अम्मा, हम बोल रहा हूँ आपका बबुआ

बड़े साहब के रुतबा के का कहना। मंत्री, अधिकारी सब वोकर आगू मुड़ी नवा के, हाथ जोड़ के़ खड़े रहिथें। वोकरे चलाय तो सरकार चलथे। वोकर भाखा, ब्रह्मा के लिखा। इंहां काकर हिम्मत हे कि वोकर विरोध कर सके। मुंह उलइया मन के का गति होथे सब जानथें। देख सुन के कोन बघवा के मुंह म मुड़ी खुसेरही?
बिहने-बिहने के बात आय। साहब अपन आदत मुताबिक बगीचा म टहलत रहय। वोकर पहला सिध्दांत आय – सुबो साम के हवा, लाख रूपिया के दवा। डेरी हाथ के हथेली म मुठा भर नस ल धर के, जेवनी हाथ के डुड़ी अंगठी म घिसिर-घिसिर घीसत, जगा जगा पिच पिच थूकत, ये गली ले वो गली धूमत रहय। दस एकड़ के प्लाट म बीचों बीच हे आलीसान बंगला अउ वोकर चारों मुड़ा हे बाग-बगीचा। बाग म नाना प्रकार के, फूल वाला, फल वाला, सोभादार, छायादार पेड़ पौधा लगे हें। साग-भाजी के डोहरी घला बने हें। पानी पलोय बर जगा-जगा फव्वारा लगे हे, जउन ह बाग के सुंदरता ल अउ बढ़ा दे हे।
जम्मो नौकर चाकर मन अपन अपन काम म मरो-जियो भिड़े रहंय। निंदइया मन नींदत रहंय। पानी पलइया मन पानी के पाइप ल एती ले ओती घुमावत रहंय। पेड़ पौधा मन के काट छांट करइया मन घला अपन काम म मस्त रहंय। कांदी लुवइया मन बोझा बोझा कांदी गउसाला डहर डोहारत रहंय जिहां गाय-भंइसी मन बंधाय रहंय। दुहइया मन दुहे म मगन रहंय।
बड़े साहब ह एक एक ठन पेंड़ अउ एक एक झन कमइया मन के जांच परख करत अउ नस के पीक ल थूंकत रामअधीर डहर मुड़क गे। बड़े साहब ल अपन कोती आवत देख के रामअधीर ह सावचेत हो गे। पचास-पचपन के उमर म घला पचीस-तीस के जवान मन ल चुटकी बजात उड़ा देही, अइसन रामअधीर के सरीर रहय। बाग बगीचा के पुरखउती काम करत अउ ताजा फल फूल के सेवन करत वोकर जिंदगी बीतत हे। पेड़ पौधा के एक ठन पाना ल देख के वोकर तासीर समझइया रामअधीर ह मनखे के घला चाल ढ़ाल देख के वोकर मन के बात ल भांप जाथे। बड़े साहब ल अपन कोती आवत देख के वो जान गे कि साहब के मन आज तनिक खिन्न हे। बड़े साहब के बरन ल देख के कोनो लोकल आदमी होतिस ते कांप जातिस। फेर रामअधीर तो साहब के मुंहलगा देसी आदमी रहय। साहब ह खुदे वोला ये बाग के देख रेख करे बर बिसेस रूप से देस ले लाय हे, वो काबर कांपे? दुरिहच ले दुनों हांथ जोर के साहब के पैलगी करिस – ‘‘पालागंव मालिक।’’
बड़े साहब आसीस दिस – ‘‘खुस रहा।’’ तनिक ठहर के फेर कहिथे – ‘‘का रे रामअधीरवा, एही खातिर हम तुंहला इहां लाय हन? हम तुंहला पहिलिच चेताय रेहेन कि ये साला लोकल जिनिसवा अउ लोकल आदमी से हमला बहुतेच नफरत होत है। भूल गवा का? ये देखव, ये…ये….ये साला लोकल पेड़ पौधा कहां से उगत है? इन्हें काहे उगन देत हौ ? बुड़बक कहीं के। उखाड़ फेंका इन सबको ससुरा। इन्हें उखाड़ नहीं फेंकोगे तो अपन देसी पेढ़ पौधा कहां रोपोगे? काहे इतनी सी बात तुंहर खोपड़ी म नाहीं घंुसत है ? हम कहे देता हूं , इस बगीचवा म एक ठो पाना भी साला लोकलवा नहीं होने का।’’
अब तो रामअधीर घला कांप गे। कहिथे – ‘‘आइन्दा अइसन गलती अउर न होइ हुजूर, माफी देवा।’’
बड़े साहब – ‘‘लगता है निराई-गुड़ाई खातिर आदमी कम पड़त हैं। कल ही देस से अम्मा का फोनवा आया था कि उंहां साला दो चार छोकरवा हैं। बड़ काम के हैं। कोनों ने एक दू मरडरवा किया है, कोनों ने छोटी मोटी डकैती किया है तो कोनों ने साला दू चार रैप वैप किया है। पोलीटिकल परेसर पड़ी होगी। पोलिस सता रही है। हमने भी अम्मा से कह दिया हूं कि बेचारे कहां चंबल वंबल की खाक छानते फिरते रहेंगे। उन सब को इंहां भेज दो। इहां बहुत बड़ा बगीचा है। समझो चारागाह है। निराई-गुड़ाई के बहाने कोनों कोन्टा म लुकाय रहेंगे। इंहा साला ककरो हिम्मत जउन उन्हें पहिचान सके। फेर रामअधीरवा के रहते का चिंता ?’’
