अंधरी के बेटा – विट्ठलराम साहू ‘निश्छल’

एक झन राजा रिहिस। ओ हा अपन राज म बजार लगवाय। ओखर फरमान रिहिस कि जऊन जिनिस हा सांझ के होवत ले नई बेचाही तौन जिनिस ला राजा के खजाना ले पइसा दे राख लेय जाय। एक झन मूरति बनईया करा राक्छसिन के मूरति बांचगे ओला कोन्हों नई लीन। जान-बूझ के माछी कौन खाय? पइसा दे के राक्छसिन ला कोन ले ही? सांझ किन ओ मूरति ल राजा ल लेय बर परगे। राक्छसिन तो राक्छसिन ये। राक्छसिन हा राजा ला कहिथे, ‘मोला पइसा डार के लेय हस, बने बात ए। फेर मैं जौंन कहूं तौन ला तोला माने बर परही।’
राजा किहिस, ‘मानहूं, का बात ये बता।’ त राक्छसिन कहिथे, ‘तोर तीनों रानी के आंखी ल निकार के ओमन ला जंगल डाहार खेदार दे।’ राजा बपुरा का करय? अपन तीनों रानी के आंखी ला निकाल के खेद देथे। छोटे रानी हा पेट में रहिथे। बिचारी ह कटाकट जंगल मां एक ठन पीपर रूख के तरि मां बइठे पीपर के फर मन ला बीन-बीन के खावय अऊ डबरा-खोंचका के पानी ल पिए। एक दिन ओखर एक ठन बेटा होईस। ओखर नाव राखिस बिजयपाल। ओखर बेटा हा दिन के दिन बाढ़हत गिस। एक दिन एक झन राजा हा उही सोज ले जावत राहाय। ओखर मेर ले तीर-कमान मांग लिस। अब ओ हा सिकार करे लगिस। सिकार मा जौंन मिलय तेन ला अपन दाई मन ला अऊ अपनो खावय। एक दिन ओ हा अपन दाई मन के अंधरी होय के किस्सा ला सुनिस। सुन के ओ राक्छसिन मेंर गिस। उहां जाके कहिथे, ‘अब मैं हा इंहे रहूं।’ राक्छसिन डर्रागे।
ओ किहिस, ‘पहिली तैं मोर दाई मेर जा के ओखर सोर ले के आ तब राखहूं। राक्छसिन हा चाल चले रिहिस, ये टूरा हा ऊंहा जाही त मोर दाई उहां जाही त मोर दाई हा येला बचावय नहीं, खा डारही।’ राक्छसिन के दाई के पता-ठिकाना ला पूछके बिजयपाल हा ऊहां पहुंचगे। ऊहां जा के ओ राक्छसिन ला ममादाई केहे लगिस अऊ ऊंहे रेहे लगिस। कुछ दिन बिते ले बिजयपाल हा पूछथे, ‘कस ममादाई ये छै ठन आंखी हा टंगाय हे, तेन हा काखर ये?’ राक्छसिन हा कहिथे, ‘ये हा एक झन राजा के तीन झन रानी मन के आय बेटा। तोर दाई हा ये आंखी ला निकलवा के इंहे भेजे हावय।’ ओखर ले फेर पूछिस, ‘ये आंखी हा फेर कइसे लग जही ममादाई?’ राक्छसिन किहिस, ‘एक जघा मा रोज नांवा-नांवा धान के खेत हावय ऊंहा रोज धान बोथें अऊ रोज धान लुथें। ओ धान के चाउर के पसिया मा ये आंखी ला चटका देय ले आंखी ले दिख जथे।’
अब का पूछबे- बिजयपाल हा ओ आंखी मन ला धर के ले लानिस अऊ धान के खेत मां पहुंच गे। खेत के पांच बाली ला टोर के धर लीस अऊ घर आगे। चार बाली ला कूट के भात रांधिस। ओखर पसिया मां अपन तीनों झन महतारी मन के आंखी ला चटका दिस। एक ठन बाली ला बो दिस। जब धान हा पाक के तियार हो गिस त लू के कूट-छर के रोज भात रांध-रांध के ओ मन ला खवाए लगिस।
उंखर आंखी म दिखे लगिस। धीरे-धीरे ओखर खेती किसानी बाढ़ गे। नौकर-चाकर होगे। बड़े जनी घर घलो बना डारिस। एक दिन फेर अपन राक्छसिन ममादाई घर पहुंचिस। ओ हा राक्छसिन ममादाई घर एक ठन डंडा देखिस। डंडा के बारे मं पूछिस, त ममादाई बतईस, ‘ये हा अइसन डंडा आय बेटा, जेखर हांत मां ये डंडा रही तौन हा कतको ढोर-ढांगर, अदमी ला अपन बस म कर सकत हे।’
बिजयपाल हा मऊका देख के ओ डंडा ला ले लानिस। घर आ के डंडा ला धर के बरदी के बरदी गाय, भईंस, बईला मन ला अपन घर ले लानिस। खेती-बारी, मजदूरी करईया अउ ढोर चरईया कतको आदमी मन ला डंडा के बल म ले लानिस। अब ओखर कारोबार जोरदार चले लगिस।
एक दिन एक झन राजा अईस। ओ हा अपन लड़की के बिहाव बिजयपाल से कर दिस। अपन राजपाठ तक ला दे दिस। बिजयपाल अब राजा बनगे। फेर सोचिस कि कहूं ओ राक्छसिन ला जनबा हो जही त मोला छोंड़य नहीं। तेखर ले उहू ल ठिकाना लगा देना चाही। ओ हा फेर राक्छसिन ममादाई करा पहुंचिस। दु ठन सेंदूर भरे के डबिया ला देख के पूछिस, ‘कस ममादाई ये हा का के डबिया आय?’
राक्छसिन बतईस, ‘बेटा एला झन छूबे। ये डबिया मां तोर दाई अऊ मोर जीव हे। डबिया ल खोलते साठ हम दूनों झन महतारी-बेटी मर जबो बेटा।’ एक दिन बिजयपाल हा कलेचुप ओ डबिया मन ला धर के ले लानिस। जइसे ओला खोलिस ओ राक्छसिन महतारी-बेटी मन मर गें। अब बिजयपाल अपन बाप मेर पहुंचिस। अपन परचय दिस। बाप-बेटा एक-दूसर ला पोटार के मिलीन। बाप के राजपाठ ह घलो बिजयपाल ला मिलगे। अब का पूछबे? ओखर दिन सोन के अउ रात चांदी के होगे।
कहिनी उरकगे, मने-मन येखर अरथ समझव। अंधरी के बेटा सहिक तुंहरो भाग जागे।

-विट्ठलराम साहू ‘निश्छल’
मौंवहारी भाठा
महासमुंद (छ.ग.)

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