगे | तब गुरूजी रयपुर लोकसभा के परथंम संसद सदस्य रहिस । सतनामी समाज ठगागे, गुरूजी संग छोड दिस । गिरहस्ती सुख म माता उपर जिनगी भर के दुख झपागे, बडका समाज, पतवार कोन खेवै, गुरू विजय कुमार नाबालिक, परवार, समाज अउ राजनीति के बोझा माता जी के मुड खपलागे। गुरू मान (गरिमा) घलु बना के रखना रहिस। गुरुमाता गुनवतींन अउ हिम्मतवाली रहिस। काबर नट रडही ? असम के धरती म उपजन–बाढन, बडे-बडे नदिया के लहरा संग

खेले, जुझे, घर-परवार अउ समाज के धुरा थाम लिस । सन 1953 के लोकसभा उपचुनई म पहली संसद सदस्य बनीस । पुत्र के नाबालिक रहे ले गुरुगद्दी घलु सम्हारे ल परगे।

गुरू अगम दास जी के साथ मिनी माता जी

भाग-तीन
सतनामी रीत के बनइया पहिचान

भारत से अंग्रेजी सत्ता उखान फेंके खातीर सन 1920 म महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन देस भर चलिस। असम म मिनी माता जी दाई देवमती संग चरखा चलावै, तहां ले देसभक्ति के भाव मन म जागिस। नान्हे पन ल माता जी देस के आजादी बर जुझत देसभक्त मन ल देखे रहिस। गुरु अगम दास जी के संग सन 1930 म छत्तीसगढ आइस ।

मिनीमाता जी के राजनीति जीवन

15 अगस्त सन 1947 मं भारत सुतंत्र होगे। आजादी के बाद ले छत्तीसढ सहित देस भर सन 1950 से 1970 के समे राजनीति म कांग्रेस के जोर रहिस। गुरू अगमदास जी कांग्रेस पार्टी से रयपुर लोकसभा ले सन 1952 म पंरथम संसद सदस्य बनीस। गुरुजी के सतलोकी होय के पाछु मिनीमाता जी लोकसभा उपचुनई म पहली संसद सदस्य सन 1953 म चुने गइस । छत्तीसगढ म परथंम महिला संसद सदस्य बने के एतिहासिक नाव जुडगे। दूसर लोकसभा सदस्य सन 1957 में बनिस। तीसर चुनई सन 1962 अउ चउंथा सन 1967 के चुनई म सरलग जीत के रायपुर, जांजगीर, बिलासपुर अठ सारंगढ लोकसभा छेत्र ले संसद सदस्य बनिस | जब-जब माता जी चुनई लडिस, जीतते गिस। कहे जाथे न…. |

कर्मयोगी के साथ होकर
हर पत्थर साधक बन जाता है।
दीवारें भी दिशा बताती है
जब इंसान आगे बढ जाता है।।

अपन चुनई छेत्र ल कार्यकर्ता भरोसा छोडके दूसर के छेत्र म जाके परचार करै। लोगन म माता जी उपर अतेक भरोसा राहै, खुद के परचार म जाये बिना भारी अंतर ले जीत मिल जाय। संसद सदस्य के बने ले देस बर अब्बड काम करीस।

“भेदभाव चतुवारन कानून लाइस ।
दलित के हक मान देवाइस ।।
बियाकुल देख नारी दसा ।
बुझाइस, बेटी पावै सिक्छा” ।।




संविधान बने के बाद भारतीय समाज के कोढ छुआछूत नड मिट पाइस दलित के उपर होवत भेदभाव अउ अत्याचार खतम न् होइस । तब अनुसूचित जाति के संसद सदस्य मन मिलके छुआछूत के खिलाफ कानून पास कराय बर पंडित जवाहर लाल नेहरू अउ तत्कालिन गृहमंत्री डॉ. काटजू से निवेदन करीन। कानून पास कराये बर श्री एन. एस काजरोलकर (बम्बई), श्री रानानंद दास (पश्चिम बंगाल), श्री पन्नालाल बारुपाल, (राजस्थान) श्रीमती मिनीमाता (मध्यप्रदेश), श्री रेशम लाल जाँगडे (मध्यप्रदेश), श्री बी.एस. मूर्ति (आंध्रप्रदेश), श्री कन्हैयालाल वाल्मीकि (उत्तरप्रदेश), जडसन दलित नेता मन प्रस्ताव बनाइन अउ मिनीमाता ल अगुवाई करे के बुता दिन। पंडित जवाहर लाल नेहरू अउ बाबा साहेब आंबेडकर के मार्गदर्शन म 17 अप्रैल 1953 म संसद म प्रस्ताव (अस्पृश्यता निवारण कानून) ल रखिस । 28 अप्रैल 1955 म लोकसभा 2 मई 1955 म राज्यसभा ले भेदभाव चतुवारन कानून पास होगे | 8 मई 1955 म राष्ट्रपति के मंजूरी मिलगे । 1 जून 1955 म देस भर कानून ल लागू कर दिए गिस।