साहब के देस प्रेम अउ अपन बड़ाई सुन के रामअधीर गदगद हो गे।
विही जगा मंगलू राम ह निंदत रहय। बड़े साहब के बात सुन के वोकर तन बदन म आगी लग गे। मने मन कहिथे – ‘‘साले हरामी के पिला हमर राज म आ के हमरे ऊपर राज करत हस अउ हमी मन ल लोकल कहि के दुत्कारत हस। ‘‘ वोला बीर नारायन सिंह के सुरता आ गे, जउन ह अंगरेज मन संग लड़त लड़त अपन परान निछावर कर देय रिहिस हे। लहू पिये म ये मन अंगरेज मन ले कम हे क? वो ह मने मन बुढ़ा देव ल सुमरिस। सहीद बीर नारायन सिंह ल सुमरिस। वोकर तन बदन म आगी लगे रहय। गुस्सा के मारे एक ठो पेड़ ल, जउन ल बड़े साहब ह गजब प्रेम करय अउ जउन ल बिसेस रूप ले देस ले मंगा के लगाय रहय, उखाने लगिस। जोर लगा के ताकत लगाइस फेर वोकर उद नइ जलिस। हालिस तको नहीं। उल्टा एक ठो बड़े जबर कांटा वोकर हथेली म गोभा गे। दरद के मारे मंगलू राम के परान निकल गे। वोला समझ आ गे कि इंखर जड़ इंहां कतका गहिरी तक रोपाय हे। वोकर मुंह करुवा गे। मन के घिन ह थूक बन के वोकर मुंह म सकला गे। सब ल वो ह विही पेड़ के ऊपर पचाक ले थूंक दिस अउ अपन काम म लग गे।
मंगलू राम ह बड़े साहब संग गोठियाय म भुलाय रहय तभो ले वोला जना गे कि मंगलू राम ह कुछू न कुछू गड़बड़ी जरूर करत हे। वो ह मंगलू ल धमकाथे – ‘‘का बे मंगलू , तुंहार चरबी जादा हो गइल का? फेर बड़े साहब कोती ध्यान लगा के कहिथे – ‘‘हम सब समझ गया हूं मालिक। कोनों फिकर की बात नाही। हमार देस के बिचारा बिटवा मन के दुख हमार से सुने नाही जावत। वो मन ल तुरते बुलवा लेवा हजूर।’’
वोतकी बेर लहकत लहकत दुनों हाथ म मोबाइल धरे सिंग साहब आ गे। ये ह बडे साहब के बड़े पी. ए. आय। बड़े साहब ह कहिथे – ‘‘का हो सिंग साहब, किस बात की उतावली हो रही है?’’
सिंग साहब – ‘‘मंत्री जी का फोन है सर।’’
बड़े साहब – ‘‘मंत्री हैं तो का हगने मुतने भी नहीं देंगे। कह दो, साहब टायलट में हैं। और हां, पुलिस वाले बड़े साहब से जरा बात तो कराओ।’’
पुलिस वाले बड़े साहब के फोन लगते सात सिंग साहब ह फोन ल बड़े साहब ल दे दिस।
वोती ले अवाज आइस -’’गुड मसरनिंग सर।’’
– ‘‘गुड मारनिंग। बड़े बुजुर्ग कहते हैं कि सुबह मां बाप के दरसन करे से दिन अच्छा बीतता है। अब इहां हमार माई बाप तो आप ही हैं।’’
– ‘‘अच्छा मजाक कर लेते हैं।’’
– ‘‘मजाक नहीं, धरम की बात कह रहे हैं। हमार खातिर भी तो समय निकाल लिया करो।’’
– ‘‘क्या आदेष है बोलिये न?’’
