अनुवाद : उत्तर कांड के एक अंश





अब तो करम के रहिस एक दिन बाकी।
कब देखन पाबो रामलला के झांकी॥
है भाल पाँच में परिन सवेचन नारी।
देहे दुबराइस राम बिरह मां भारी॥
सगुन होय सुन्दर सकल सबके मन आनंद।
पुर सोथा जइसे कहे, आवत रघुकुल चन्द्र॥
महतारी मन ला लगे अब पूरिस मन काम।
कोनो अब कहतेच हवय आवत बन ले राम॥
जेवनी आँखी अऊ भुजा, फरकय बारम्बार।
भरत सगुन ला जान के, मन मां करय विचार॥
अब तो करार के रहिस एक दिन बाकी।
दुख भइस सोंच हिरदे मंचलराम टाँकी॥
कइसे का कारन भइस, राम नइ आइन।
का जान पाखंडी मोला राम बिसराइन॥
धन-धन तैं लछमिन तैं हर हस बडभागी।
श्री रामचंद्र के चरन कमल अनुरागी॥
चीन्हिन अड़बड़ कपटी पाखण्डी चोला।
ते कारन अपन संग नई लेईन मोला॥

-पद्मश्री डॉ॰ मुकुटधर पाण्डेय



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