ये कारज म देस भर माता जी पहिचाने गिस अउ सनमान पाइस । बडे-बडे राजनेता सहराइन। बाबा अम्बेडकर, बाबू जगजीवन राम, डॉ राजेन्द्र प्रसाद, डॉ. सर्वपल्लीराधाकृष्णन, वाय.वी. एस.चब्हाण, लालबहादुर शास्त्री, पंडित रविशंकर शुक्ला, पंडित सुंदरलाल शर्मा जइडसन दंबग नेता मन माता जी के साहस अउ लगन देख के अचरित राहै। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी अपन सखी मानै। येकर सेती माता जी जगा विपदा लेके गोहरड्डया मनखे के कमीं न् राहै। फरियादी मन के काम कराये बर माता जी कोनो कसर नई छोड्य | खुद दप्तर जावै, काम करा के लहुटय | माता सरूप ओकर हरेक कारज म परगट होय, दुवा-भेदी न् जानीस | जात, परजाता सबो बर मरती मरय, मया–दुलार दै। गरीब, अमीर, राजनेता, बैपारी, किसान, बनिहार जम्मो के बिपदा हरै। दुखिया मन ल भरोसा राहै माता जी छोड कोनो दूसर दुख नीं हर सके। सरन म पहुँच जावै । साहित्यकार श्रीकांत वर्मा ल अपन दुलार पुरोइस, टिकट देवा के संसद म पहुँचाइस | इहाँ तक बहू पंसद करके श्रीमती वीणा वर्मा संग बिहाव करा दिस | कामरेड मुक्तक मजदूर नेता के पूरा मदद करै। कवि मैथ्यु जहानी ल अपन अंचरा के म रखीस | सिरी भंवर सिंह पोर्ते, सिरी कन्हैयालाल कोसरिया, सिरी किशनलाल कुर्रे अउ चन्दू लाल चंद्राकर ल राजनीति के उच्च पद तक ले जाके छोड्रिस। अट्टसने रयपुर लोकसभा के संसद रहे सिरी केयूर भूषण मिश्रा ल गोदनामा लेये संतान बरोबर मानिस, येकरे सेती केयूर भूषण जी अपन नाव म मिश्रा सरनेम लिखबे नइ करीस । जेन मनखे माता जी ल गोहराइस, सबो ल सुख बांटिस, महतारी के करतब निभाइस । इही गुन कर्म माता जी ल ऊँचा उठा दिस।

समाज सेवा के कारज म समरपित —
‘”करुणा की तुम सागर हो
ममता की बनी ।
डूबती नाव सागर में माता
दुखियों का पतवार बनी” ।।




कहूँ मनखे के सुभाव सुंदर हे, अंतस पबरित हे, तब घर म सुमत रिथि। सुमत अउ सांति रहे ले घर-परवार, पारा-परोस, के संग देस राज के बिकास म बढोत्तरी होथे। गुरू घासीदास बाबा जी के अमरितबानी हे… “अपन ल देख दूसर ल देख; बेरा देख, कुबेरा देख, जउन हे तउन ल बाँट बिराज के खाले”। खुद के पीरा असन दूसर के पीरा होथे, समझे के बात आय; दूसर के दु:ख म खडा होय ले दु:ख बंटा जथे; दुखिया ल हरू लागथे। गुरू बाबा जी के सात उपदेस अउ बियालिस अमरितबानी कर्मयोग के सिक्ठा सनमान हे। सात उपदेस म जीवन मुक्ति के बिधान हे अउ बियालिस अमरितबानी म निस्कपट जीवन जीये के मंतर (सूत्र) हे। इही मंतर ल माता जी अंतस म बसाके सेवा भाव के रद्दा धरिस अउ जीवन के साधना समझ के समाज सुधार के बुता म समरपित होगे। भंडारपुरी गुरूद्वारा दुखिया मन के दरबार रहिस । अट्टसने नई दिल्ली के नार्थ एवेन्यू निवास म फरियादी के रेम लगे राहै। सबके सुख-दु:ख पूछय; खवातिस-पियातिस, रात रूकइया मन बर ओढे-बिछाये के जोखा मडावै। पूस के रात जाड बाढे राहै; एक घवं दुरिहा-दुरिहा ले आये फरियादी माता के निवास म रात रहिगैं; पूरत ले सब बर चद्दर, कंबल दिस; जइसे जगा पाइन सोगे। सब के सोये उपर माता जी चारो कोती घुम के सरेखा लेथै; काकरो बर ओढना-दसना तो नट खंगे ये ? तभे सीढी म सोये एक झिन मनखे दिखगे; ओहा जाड म कांपत राहै; माताजी अपन ओढे कंबल ल ओढा के अपन खोली म आके सुतगे । ओढे बर माता जी जगा कुछु नीं रहिगे; जस रात तस जाड। नंडकरानी करा सिगङडी जलवाइस; पंलग तीर रखवा के किवाड बंद करके सोगे। सिगङी के कुहरा खोली म भरगे; माता ल अकबकासी लागिस; नींद उच्चगे; माथा चकराये ल धरलीस; कपाट खोलीस तहाँ मुहटा म मुरछा खाके गिरगे | डॉक्टर ल बलाके इलाज करवाइन तब परान बांचिस । अपन जान जोखिम म ढारके दूसर के जान बचइया राजनेता कहाँ मिलथे ? अट्टसन संत हिरदे वाली माता जी रहिस।

मनखे ल समाजिक परानी माने जाथे; समाज म रहिके सुख-दु:ख बांटत जीथे–मरथे। मनखे–मनखे म मया–पिरीत राखे खातीर सामाजिक बंधन, कायदा होथे।

जेकर से सुमत बने रिथि। बिसाल समाज म मनखे एक सुभाव के नई राहै; गुनान एक नीं होय, उच्च-नीच होथे। बिचार भले अलग-अलग होय, फेर घर- परवार, समाज के सुमत बर अंतस एक करे बर परथे। तभे उन्नति के अगासा छूये जा सकथे। सतनामी समाज म गुरू पद उच्च माने जाथे। मिनीमाता जी समाज के गुरू गद्दीसीन रहिस। जाने, अन्जाने म समाज के मनखे से उच्च-नीच हो जाय तब कसुरवार जगा डाड म एक नरियर लेके जैतखाम! म फोरवा दै; निहीं त कसुर देखत सामरथ देख के अर्थदंड लेवै ओ रकम ल सामाजिक हित म लगा देवै। गुरू घासीदास बाबा जी के सतनाम संदेस, उपदेस के परचार अउ समाज सुधार बर गाँव-गाँव बइला गाडी म रामत निकलै । माताजी ल गाँव म पहुँचत सुन के समाज के लोगन मन आरती-मंगल के संग पंथी नाचत-गावत गाँव के मेडो ले परिघावत ले जावैं, चरन पखारैं, भजैं तहाँ सुख. दु:ख बतावैं। अउ सरदा म सक्ति मुताबिक गुरू टीका देके बिदा देवयै ।