– ‘‘आदेस देने की हमर औकात है का ? भइ छोटा सा रिक्वेस्ट जरूर है। फुरसत हो तो आज डिनर हमारे साथ ही कर लीजियेगा। ……हां हां….. अरे जादा लोगों का मजमा थोरे न लगाएंगे। रेल साहब होंगे अउ कारखाना साहब होंगे बस।….अरे नहीं नही। लोकल लोगों को बुलाकर रंग में भंग थोरे न डालेंगे। और सुनो, इंहां बंगले में जितने लोकल रंगरूट तैनात करवाए हो न, उन सब सालों को हटवाकर अपन देसी रंगरूट तैनात करवा देना। लोकल लोगों से हमें बेहद घिन आती है। और फिर दीवारों के भी तो कान होते हैं न? दावत बहुत खास है। रिस्क बिलकुल भी नहीं लेने का। समझ गए?’’
रात के दस बज गे रहय। बंगला के चारों खूंट बड़े-बड़े टावर मन म बड़े-बड़े लाइट लगे रहंय जेकर अंजोर म बंगला उबुक-चुबुक होवत रहय। बंगला के चारों मुंड़ा अउ छत म चार चार कदम म मषीनगन धारी कमांडो पहरा देत रहंय। एक झन कमांडो ह अपन नजदीक वाले दूसर कमांडो ल कहिथे – ‘‘यादो जी, निकालव हो तनिक खैनी। बड़ी तलब लगी है।’’
यादव जी – ‘‘सरमा जी ठीके कहत हव। खैनी को चेतन्न चूर्न ऐसेइ नही न कहत हैं। ओंठ म दबातेइ दिमाग की बत्ती जल जात है।’’
ओंठ अउ दांत के बीच म खैनी ल दबा के सरमा जी ह यादव जी ल कहिथे -’’देखत हौ यादो जी बड़े साहब के रुतबा। अइसन रुतबा तो हमर देस म हमार मुख्य मंत्री के भी नहीं होगी।’’
यादव जी – ‘‘भइया, अपन काम म लगे रहो। उन्हीं की कृपा से तो हम तुम इहां मौज करत हैं।’’ खैनी ल चगला के अउ पीक मार के यादव जी ह फेर कहिथे -’’कोई खास मीटिंग लग रहा है। परताप साहब, बहादुर साहब अउर पहलवान साहब की गाड़ी अब तक बाहर नहीं आई।’’
सरमा जी – ‘‘अब चुपौ भइया दीवारों के भी कान होत है।’’
फेर बंगला के चारों मुड़ा सन्नाटा पसर गे।
गजब रात ले दावत चलिस। दावत म का खिचड़ी पकिस होही , भला कोन जाने? सरकार ल हवा नइ लगिस, मंगलू राम के का गिनती।
मंगलू राम अप्पड़, बनिहार आदमी तो आय, न बोले बर आय न बतियाय बर। अपन रद्दा ले रद्दा। रात दिन बइला-भंइसा मन सरीख कमाय के सिवा वोला अउ का आथे? फेर वोला अपन आप के अउ अपन दू करोड़ भाई मन के अपमान सहन नइ होय। बड़े साहब ह जब इनला लोकल आदमी कहि के मजाक उड़ाथे, हिनमान करथे, तब वोकर तन मन म आगी बर जाथे। एड़ी के रिस ह तरुवा म चढ़ जाथे। हमरे कंवरा ल नंगा-नंगा के खाथें हरामी मन अउ हमरे हिनमान करथंे। थू…..। पाप के घड़ा एक दिन जरूर भरही, बूढ़ा देव सहाइ हे।
दू चार दिन बीते पाछू गजट म एक ठन खबर छपिस। जगा जगा वोकरे गोठ होवत रहय। मंगलू राम घला सुनिस।
‘‘पुलिस में भरती होने आए बाहरी लोगों को सर्किट हाउस में ठहराया गया।’’ लोग बाग यहू गोठियावत रहंय कि, ‘‘पुलिस भरती म लोकल उम्मीदवार मन के कोई माई बाप नइ हे।’’
दू चार दिन पीछू गजट म भरती होवइया मन के नाम घला छप गे। पढ़इया मन एकेच गोठ करत रहंय – ‘‘सर्किट हाउस वालों का ही बोल बाला है भइया, लोकल लोगों को कौन पूछेगा।’’
मंगलू राम ल किसन, जगत, लखन अउ फकीर के सुरता आ गे। सब वोकरे गांव के टुरा आवंय। कोनों मेटरिक पढे हे, त कोनो कालेज पढ़ के सरकारी नउकारी के आस लगाय बइठे हे। किसन ल तो पांच साल हो गे हे। तियारी म भिड़े हे। रोज पहाती दौड़ लगाथे, दंड बैठक करथे। ऊंच पूर हट्टा कट्टा जवान हे। हर साल अर्जी लगाथे। आज ले हवा नइ लगिस। कतको संगवारी मन के तो आज ले निवास प्रमाण पत्र तक नइ बन पाय हे। दफतर के चक्कर कांट-कांट के हदास हो गे हें। देसी मन के ह रातों रात बन जाथे। कइसे होत होही?
