उत्तर कांड के एक अंश छत्तीसगढी म

अब तो करम के रहिस एक दिन बाकी
कब देखन पाबों राम लला के झांकी
हे भाल पांच में परिन सबेच नर नारी
देहे दुबवराइस राम विरह मा भारी
दोहा –
सगुन होय सुन्दर सकल सबके मन आनंद।
पुर सोभा जइसे कहे, आवत रघुकुल चंद।।
महतारी मन ला लगे, अब पूरिस मन काम
कोनो अव कहतेच हवे, आवत बन ले राम
जेवनी आंखी औ भूजा, फरके बारंबार
भरत सगुन ला जानके मन मां करे विचार
अब तो करार के रहिस एक दिन बाकी
दुख भइस सोच हिरदे मंगल राम टांकी
कइसे का कारण भइस राम नई आईन
का जान पाखंडी मोला प्रभु विसराईन
धन धन तै लक्ष्मिन तै हर अस बड़भागी
श्रीरामचंद्र के चरन कवल अनुरागी
चीन्हिन अड़बड़ कपटी पाखंडी चोला
ते कारन अपन संग नई लेईन मोला
करनी ला मोर कभू मन मा प्रभू धरही
तो कलप कलप के दास कभू नई तरही
जन के अवगुनला कभू चित नई लावै
बड़ दयावंत प्रभु दीन दयाल कहावै
जी मा अब मोर भरोसा एकेच आवै
झट मिलहि राम सगुन सुभ मोला जनावै
बीते करार घर मा परान रह जाही
पापी ना मोर कस देखे मां कहूं आही
दोहा –
राम विरह के सिन्धु मां, भरत मगन मत होत।
विप्र रूप धर पवन सुत, पहुंचिन जइसे पोत।।

पद्मश्री डॉ.मुकुटधर पाण्‍डेय

(श्री राकेश तिवारी जी द्वारा सन् 1996 म प्रकाशित छत्‍तीसगढ़ी काव्‍य संग्रह ‘छत्‍तीसगढ़ के माटी चंदन’ ले साभार)

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