“कवच दलित, सोसित के ।।
पहिचान बनाये सतनामी रीत के |
सेत बसन, माथ म चन्दन ।
भाग सहरावैं पा के दरसन”।।

माता जी करा अगला–उछला धन-दोगानी रहिस; तभो ले अंहकार ओला छुये नइ सकीस । जन सेवा ल सबले बडे धन समझीस | गुरूघासी दास जी अमरितबानी म कहे है-

‘”मोर हीरा ह तोर बर हीरा आय
तोर हीरा मोर बर कीरा आय”।

“मोर धन जम्मो संत मन के आय फेर धन मोर बर कीरा बरोबर ये, काबर ? पर धन के लोभ दु:ख के कारन होथे।’ माता जी धन नड् कमाइस, जन के मान पाइस । अपन हिसा के सुख बाँट दै; रोजी-रोटी बर भटकत मनखे ल सहारा दिस। पेट के खातीर अपन धरम बदलइया मन ल समझाइस; भटके ल रोकिस, भेदभाव करड्या ल टोकीस, लालच देके सतमारग से भटकइड्या मन ल फटकारिस, दिन-रात जन सेवा म लगे राहै। सादा जीवन उच्च बिचार के रहिस; मन म कुछु छल, कपट नीं राखीस।

माता मिनी जी परवार, समाज अउ राजनीति म कतको उच्च-नीच छल, छद्म देखीस, तभो हार नई मानीस | धन, सम्पति मान-सनमान बढई के गुमान मन म नई पोंसीस । बाबा जी अपन संदेस म कहे है-

“मोर संत मन मोला काकरो ले बडे झिन
कइहीं नइते मोला हुदेसना म हुदेसन आय”।

बाबाजी के बताये एक-एक संदेस ल गांठ बांध के धरिस अउ तपस्या मान के सतमारग म चलीस | खादी के सादा लुगरा म जिनगी खपा दिस। जन सेवा के बलदा ओला कुछु नइट भट्टस ।

किसान, बनिहार बर छलकत पीरा —

दूसर से कुछु लेये म ही सुख नींये, देये म भी सुख हे। दुखी-भूखी ल भोजन देके या हीनहर के मदद करके जउन आंनद मिलथे एकर ले बढके अउ कोनो खुसी नइये। जेन मनखे अपन अउ परवार के सुख भुलाके दूसर बर ओला कोनो दुख नई बियापै; अट्डसन मनखे जीवन म सच्चा सुख के भागी होथे। जस, अपजस अपन हाथ म हवै। दया. मया के भाव जतेक जादा अंतस म रहिथे, ओतके चंदा कस उजियारा जस बगरथे।




छत्तीसगढ के खेती-किसानी सरग भरोसा, जुआ खेले असन, सुकाल कभू दुकाल । नहर नाली नहीं के बरोबर; बादर बने बरस जाय त अमरित, निंही त धरती पियासे रहि जाथे।

बछर-बछर के दुकाल, किसान के करलई देखे नइ गिस । माता जी के नाना-नानी अउ परवार इही दुकाल म तिडी-बिडी होय रहिन। दुकाल के विपदा ले जुझत किसान ल बचाये बर गुनान करै, रद्दा नइ दिखय । बाबाजी के संदेस म परमारथ के सीख मिलथे। इही सीख ल माता जी धरिस। सतगुरु के मुखारबिंद ले निकरे अमरितबानी हे–

‘मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारा संतद्भारा बनावन मोला भावै नई, तोला बनायेच बर हे, तब जलाशय बना तरिया बना, कुँआ बना, धर्मशाला बना अनाथालय बना, नियालय बना दुर्गम ल सुगम बना”।

सतनाम साधिका मिनीमाता ल रद्दा दिखगे | हसदो बांध बर संसद म प्रस्ताव रखत कहिस, बांध बन जाय ले हजारों एकड खेती म पानी पहुँचही, फसल म बढोत्तरी होही । घेरी- घेरी दुकाल के मार से किसान ल बचाये जा सकत हे। सरलग दउड- धूप म हसदो बांध बनाये के मंजूरी मिलीस; काम चालू होगे | माता के सुरता म सन 1981 म बाँध के नाव मिनीमाता बांगो बांध रखे गिस ।

आजादी के बाद छत्तीसगढ म भिलाई इस्पात संयंत्र, बालको के एल्युमीनियम प्लांट, बैलाडीला, कोरबा, बचेली म बडका कारखाना खोले गिस | छत्तीसगढी पढे-लिखे जेवान मन ल नौकरी देत रहिस । येकर से माता जी ल अब्बड दु:ख पहुँचय । केंद्र अउ मध्यप्रदेश सरकार छत्तीसगढ छेत्र बर भारी दुभेदवा करै। इहाँ के समस्या के समाधान बर माता जी अपन अंतस के बात कहिके अलग छत्तीसगढ राज के दर्जा बर जोर दय | जेकर से छत्तीसगढ के बिकास हो सकै अउ बेरोजगार ल रोजगार मिलै। खनिज संपदा के दोहन छत्तीसगढ के विकास बर होय।

मजदूर समस्या ल लेके छत्तीसगढ मजदूर संघ के गठन होइस । सिरी विमल कुमार पाठक जी अध्यक्छ रहिन। मजदूर संघ दुवारा लगभग पाँच हजार छंटनी करे मजदूर, भू अधिग्रहण ले प्रभावित संयंत्र से निकाले 1500 किसान अउ छत्तीसगढिया बेरोजगार मन के रोजगार बर घेरी घंव धरना-प्रदर्शन होय। संघ के अध्यक्छ पाठक जी ल संयंत्र के मनेजर एक नई गमहेरत रहिस, तब हार–थक के मजदूर साथी मन ल लेके पाठक जी समस्या के निदान बर माता जी जगा पहुँचगे । माताजी समस्या दूर करे के भरोसा देथे अउ मजदूर मन के बिनय म मजदूर संघ के आजीवन अध्यक्छ बने बर तियार हो जथे।

