आगू दुख सहिले

Rashmi Guptaसियान मन के सीख ला माने मा ही भलाई हे। तइहा के सियान मन कहय-बेटा! आगू दुख सहिले रे! पाछू सुख करबे। फेर संगवारी हो हमन उखर बात ला नइ मानन। जम्मो मनखे मन पहिली सुख पाए के मन रखथे। उमन के सोच अइसे रहिथे के बाद मा दुख ला तो भोगने हावय एखर सेती पहिली सुख पा लेथन।
संगवारी हो सुख अउ दुख के सीधा संबंध हावै बने अउ बिगडे करम से। गीता मा भगवान हर कहे हावय के मैं हर ए दुनिया मा कोनो ला सुख अउ दुख नइ देवेॅव। ए दुनिया के जम्मो मनखे मन जइसे करम करथें वइसने फल घलाव पाथें। बने करम के बने फल याने सुख अउ बिगडे करम के बिगडे फल याने दुख। संगवारी हो बने करम ओला कहे जाथे जेखर पाछू मा हमर विचार बने होवय अउ बने विचार रखके हमन कोनो काम ला करथन तब हमला वो काम मा जरूर सफलता अउ सुख दूनो मिलथे फेर कहॅू हमन बुरा विचार रखके कोनो काम ला करथन तब तो वो काम मा हमला सफलता भले मिल जाय फेर सुख नइ मिलय अउ हमला वो काम के बदला मा दुख भोगे बर परथे।
संगवारी हो पढइया लइकन मन अपन पढाई के करत ले कतका दुख उठाथें। जम्मो सुख.सुविधा ला तज के उमन साल भर पढाई करथें तब जाके बने नंबर लेके पास होथें अउ जउन लइकन मन साल भर पढई.लिखई नइ करके दिन भर खेल.कूद मा लगे रहिथें उमनला रिजल्ट निकले के दिन मा रोए बर परथे। जउन लइकन मन अपन समय ला पढई.लिखई मा बिताथें उमन अपन जिनगी के नींव ला मजबूत कर लेथें अउ अडबड जल्दि अपन पाॅव मा खडे होके दुसरो के सहारा बन जाथें फेर जउन मन लइकइ उमर मा अपन समय ला बरबाद करथें उमन ला बडे होके घलाव दूसर के मुॅह ताके बर परथे। संगवारी हो लइकइ उमर मा घलाव समझदारी देखना मामुली बात नोहै। अइसन लइकन मन नींेव के इंZटा बरोबर होथें जउन मन दुख सहे बर अपन आप ला खुसी.खुसी तियार कर लेथें। जइसे.जइसे लइकन मन बडे होवत जाथें दाई.ददा मन सियान होवत जाथें। संगवारी हो जवान लइकन मन ला सियानी अवस्था मा दाई.ददा मन बोझा बरोबर लागे लगथे फेर जउन लइकन मन अपन सारी सुख.सुविधा ला तियाग के अपन दाई.ददा के सेवा करथें उमन के बुढापा हर घलाव सुख से बीतथे काबर के उमन अपन जवानी के दिन ला घलाव दाई.ददा के सेवा मा लगाथें। घूमे.फिरे बर तो सरी जिनगी कम हो जाथे। अइसन लइकन मन अपन बुढापा के ईमारत ला घलाव मजबूत बना लेथें। फेर संगवारी हो जेखर बुढापा हर सुख मा बीतगे उमन तो जीते. जियत सरग पहुच जाथें।
संगवारी हो ए दुनिया हर भूल.भुलैया कस हावय। इंहा के सुख हर हमन ला रस्ता ले भटकाए के काम करथे। जउन मनखे मन इंखर भरम मा नइ परके दुख सहिथे उही मनखे मन सुख पाथे अउ जउन मनखे मन सुख के पाछू मा दउडथे उही मनखे मन अडबड दुख पाथे। एखरे सेती तो सियान मन कहिथे- बेटा! आगू दुख सहिले रे! पाछू सुख करबे। तभे तो सियान मन के सीख ला गठिया के धरे मा ही भलाई हावै। सियान मन के सीख ला माने मा ही भलाई हावै। संगवारी हो तइहा के एक ठन गीत हवै-
आ….. ई……..
बासी देना दाई……
बासी देबे कब ?
बेटा! पढके आबे तब।
भूख लगे हे मोला दाई,
अब तैं बासी देना ओ।
पढे लिखे बर जाथन दाई,
छुट्टी होथे अबेरहा ओ।
अतेक आदर ला करथन दाई,
तभो ले गलती हा आथे ओ।
तब तो गुरूजी हा रिस कर.करके,
तीन.चार छडी जमाथे ओ।
सुसक.सुसक के रोथन दाई,
अतेक आदर ला करथन दाई,
तभो ले गलती हा आथे ओ।
अभी के दुख ला सहिले रे बेटा!
पाछू सुख तैं पाबे रे।
कई हजार के तनखा पइबे,
माई.पिला ला पोसिबे रे………..

रश्मि रामेश्वर गुप्ता

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One comment

  • sunil sharma

    अड़बड़ सुग्घर गोठ batew रश्मि दीदी…सिरतोन म जेन दुःख ल झेल डरथे …सुख रेंगत रेंगत खुद ओखर दुवारी आया जथे……

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