एक दिन किसन ह मंगलू तीर आय रिहिस। केहे रिहिस – ‘‘कका ! तंय तो बड़े साहब के बंगला म काम करथस ग। सिफारिस कर देतेस ते मोर जिन्दगी बन जातिस। पइसा वइसा के बेवस्था कर डारे हंव। मरत ले तोर नांव लेतेंव।’’
मंगलू राम ह केहे रिहिस हे – ‘‘किसन, तंय अपन आप ऊपर बिसवास रख बेटा। तोर म का कमी हे? हमर पढ़े-लिखे अउ जवान मन म का कमी हे? मोला बूढ़ा देव ऊपर बिसवास हे बेटा, ये बखत तोर नउकरी लग के रहही। अउ एकरे सेती तो हमर अलग राज बने हे। हमर राज म हमरे सुनइ नइ होही त हम अउ कहां जाबो जी? करम नइ फूट जाही?’’
किसन केहे रिहिस – ‘‘तंय नइ जानस कका। आज बूढ़ा देव के जगा ल घला इही बड़े साहब मन पोगरा डरे हें। इंखर कृपा बिना कुछ नइ हो सकय।’’
मंगलू राम तरमरा गे रिहिस – ‘‘तंय ये भेट्ठा चोरहा मन ल बूढ़ा देव के जगा म झन बिठा बेटा। मोला कहिथस सिफारिस करे बर त सुन ले, घर म लिंगोटी छोड़ के अउ लोटा धर के अवइया इन नंगरा मन के आगू मंय हाथ नइ जोंड़व। बेटा, मोला माफी देबे।’’
आज वोला एकरे सुरता आ गे। मंगलू राम ह तुरते एक ठन गजट खरीद के ले आथे। एक झन पढ़े-लिखे आदमी तीर जा के कहिथे – ‘‘बेटा, आज पुलिस म भरती होवइया मन के नांव छपे हे कहिथें। पढ़ के बता तो, एमा किसन, जगत, लखन अउ फकीर के नांव छपे हे कि नहीं।’’
आदमी – ‘‘ये मन कोन ए कका?’’
मंगलू राम – ‘‘हमर गांव के आवंय बेटा, नता म भतीजा लगथें।’’
आदमी – ‘‘एमा सिरिफ सर्किट हाउस वाले मन के नाम छपे हे कका। हमर तुंहर गांव के कोनों अकीर फकीर के नाम नइ छपे हे। समझे?’’
मंगलू राम – ‘‘समझ गेंव बेटा, समझ गेंव। अरे मंय तो कब के समझ गे हंव जी, फेर कोन जाने तुमन कब समझहू ते?’’
अतेक बड़ अन्याय हो गे फेर न तो किसन के पेट म पिरा होइस न लखन-फकीर के। न कहीं आंदोलन होइस, न कहीं प्रदर्सन होइस।
थोकुन दिन बीतिस। एक ठन खबर फेर उड़िस – ‘‘रेलवे के जिन पदों पर लोकल उम्मीदवारों का हक था, उन पदों पर भी बाहरी उम्मीदवारों की भरती की गई।’’
इही हालत कारखाना के हे। इंहां के एको झन आदमी के भरती नइ होवत हे तभो ले उहां के कर्मचारी मन के संख्या रोजे बाढ़त जात हे। लोग बाग तरी तरी गोठियावत रहंय – ‘‘भइया, कौन क्या कर सकता है? ये सारा खेल तो सीधे ऊपर से हो रहा है। ‘‘मंगलू राम सोंचथे – ‘‘ये मन भगवान घर ले भरती हो हो के आवत होहीं क?’’ गुस्सा के मारे वो ह कांपे लगिस।
एक दिन मंगलू राम ह बगीचा म कमावत रहय। अपन आदत मुताबिक बड़े साहब ह मारनिंग वाक बर निकले रहय। नस के पीक ल थूंकिस अउ मोबाइल म गोठियाय के सुरू करिस – ‘‘हां……अम्मा! हम बोल रहा हूं, आपका बबुआ, परनाम।’’
– ‘‘खुस रहा बेटा, जुग-जुग जिया। इत्ती सुबो-सुबो काहे फोन किया है रे बबुआ?’’