सन 1967 के फरवरी महीना, माता जी के अगवाई म बढका रैली निकाले गिस। जेमा क्धियक सिरी धरमपाल सिंह गुप्ता, सिरी शिवनंदन प्रसाद मिश्र, डॉ. पाटकर, सिरी सम्बल चकवती, अउ सिरी सुधीर मुकर्जी छत्तीसगढ के हितवा अउ मजदूर नेता मन जुरियइन। भिलई इस्पात कारखाना म जउन किसान के भूईंया निकरे रहिस उही म के 1500 मजदूर मन ल छंटनी करके नउँकरी ले निकाल दे रहिस। इही रैली म छत्तीसगढ राज के मांग बुलंद करे गिस । दस हजार से जादा मजदूर, किसान जुलुस म रहिन। कारखाना के जनरल मनेजर चरचा करे बर माता जी जगा नेवता भेजीस | माता जी कहिस मैं रैली लेके आये हव; चरचा अकेल्ला नइ फेर एक घव जनरल मनेजर सरदार इन्द्रजीत सिंह बिनय करत अपन साथी सहित पहुँचे बर माता जी जगा संदेस भेजीस । साथी मजदूर नेता सिरी धरमपाल सिंह गुप्ता, सिरी शिवनंदन प्रसाद मिश्र, विमलकुमार पाठक, सिरी सुधीर मुकर्जी मन ल लेके माताजी इस्पात भवन गिस | चरचा सुरू होइस, जनरल मनेजर सरदार इन्द्रजीतसिंह ल माता जी एकटप्पा सवाल करीस–

”आप लोगों ने हमारे किसान, मजदूर पर अत्याचार किया है मैं आप से पूछना चाहती हूँ जनरल मनेजर आदेश क्रं. 20 के तहत अनुबन्ध में प्रभावित किसानों को पर्याप्त मुआवजा व संयत्र में स्थायी नौकरी पर रखने का प्रावधान है इसी तरह स्थानीय बेरोजगार युवकों को रोजगार देने केंद्र सरकार का स्पष्ट निर्देश है. फिर आप लोगो ने खिलाफत क्यों किया” ?

गलती तो कर डरे राहै, जनरल मनेजर के बोलती बंद होगे। हाथ जोर के मनेजर ह कहिस, “माताजी क्षमा करें इस समस्या का हल करना मेरे वश की बात नहीं है मुझे समय दीजिए इसके लिये इस्पात मंत्रालय भारत सरकार के पास प्रस्ताव भेजना होगा” । माता जी अउ मजदूर नेता मन लहूट के आगैं। आम सभा होइस, माताजी गोठियावै छत्तीसगढी, भासन घलु छत्तीसगढी म दिस | सुनके मजदूर, किसान अधिकार बर जागीन। आमसभा उसले के बाद गुरु माता दिल्ली पहुँच के प्रधानमंत्री जी श्रीमती इंदिरा गांधी जी अउ मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री सिरी श्यामाचरण शुक्ल जी से भिलाई संयंत्र के मजदूर समस्या ल रखिस आखिर म निकाले भू-अर्जन से परभावित 1500 मजदूर ल नौकरी म फेर लहुटाइस संग म छंटनी करे अउ मजदूर मन के घलु फायदा होइस । अपन आखिरी सांस तक छत्तीसगढ अउ छत्तीसगढिया के हक खातीर लडुई लडीस; कतको ल नंउकरी मिलीस। माता जी सर्वहारा के पूज्यनीय होगे ।
”गुथे, बुने देखाये, राज छत्तीसगढ सपना ।
कहे उंघवा गंवाथै, हवै हक बर जागना ।।
कोरबा, भिलई, हसदो, तोरेच गुन गाथा ।
अंतस भीतरी छत्तीसगढिया के मिनीमाता” ।।




माता जी दक्षिण-पूर्व रेल्वे बोर्ड के सलाहकार सदस्य रहिस, रेल्वे म अब्बड कन काम सवारी (यात्री) मन के सुभित्ता ल देखत केंटिन अउ छोटे रेल टेसन माता जी के सुझौती म बनाये गिस। कोयला लोडिंग बर रेल्वे युनियन बिलासपुर म गठन करके मजदूर मन ले सोसन से बचाय के उदिम करीस ।

गुरुवइन डबरी हंड्ताकांड म बघनीन रुप —

जात-पात, धरम के ईरखा जादा अलहन लाथे, देस, समाज ल बाँट देथे, रीस–राड म मनखे के मगज भस्ट हो जथे, सोचे बिचारे के ताकत हीनहर हो जथे। मनखे रीस म अंधरा बरोबर होथे। गुरूघासी दास बाबा जी रावटी म कहे हे-

