एक बित्ता के पेट : सियान मन के सीख




सियान मन के सीख ला माने मा ही भलाई हे। संगवारी हो तइहा के सियान मन कहय-बेटा! नानकुन एक बित्ता के पेट हर मनखे से का नई करवावय रे। फेर संगवारी हो हमन उंखर बात ला बने ढंग ले समझ नई पाएन। संगवारी हो हमन 1 मई के अंतर्राश्ट्रीय मजदूर दिवस मनाथन। मजदूर दिवस सबले पहिली 1 मई 1923 के मद्रास (चेन्नई) में मनाए गै रहिस हावय जेला विश्व स्तर में मनाए के शुरूवात 1 मई 1886 से होय हावय। विश्व के 80 से जादा देश 1 मई ला मजदूर दिवस के रूप में मनाथे। अंतर्राश्ट्रीय मजदूर दिवस ला अंतर्राश्ट्रीय कर्मचारी दिवस, श्रमिक दिवस या मई दिवस घलाव कहे जाथे। हमन मजदूर के मतलब समझथन गरीब मजबूर इंसान जउन हर दिन.रात घाम.पियास में जी तोड़ मेहनत करथे जबकि अइसन नई हे। मजदूर वर्ग में वो जम्मों मनखे मन आथे जउन मन दूसर बर काम करथे अउ बदला में मेहनताना लेथे। तन अउ मन से मेहनत करने वाला हर इंसान मजदूर आय फेर चाहे वो ईटा.सीमेंट ढोवत मनखे होवय के एसी आफिस में बइठे फाईल के बोझ में दबे एक कर्मचारी एखरे सेती मजदूर ला कभू भी मजबूर समझे के भूल नई करना चाही। मजदूर ला मजबूर समझना हमर सबले बडे़ भूल आय। मजदूर हमेंशा अपन मेंहनत के कमाई ला खाथे। इमन स्वाभिमानी होथे । अपन मेंहनत अउ लगन में विश्वास रखथे। इमन कखरो आगू में हाथ फैलाना पसंद नई करय। मजदूर के उपर ही संसार के विकास अउ विनाश दूनो आश्रित हावै। वास्तव में मजदूर के कोनो जाति या धरम नई होवय। केवल अउ केवल मेहनत ही ओखर पहिचान होथे। स्वाभिमान का होथे अउ कम कमाई में अपन जिनगी सुख से कइसे बिताए जाथे ऐ मजदूर ही बता सकथे। 1 मई के दिन पूरा संसार इंखर ताकत के लोहा मानथे। पूरा संसार ला सुंदर बनाए मा मजदूर के हाथ हे। फेर आज स्थिति थोरकन बदल गे हावय। आजादी के पहिली भी मजदूर वर्ग गरीबी, भूखमरी अउ शोशण के शिकार रहिस हावय तो आज आजादी के अतेक साल बाद घलाव उंखर स्थिति में बहुत जादा बदलाव नई आय हवै ए हर हमर बर अड़बड़ सोचे के बात हवै। आज घलाव एक मजदूर के न्यूनतम रोजी औसतन 300 रूपिया हावै जउन कि महिना में अगर हर दिन काम मिलिस तब मुश्किल से 9000 रूपिया होथे। अगर महिना में 10 दिन भी कोनो मजदूर ला काम नई मिलिस या कोनो कारणवश काम में नई जा पाइस तब 6000 रूपिया में दाई.ददा के संग अपन अउ अपन परिवार के जेमा जोड़ी.जांवर अउ लइकन मन ला मिलाके कम से कम 6 सदस्य के जीवन.यापन कइसे होवत होही ये बहुत ही गंभीर बात आय। 14 साल से कम उम्र के लइका जउन मन काम करे बर जाथे उमन ला बाल मजदूर कहे जाथे। का 15 अउ 16 साल के लइकन मन मजदूरी करे के लइक होथे? का उंखर मन बालमन नई होवय यहु हर हमर बर सोचे के बात आय। संगवारी हो हमर समाज हर दू भाग में बंट गे हावय। एक तो शोशक वर्ग अउ दूसर शोशित वर्ग। हालाकि सरकार हर ए खाई ला पाटे बर बहुत बडे़ कदम नोटबंदी के उठाइस हावय। फेर इंखर बीच में एक ठन अउ बड़का खाई हावय शिक्षा के। संगवारी हो जब तक ए खाई ला पाट के बरोबर नई करे जाही तब तक हमर मानव समाज में कई प्रकार के अपराध होवत रही काबर के हर अच्छाई अउ बुराई के जड़ होथे शिक्षा। हालाकि सरकार हर बहुत अकन योजना बनाए हावय फेर ये योजना के लाभ कतका झन ला मिलत हे ? ये बात के हमला धियान रखना बहुत जरूरी हावय। सियान बिना धियान नई होवय। तभे तो उंखर सीख ला गठिया के धरे मा ही भलाई हावै। सियान मन के सीख ला माने मा ही भलाई हावै।
रश्मि रामेश्वर गुप्ता







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