– ‘‘अम्मा, बस आसीरबाद लिये खातिर। तुहांर तबीयत ठीक है कि नाहीं। हमको इंहां बड़ी फिकर रहती है। अउ सुनौ, तंुहार खातिर हम ए. सी. वाली नई कार भिजवा रहा हूं। बंगले की ए. सी. तो चालू हो गई हागी न?’’
– ‘‘बबुआ, तुंहर परताप से इंहां सब ठीक-ठाक है बचुआ। अब का कहें बिटवा। हम तुमको न जाने का समझत रेहेन, अउ तुम का निकलेव। पर बबुआ, एक बात बतावा बचुआ। इंहां के हजारों निठल्लू लोगन का तुम उंहां नौकरी लगात हौ। उंहां ले जब तब लाखों करोड़ों रूपिया इंहां भेजत रहत हौ। उहां कोई बोलने टोकने वाला नहीं है का ? हमको बड़ी फिकर होती है।’’
– ‘‘अरे ! अम्मा, फोकट चिंता न किया करा। इंहां के लोग बड़े भोले-भाले , सीधे-सादे अउ सच कहें अम्मा तो बड़े बेवकूफ किस्म के होत हैं। अउ अम्मा, इंहां चारों कोती हमी हम तो हैं। ये बेचारे करें भी तो आखिर का करें? बेफिकर रहा करो अम्मा।’’
– ‘‘सच बबुआ ! ऊंहां के लोग का इतने सीधे, इतने बेवकूफ होत हैं? यकीन नहीं होता बचुआ कि आज की दुनिया में भी कोई इतना बेवकूफ लोग रहत होहीं। वो दुनिया कइसन होही, कभू हमका भी दिखावा बिटवा, बड़ा मजा आइ। पर बबुआ हमरी भी एक बात सुना। अतेक बेखयाली ठीक नहीं है। जरा सावधान रहा कर।’’
– ‘‘ठीक है अम्मा, परनाम।’’
मंगलू राम ह साहब के जम्मों गोठ ल सुनत रहय। वोकर तन बदन म आगी लग गे। वो ह साहब के विही सुंदर अकन देसी पेंड़ तीर, जेकर बड़े जबर कांटा वोकर हांथ म गड़े रहय, अउ जउन ल साहब ह बिसेस रूप ले देस ले मंगा के लगाय रहय, क्यांरी मन के गोड़ाई करत रहय। विही तीर डारा मन के कांट-छांट करे बर एक ठन टंगिया परे रहय। टंगिया ल झपट के उठाइस। मने मन बूढ़ा देव ल सुमरिस, बीर नारायन सिंह के जय बोलाइस, मुंड़ी ले ऊपर उचाइस अउ विही देसी पेड़ के मरुउा अतेक मोठ पेंड़उरा म कचार दिस। कच ले अवाज आइस अउ एके घांव म वो पेंड़ ह हरहरा के गिर गे।
बड़े साहब ह मंगलू राम ल घुड़कथे – ‘‘अबे मंगलू, क्या कर डाला? साला मेरे सबसे प्रिय पेंड़ को कांट दिया। ठहर जा, हरामखोर।’’
मंगलू राम कुछ नइ बोलिस। टंगिया ल खांद म टांग के बरनिर बरनिर करत बड़े साहब कोती आइस। मंगलू राम के अइसन बानी बरन ल देख के साहब कांप गे। अम्मा अभी जउन चेताय रिहिस, वोकरे सुरता आ गे। डर के मारे सुटुर-सुटुर बंगला म जा के खुसर गे।

कुबेर
(कहानी संग्रह भोलापुर के कहानी से)

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One comment

  • कहानी नो हरे सच हरे रोज देखत हन रोज सहत हन छत्‍तीसगढ राज के जोन सपना हम देखे रहेन वो चोरी होगे लागथे
    परदेशिया मन इहां राज करत हे अउ हमन परदेश मा जाके जिए खए बर मजबुर हन एकरे सेती मैं अपन ब्‍लाग
    मोर छत्‍तीसगढी गीत
    मां लिखे धला हव

    सोना चांदी हिरा मो इहां के धुर्रा माटी हे ।।
    तभो ले शोषित दलित गरबिहा छत्‍तीसगढ के वासी हे ।।

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