‘”‘झगरा के जर नई होय, ओखी ह खोखी होथे”।

सतनामी समाज के मनखे धार्मिक सुभाव के होथें। कोनो जात–धरम के देवधामी ल माने बर कोर कपट नइ करैं; सबो बर मन म सरद्धा गुरु परब तो मनाबे कोनो-कोनो छेत्र म रामायन पाठ त कहूँ रहस (कृष्ण लीला) घलु बिलासपुर जिला मुंगेली, बैगाकापा अउ गुरुवाइन डबरी म राम चरित मानस पाठ के करई ल उच्च जात के मनखे मन नई भाइन; देख के जरजरी समागैं, धरलीन भंइस बैर, तहाँ पांच झिन निरपराध सतनामी ल घर भीतरी के बइरी मन आगी लगा दिन। 19 जनवरी 1968 म जात-पात के ईरखा चलते पाँच सतनामी बेमउत मारे गइन। ए कांड सतनामी समाज ल झकझोर के रख देथे | मामला संसद म उठाइस; ए हंड्ता कांड म एक अकेल्ला मिनीमाता जी संसद भीतर म बघनीन अस गरजत कहिस, मोर लटका मन कोनो गाजर, मुली नोंहे जिंहला मारे, काटे, जाथे। मैं अपन समाज के उपर जुलुम होत नइ देख सकौं; नियायिक जांच होना चाही, आदेस दव, चारों कोती सन्नाटा छागे। भट्टगे! एक नारी के दरद अउ चीत्कार संसद म गूँजत रहै । माता जी अपने दल के कांग्रेस सरकार ल कटघरा म लाके खडा कर दिस। सिरीमती इंदिरा गांधी जी परधानमंत्री रहिन; संसद सभा ले जांच के आदेस देये बर परगे । अंग्रेजी गजट वाले मन माता जी के देये भासन उपर लिखे रहिन–

”स्तब्ध संसद में एक अकेली तीखी आवाज चीख की तरह गूँज रही थी” ।

मुरगे ली म घटना के बिरोध बर आमसभा —

गुरूवइन डबरी हंइता कांड के बिरोध करत मुंगेली म देस भर के सतनामी जुरियइन। जुराव के मंच ले माता जी सरकार ल चेतावत कहिस, (ओ बखत सिरी गोविंदनारायन सिंह मध्यप्रदेश के मुखमंत्री रहिन) ये मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री आँखी म पट्टी बाँध के राजगद्दी म बइठे रहे ले नई बनै ? देख, मोर लडका मन ल दंदोरे, रौदें जात हे, टोरे-फोरे, तरसाये जावत हवै। ए मन कोनो भेड, बकरी नोहें, सब ल सम्मान के संग जीये के हक हे । तैं ईंकर रहच्छा (रक्षा) नइ कर सकच त झिन कर, मैं रइच्छा खुद करिहों। अपन हक, पाये बर हथियार उठाये बर परही तभो हम पाछू नइ घुचन । आगू चलके मोला दोस झिन देबे। आगू का होही ? येला समे बताही, मैं नइ जांच होइस, हंड्तारा मुलजिम मन पकडे गइन, खटका टरिस, समाज म सान्ति आइस | माता जी समाज के लोगन ल सचेत करत कहिस-सतनामी समाज ल अंधियार म रखइया, जात-पात के नांव म आगी बरड्डया मन से सावचेत रहे बर लागही, समे आगे हे आँखी उघारे म बनही, मुँह लुकई म हक, नियांव नई मिलय, जोम्मस म मिलथे। हमला हँसिया टेना नीं ए, धीरज राखे सद्गुरू जी के बताये सतमारग म रेंगना हे, अभी समाज उपर बिपत आये हे, टरही। गुरुमाता के बुझे ले सतनामी समाज जागीस अउ सुमत दीखिस।

घर अंधियार, मंदिर म दीया बारे ले का होही ? अन्जान सक्ति (आदिशक्ति) जब धरती ल सिरजाइस होहय, तब ओकर अंतस म ममता के धारा बोहात रहिस होही। येकर सेती आज तलक हमन धरती ल माता के रूप म पूजथन, मान देथन, नारी रूप म बंदना करथन । नारी महतारी रूप धरके जिनगी नीं देतीस त ये संसार के बिस्तार कहाँ ले होतिस | डॉ. राजेश कुमार उपाध्याय अपन कविता म लिखे हे (सत्यध्वज पत्रिका ले) :-

”नारी उन्नति नारी समता
नारी वैभव जग में उज्ज्वल
पग-पग में सम्मान भाव का
दिव्य ज्ञान बतलाओ जी
सतगुरु के ज्ञान गावो जी”।




नारी हक सिक्छां बर जोर —

माताजी के विचार म जब तक नारी के उन्नति, सम्मान अउ सिक्छां के दुवार नई खुलही तब तक समाज के मरजाद अउ देस के बिकास के बात सोचई सपना बुनई ये। आदमी जात (पुरुष) ये भूला जथे, नारी के कोख म पलके जनम पाये हन; धरती म पांव रख सके हन । नारी, महतारी, सुवारी, (पत्नी) बहिनी, बेटी, अठ देवी रूप म घलु माने जाथे। अपन सुख बर आदमी जात सुवारथी किसम के हो जथे। आदिकाल से नारी जाति के जिनगी ल पराधीन बनाके हक नंगाये गिस । जब-जब दासता जिनगी से मुक्ति बर छटपटाइस तब-तब दबाये के उदीम करे गे हवे। एक कोती नारी ल देबी मानके अउ दूसर कोती भोग के जीनिस (वस्तु) मानें।

नारी, तपसी, तियागी, अउ ममता के बरसइया होथें। छत्तीसगढ म गाँव के तिरिया मन ल माता जी देखिस, अंधविस्वास के सेती नोनी जात ल पढाये, लिखाये बर नइ पढही तहाँ घर के बुता कोन करही ? कतको पढ जाही घर के चूल्हा फूंकही, दाई संग घर–दुवार के बुता सीख जाही तब, ससुरार के बोझा नड् बनही। अट्टसन सोचइया दाई-ददा ल माता जी बुझिस, नोनी मन सिक्का पाही तभे अपन हक ल जानही, समझही, परखही, उच्च सिक्का पा के अपन पांव म खडा होही। दाई-ददा के मरजाद बाढही, समाज देस राज के उन्नति होही।

महतारी लटका के परथंम गुरु माने जाथे; लडका ल सुग्घर सिखौना (संस्कार) तभे मिलही जब महतारी पढे-लिखे रइही। बनिहारिन बना के कब ले रखिहा ?

