उनमन नहावत तो होहीं रे : डॉ. विमल कुमार पाठक के गीत





करा असन ठरत हावय पानी रे नदिया के
उनमन नहांवत तो होहीं रे।
उंखरे तो गांवे ले आये हे नदिया ह
होही नहांवत मोर जोही रे।
महर-महर महकत मम्हावत हे पानी ह।
लागत हे घुरगे हे सइघो जवानी ह।
चट कत कस, गुर-गुर ले छू वत हे
अंग-अंग ल, चूंदी फरियावत तो होही रे।
तउरत नहांवत तो होही रे।
अब तो गुर-गुर एक ढंगे के लागत हे।
अट गे पानी हा, सुरता देवावत हे।
ओठ उंकर चूमे कस मिट्ठ -मिट्ठ लागत हे।
पीयत अउ फुरकत तो होही रे।
घुटकत अउ पुलकत तो होहीं रे।
करा असन ठरत हावय पानी रे
नदिया के उनमन नहावत …… ।
ये दे मटमइला पानी के रंग हो गय।
अब तो लगथे घटौदा मं उन चढ़ गंय।
साबुन तो चुपरे कस पानी ह दीखत हे
अंग अंग मं चुपरत तो होहीं रे।
लुगरा ल कांचत तो होहीं रे।
करा असन ठरत हावय
पानी रे नदिया के
उनमन नहांवत तो होहीं रे।
कइसे पानी अब तात-तात लागत हे।
लगथे लुगरा निचोके उन जावत हे।
पानी अब सिटठ तो हो गय रे, लागत हे….
घर बर उन लहुट त तो होहीं रे।
नदिया ले लहुटत तो होहीं रे
करा असन ठरत हावय…..

डॉ. विमल कुमार पाठक





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