आदि परब के अद्भुत रंग – सुशील भोले

गुड़ी के गोठ

बसंत ऋतु संग बलदे मौसम के नजारा संग कला-जगत के घलो रंग बदलत देख के मन गदगद होगे। छत्तीसगढ़ी कला-संस्कृति के नांव म इने-गिने गीत-नृत्य मन के प्रस्तुति देख-देख के असकटाये आंखी ल आदि परब के रूप में मनमोहनी देखनी मिलगे। एला देखे के बाद मन म ए बात के प्रश्न घलोक किंजरे लागिस के जब छत्तीसगढ़ के मूल आदि संस्कृति म कला के अइसन अद्भुत संसार रचे-बसे हे, त फेर छत्तीसगढ़ ले बाहिर छत्तीसगढ़ी के नांव म जेन कला-मंडली भेजे जाथे वोमा ए मन के समावेश काबर नइ राहय? अभी हाले म राजधानी रायपुर म तीन दिन के आदि परब महोत्सव होइस जेमा हमार छत्तीसगढ़ के तीन, मध्य छत्तीसगढ़ के तीन अउ दक्षिण छत्तीसगढ़ के तीन। माने कुल नौ जनजाति मन के विभिन्न संस्कृति ल गीत-नृत्य के माध्यम से देखाए गिस। सौभाग्य ले मोला तीनों दिन के प्रस्तुति देखे के अवसर मिलिस अउ वोमन ल देखे के बाद मन म ए विचार घेरी-बेरी उभुक-चुभुक होए लागिस के इहां के संस्कृति विभाग के माध्यम से या अन्य सरकारी माध्यम से छत्तीसगढ़ी संस्कृति के नांव म जेन कला-मंडली बाहिर भेजे जाथे वोमा सिरिफ पंथी, पंडवानी, अउ भरथरी के समावेश जादा काबर होथे। एकर ले जेन जुन्न अउ इहां के मूल संस्कृति जेला हम आदि संस्कृति या आदि धर्म के नांव ले जानथन वोकर मन के संख्या जादा काबर नइ राहय?

आदि परब के दुसरइया दिन छुईखदान क्षेत्र ले आए कला मंडली के करमा गीत-नृत्य के प्रस्तुति ल देखे के बाद लागिस के हमर असली सांस्कृतिक संपत्ति ल तो इहां लुका छिपा दिए गे हवय, अउ काली-परन दिन के उपजे-जनमे कला संस्कृति ल छत्तीसगढ़ी संस्कृति के नांव म चारों खुंट बगराए जावत हे। ए तो अच्छा होइस के केन्द्र सरकार के संस्कृति विभाग ह हमला अपन मूल संस्कृति ल देखे-सुने अउ जाने के अवसर दिस। वृत्त चित्र के माध्यम ले जम्मो रिति रिवाज अउ जीवन पद्धति ल समझे के जोंग मढ़ाइस, नइते इहां के संस्कृति विभाग ह तो वोमा खदर-मसर करे के उदिम म भीड़े हवय।
मैं राजिम मेला बनाम कुंभ के विरोधी नइहौं फेर जब इहां के मूल संस्कृति ल बिगाड़े के गोठ चलथे त एकर सुरता तुरते आथे। काबर ते एला अभी हाले म बिगाड़े के शुरूवात करे गे हवय। जिहां तक ये मेला ल भव्यता प्रदान करे के बात हवय त वो मेला के रूप म ही भव्य करे जा सकत रिहिसे, कुंभ के नांव म बाहिर ले अवइया जोगी कम अउ जोगड़ा जादा मनके चारागाह बनाए के कोई जरूरत नइ रिहिसे। आज ये राजिम के कुंभ ह स्थानीय साधु-संत मनला टुहूं देखाके चिढ़ाने वाला, इहां के मूल संस्कृति ल नष्ट करने वाला बनके रहिगे हवय। काबर ते छत्तीसगढ़ के मूल संस्कृति बूढ़ादेव अर्थात भगवान शिव के संस्कृति आय एकरे सेती इहां के जम्मो सिद्ध शिव स्थल मन म मेला-मड़ई भराय के रिवाज हे। एकरे सेती राजिम के मेला ल घलोक हमन नानपन ले ये सुनत आय रेहे हवन के एहर कुलेश्वर महादेव के नांव म भराथे। फेर जबले ए मेला ल कुंभ के नांव दिए गे हवय तबले एकर भराए के कारण ल घलोक कुलेश्वर महादेव ले बदल के राजीव लोचन के नांव म भराने वाला कर दिए गये हे। एहर इहां के मूल संस्कृति ल चौपट करे के साक्षात प्रमाण आय। बिल्कुल इही किसम इहां के मूल कला-संस्कृति मन के घलोक उपेक्षा कर के वोला धीरे-धीरे सिरवा दे के षडयंत्र चलत हावय।
मैं सरकार ले ये पूछना चाहथौं के जतका पंथी, पंडवानी अउ भरथरी आदि कला-मंडली ल इहां ले बाहिर भेजे जाथे का वो अनुपात म करमा, गौरा, सुवा अउ जंवारा के कला-मंडली मन ला बाहिर भेजे जाथे? अउ कहूं नइ भेजे जाय त काबर नइ भेजे जाय? जिहां तक स्तरीय कलाकार मन के बात हे त ए हर कोनो बहाना नइ हो सकय। काबर ते अभी के आदि परब म हमन जेन देखे हवन वोहर तथाकथित बड़े कलाकार मन के प्रस्तुति ले कई गुना अच्छा अउ स्तरीय कला के प्रदर्शन रिहीसे। फेर सबले बड़े बात तो इहू हवय के जब नीयत अच्छा होथे त प्रशिक्षण के माध्यम ले छोटे अउ अनगढ़ कलाकार मनला बड़े अउ सुघ्घर बनाए जा सकथे। भरोसा हे इहां के संस्कृति विभाग के चेत ह ए डहर लहुटही।

सुशील भोले
सहायक संपादक – इतवारी अखबार

41191, डॉ. बघेल गली

संजय नगर, टिकरापारा, रायपुर

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