लोगन मन नारी के सुन्दरता ओकर काया रूप-
रंग म देखथे; जे हर प्रकति के देये आय माता जी के संदेस रहिस–

“नारी के सुन्दरता, सिक्छा, संस्कार, बेवहार ले झलकथे | इही सुन्दर रुप परवार, समाज के मान-गौरव होथे | नारी सुन्दरता तन ले निहीं मन, सादगी से देखे जाथे” ।

माता जी जादा जोर सिक्छा के उपर दिस । आज सबो जात बिरादरी के नोनी मन पढत-लिखत हे; अपन पांव म खडा होय बर धर ले हवैं।

समाज के पय-पाखर चतुवारे के बुता घलु माता जी करीस, बालविवाह, अनमेल विवाह के विरोध करत मानव समाज म जागृति लाये के उदिम म लगे रहिस। नारी उत्थान बर दहेज निवारण अधिनियम 1961, मातृत्व लाभ अधिनियम 1961 समान पारिश्रमिक अधिनियम अउ शारदा एक्ट जइटसन समाजिक सुधार बर कतको उपाय हे।

गुरू घासीदास जंयती अउ गिरौदपुरी मेला ल बढावा —

गुरू घासीदास बाबा जी के जंयती के जन्मदाता सिरी नकुलढीढी जी ग्राम भोरिंग निवासी सन 1938 म गुरू घासीदास बाबा जी के जंयती मनाये खातीर पहली उदीम करीस । तब अंग्रेजी सासन रहिस । ग्राम भोरिंग ले जंयती मनाये के सुरुवात तो होगे; फेर सतनामी समाज म जागरन नीं आये ले 20–30 साल ले परचार-परसार म कमी देखे बर मिलिस ।

आजादी के बाद सतनामी समाज सिक्छा–दीक्छा बर चेत करीन मिनीमाता जी संसद सदस्य होगे रहिस । बाबा जी के जंयती मनाये बर जोर-सोर से माताजी परचार म भिड्के धार्मिक अउ सांस्कृतिक गियान बगराइस ।

गुरुघासीदास जयंती परब 18 दिसंबर के दिन सरकारी छुट्टी रखे बर मध्यप्रदेश के राज्यपाल सिरी के.सी. रेड्डी जी से मिनीमाता जी मांग रखिन । जेकर से बाबा जी के अनुयायी मन गुरु जयंती सबो परवार-समाज मिलके मना सकै अउ बाबा जी के सतनाम संदेस जन-जन तक पहुँचे। मुख्यमंत्री पंडित श्यामाचरण शुक्ल जी सन 1970 म गुरुघासीदास जयंती 18 दिसंबर के दिन रायपुर अउ बिलासपुर संभाग म छुट्टी घोषित करीस। आगू चलके मुख्यमंत्री सिंह जी हर सन 1972 म पूरा मध्यप्रदेश म 18 दिसंबर के छुट्टी घोषित करके गुरु बाबा घासीदास के उपर अपन सरद्धा भाव परगट करीन।




गिरौदपुरी मेला लगे के सुरुवात सन 1935 ले होय रहिस, मांधी पुन्नी के दिन मेला होवय। एकर पहली गुरू दरसन बर कमती मनखे जावय । मेला के विस्तार बर मिनी माता जी, सिरी नकुलढीढी जी, गुरू आसकरनदास, राजमंहत दीवानचन्द जी सोनवानी, सखाराम बघेल, मंहत जगतु सोनवानी, संत, मंहत, भंडारी जइसे सुजानिक मन विचार करत मेला तिथि ल बदलके सन 1961 से फागुन महीना अंजोरी पाख के पंचमी, छठ साते म तीन दिन के मेला तिथि के ऐलान करीन तब ले आज तलक हर बछर इही समे म मेला लगथे । संगे–संग बाबा जी के नांगर जोते खेत सफूरा मठ, बछरु जीवन दान, पथरा उपर बाबा के चरन चिन्ह, छाता पहाड, अमरित कुंड, चरनकुंड, पंचकुंडी जइसन पबरीत अउ चमत्कारी जगा मन के चिन्हारी करीन । गिरौदपुरी म गुरू अगमदास के बनाये मंदिर ल परमुख मान के गुरूगद्दी पूजा सुरु करे गिस । माताजी संत, मंहत के संग गिरौदपुरी मेला के विस्तार बर गाँव-गाँव म फागुन महीना के पंचमी, छठ अउ साते म मेला होय के आरो देवत दरसन बर नेवता देवय। परचार होत गिस; गिरौदपुरी म अब संसार के सबले बडे सतनाम मेला लगथे । 77 मीटर ऊंचा जैतखाम सत के संदेस बगरात हवै।

‘कहि देबे संदेस’ सनिमा मंजूरी बर माता के भूमिका —

सन 1965 मनुनायक के बनाये छत्तीसगढी सनिमा ‘कहि देबे संदेस’ सामाजिक कुरीति के उपर बने हवे। ये सनिमा म बाम्हन जात के मुटियारी अउ सतनामी चेलिक के परेम अउ बिहाव रचाके सामाजिक बराबरी (समानता) के संदेस देवत कहिनी गढे गे हे। ते पाय के बाम्हन समाज के मन रोसियाये बिरोध करीन। रिलिज होने नई देत रहिन; बिरोध ल देख के सूचना प्रसारन मंत्रालय के सदस्य मन छत्तीसगढ के संसद सदस्य अउ गुनी जन ल देखाये बर सुझाव दिन। ओ समे मिनीमाता जी, डॉ. खूबचन्द बघेल के संग सिरी बाबू जगजीवन राम अउ सिरीमती इंदिरा गांधी जी तक ‘कहि देबे संदेस’ सनिमा देखीन। मिनीमाता जी आगू आइस, सनिमा बनइया मनुनायक जी ल इंदिरा गांधी जी से मिलवाइस अउ कहिस, फिलिम सामाजिक बुराई उपर बने हवै। येकर उपर रोक लगवाना न्यायसंगत नोहे। सूचना प्रसारन मंत्री इंदिरा गांधी जी रहिस। देखाये बर मंजूरी मिलगे । तहाँ सनिमा ल चलाये गिस। माता जी रोक लगन नई दीस |

गुरु घासीदास जयंती 18 दिसंबर 1968 के कार्यक्रम म छत्तीसगढ सनिमा कहि देबे संदेश बनइया सिरी मनुनायक, संगीत, निर्देशक सिरी मलय चक्रवर्ती अउ संगी कलाकार मन ल सतनामी समाज कोती ले सनमान करत माता जी सबो झिन कलाकार ल असीस देवत फिलिम के सफलता बर बधाई दिस।

माताजी के गुनान —

घाट अलग-अलग बनगे, धारा तो एक हे, ओकर काम एक हे, प्यासा के पियास बुझाना । घाट के अलग होय ले तरिया, नदिया, नरवा नई बदल जाय। आने–आने धरम, जात-बिरादरी हे, सतपुरष तो एक हे, देवधामी के नाव कतको हो सकत हे, फेर सत के सरूप नीं बलदै। घाट के भेदभाव म अपन मनखे पन ल गंवा डरथन | देखमरी, खो, ईरखा (मतभेद) भूला के निरमल धारा पाय बर मन एक करे बर परही | अंतस म मनखे पन आये ले सुख के लेवना पाये जा सकथे। फूल रंगबिरंग के होथे, एक सुत म पिरोये ले सुन्दर माला (हार) के रूप ले लेथे। अट्टसने मनखे घलु ल अपन अंतस म भाव गढे बर परही, जात, धरम के ईरखा भूलाये बर परही तभे मानुस जनम के कलियान होही।

माता जी के विचार म नता-गोता के डोर बढ नाजुक होथे, सम्हार के रखे बर परथे। अगास म उड्त पतंग ल जादा ढिल्ला छोडे म उडे के जगा भूईंया म गिरे लगथे; अपन कोती जादा ताने म पंतग के डोर टूट जथे। जबरदस्ती म नता के मया डोर टूटे के डर रिथि। बचाये रखे बर खुद के गलती सुधारे ले अउ दूसर के गलती संवासे म बनथे। गलती होय से छिमा मांग लेये म कोनो छोटे या नीचा नई हो जाय; येकर से मन के मइल धोवा जथे।

आज नता-कुनेता ल म तउले जात हे; परवार म मया-पिरीत खरा माते अस दिखथे। वीरान अठ अनचिन्हार असन लागथे। आगू चलके नवा पीढी ल का इही सिखौना सीखा के छोडबो ? मया के मंदरस म महुरा घोरे ले नइ बनय; कोकडा खिंधोहिल म सुमत नई माडै। अवइया बखत समाज, परवार के कउन दसा होही ? समझे बर परही । ‘घर अंधियार हे, तब मंदिर म दीया बारे ले का होही”?

गुरू बाबा के सतनाम! मंतर ल अंतस म बसाये बर परही। बाबा जी के बताये गियान धरे म बनही । तभे परवार अउ समाज म सुन्ता बंधाही।




सतनामी समाज के संस्कार ल लेके माताजी के विचार रहिस; हमर समाज म नारी ल बराबर माने-गउने जाथे। सनमान अउ बराबरी के दरजा मिलथे। समाज म आदमी जात के जतेक असथान हे ओतके नारी मन के हवे | नर-नारी दुनों मेहनती होथे, गरीबी विपदा ले जूझे बर जानथे। अपन हाथ सबो कारज कर लेथे; परभरोसिया नीं होय। ईरखा, देखमरी म घाट, पारा के बंटइया मन हमर समाज ल लेके तरह-तरह के पुरान दबाये रखे बर उदीम हमन देखत हन जतेक समाज सुधार होवत आवत हे ओहर अपन ल उच्च जात, बुधमान बतइया समाज म होत हे। सतीप्रथा, दाईज डोर, नारी ल भोग के जीनिस बताना, पराधीन बनाके के रखना, बालविवाह, रूढिवाद, पाखंड, जडसन बेमारी हमर समाज म नीयें।

“हमन ल सतनामी कहाये म गरब होथे | गुरू घासीदास बाबा जी! जइसे गियानी, मुक्तिदाता अवतार लेके आइस अद बुद्भ! असन तप–तपस्या म आत्मगियान पा के मानव जाति म सामाजिक क्रांति लाइस; जीवन म सतकर्म के बोध कराइस; अटके–भटके डरे, थके ल पार नकाइस । म छबडाये मनखे ल रद्दा बताइस: आसा-बिंसवास जगाइस, मनखे के करु कस्सा मिटाके नवा नता–गोता, संगी-साथी, हितवा-मितवा जोरीस । मनखे–मनखे एक बताके सतनाम! संदेस बगराइस ।”

माताजी कहै समाज म असिक्छा, बाल विवाह, नसाखोरी, घेखराहीपन, जइसन अवगुन हवे जेकर से जुझत हन । बिचारौ कब ले जुझबो ? चलनी म दुध दूह के, भाग ल दोस, अट्डसन म नइ बनै, करम सुधार के चले म बनही, अपन भाग खुद ल गढे बर लागही। काकरो आँच-पाँच ले दुरिहा रहिके डट के कमावा, डट के खावा, अउ छाती तान के रेंगव, चोरी करे म डर, मिहनत म का के डर ? जुआ-चित्ती, मंद-मउंहा, बीडी, गाजा, ये सब अरकट्हा रद्दा रेंगाथे; दुरिहा रहे बर परही, तभे हमन सच्चा सतनामी बनके रही सकत हन । पढे-लिखे म आगू आये ले सबो समस्या के निपटारा होही। बडहर मनखे के घलु अप्पढ रहे म कोनो दरजा नई राहै। हक अउ सनमान पाये बर सिक्छा सब ले बडे हथियार होथे, अग्यानता के अंधियारी मिटाये बर गियान जोत जलाये म बनही। समाज संसार म फबते, अलग चिन्हारी, मान सनमान पाथे।

माता मिनी के संदेस —

माता जी सिक्छा, संगठन, खान-पान, बोली-भाखा, आचरन अउ समाज के विकास बर जादा जोर देवत संदेस देये हवै…

1. सामाजिक निंयाव वेबस्था म चेत करिहा। निंयाव दीया बरोबर होथे; कहूँ निंयाव के दीया बुझा जथे, ओ समाज अंधियार म बुड जथे।

2. मिहनत से जी न चुराना चाही।

3. बेटी-बेटा ल जतेक जादा हो सकै पढोवा-लिखावा कोर-कपट झिन करिहौ।

4. गुरु घासीदास बाबा जी के बताये सतमारग म चलना हे।

5. अपन ल हीनहर नड समझना ये।

6. रहन-बसन साफ सुथरा अउ बानी के मिठास ले बइरी घलु जुरथे।

7. दूसर ल सनमान देये म सनमान मिलथे। फेर ओतके देना चाही जतका जरुरत हे।

8. आज जमाना संगठन के आय, जुग झुकाने वाला के ये; समाज म एक फेंट होके रहे म बनही ।

9. सोसित बनके नई रहना ये, सोसन के बिरोध म जुझे बर परही, तभे हक पाये जा सकथे।

10. सादा खान-पान, उज्जर चरित्र, मन, वचन, आचरन के पबरित रहे ले मनखे पन झलकथे।

11. अंतस म आत्मविश्वास के जागे ले, आत्मबल मिलथे, अंधियारी म उजियारा लाथे, बिसवास के दीया जलाके रखव, जिनगी सँवर जाही।




माता जी के सतलोकी होना —
माताजी भंडारपुरी ले रयपुर होवत दिल्ली जाय बर निकलगे। दिल्ली जाय के पहली भोपाल म पुत्र विजयकुमार से मिलके पढई-लिखई के आरो लेवत हवाई जिहाद म बइठगे | जिहाद म माता जी सहित 14 झिन मनखे सवार रहिन । दिल्ली पहुँचते-पहुँचते पालम हवाई अड्डा नजीक तूफान म जिहाद पहाडी म ठोकर खाके गिरगे। 11 अगस्त 1972 के अधराति मिनीमाता जी बिसाल समाज ल आँसू म बुडोके रोवत, कंदरत छोडके सतलोकी होगे । सतनामी समाज अपन महतारी ल गंवा डारिस।

ग्राम चटुवापुरी धाम (सिमगा) म गुरू अगमदास अउ माता जी के समाधी हवै जिंहा हर बछर पूस पुन्नी म गुरू दरसन मेला लगथे जिहां गुरूजी अउ गुरूमाता ल माथ नवाके सर्वा अरपित करथें।

छत्तीसगढ राज बनगे, माता जी के सपना पूरा करे के भार हम जम्मो छत्तीसगढिया मन उपर हे; तभे हम अपन हक, सनमान पा सकत हन । निंही त परभरोसिया रहि जाबो।

माता मिनी जी हमर बीच नइये, ओकर बताये संदेस हवे, जेकर ले बल मिलथे। हम सब ल नवा रद्दा देखाइस; उही रद्दा म आगू बढना हे। नांव अम्मर हे, आज लाखों लोगन के अंतस म माताजी बसे हव्य |

“संग छूटगै, मिटगे काया, रहिगे माता सतकरम्।
जुग-जुग रहही नाव अम्मर, जनाये मनखे धरम” ।।
जय सतनाम




गुरू माता मिनी
दुबर-हीनहर के देख आँसू जावै करेजा फाट
दुलरैया-बरसैया मया, माता मिनी के हिरदे विराट
अम्मल म देवमती, पबरीत अन्तस भाव-भक्ति
उन्नीस सौ पन्द्रह फागून महीना, अवतरे मगन सबीना
अँगना गूंजे सोहर गीत, तक धिन्ना मांदर खटका बीत
सहरावैं भाग किलकारी सुन, उछाहित परवार बिधुन
मुच-मुच हास, हरसवि मन, असम म धरि जनम
नाव देवी मीनाक्षी धरावे, चन्दा बरन रूप पाये
छत्तीसगढ के धन भाग, बिहाव रचाये गुरू अगमदास
गुरू माता के दरजा पाइस, मीनाक्षी मिनीमाता कहाइस
चिन्हारी कहाँ जात-पात ? दुलारिस सबन ल महतारी
जुलमी देखाये आँखी जब-जब, रूप बघनीन के तब-तब
कवच दलित-सोसित के, पहिचान सतनामी रीत के
सतनाम! के सोर बगराइस, अँचरा भटके पाइस
सेत बसन माथ म चन्दन, भागमानी जन पावै दरसन
थर्राजय संसद जब गरजै, देस भर तहाँ चिहूर परजै
भेदभाव चतुवान कान्हून लाइस, दलित मान हक देवाइस
बियाकूल देख नारी दसा, बुझाइस बेटी पावै सिक्छा
गुन माता के कतेक छोडव कङन-कउन सुनावं
भाईचारा परमारथ खातीर, होइस माता कुर्बान आखिर
उन्नीस सौ बहत्तर गियारा अगस्त, परगे जउंहर बिपत
सतलोकी दुलार पुरवइया, मिलगे माटी म कंचन काया
खायेन किरिया हम संतान, अबिरथा नीं जावै बलिदान
रहिगे सुरता के चंदन, असीस दे माता हवै बन्दन ||




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