गांव के संस्‍कृति के धरोहर : ओरिया के छांव




“ओरिया के छांव” के मनीराम साहू “मितान” के पहिली छत्तीसगढी कृति आय। छत्तीसगढ के गॉंव-गँवई ल जेन जानना चाहथे उनला ये किताब जरूर पढना चाही। सावन, भादो, जेठ,अषाढ़, घाम, जाड जम्मो मास के सौंदर्य के बरनन मितान जी ये संघरा म करे हवय। कोन महिना म छत्तीसगढ़ के किसान का काम करथे, कोन से तिहार परथे तेकर सुघ्‍घर चित्रण ये संघरा म मिलही संगे-संग सँझा, बिहनिया, देवारी, फागुन, तीजा-पोरा, नवा बछर हमर छत्तीसगढ़ म कइसे होथे अउ कइसे मनाथे येकर जानकारी ये संघरा ल पढे़ म मिलही। कुल 51 रचना ये संघरा म हवय जेमा छत्तीसगढी़ के मानक शब्द के प्रयोग कवि ह करे हवय।
मितान जी जमीन ले जुडे़ रचनाकार आय जइसने देखे हें वइसने लिखें हवंय। बतर-बियासी, निंदई-गुडई, धान लुवई, करपा उठई, भारा बंधई तक के वर्णन ल पढबे़ त खेती किसानी के जम्मो दृश्य ह आँखी के आघू सनिमा कस दिखे लागथे। किसान के दु:ख-पीरा ल देख के मितान जी लिखथे –
हरहर-कटकट घेरे रहिथे /रात दिन हम ला किसानी म
बड़ चढऊ-उतारू हे संगी / किसनहा के जिनगानी म।
छत्तीसगढी़ संस्कृति म अँगाकर के महिमा ल सबो जानथव एकर बखान कवि ह जबरस्त ढंग ले करथे –
वाह रे अँगाकर /तोला कहिथे भँदाकर /तैं छेना कर चाकर…..
समाज म व्याप्त बुरई ले रचनाकार ह अनभिज्ञ नई हे, कन्या भ्रुण हत्या विरोध म उन मुखर होके अपन बात रखथे-
मारत हच तैं कोंख के बेटी / बहू कहाँ ले पाबे रे,
अरे हइतारा मनखे जात /तैं जर सुद्धा नाश हो जाबे रे।
गाँव-गंवई के संगे-संग देश के चिंता घलो कवि ल झकझोरथे, सीमा पार के संभावित खतरा उपर आह्वान करथे-
तैं खरतरिहा बीर बेटा / बीर नरायन बन जा
दुसमन मन के आघू म /बन्दूक बन के तनजा
अपन तीर तखार के गाँव म लगने वाला किरवई के प्रसिद्ध मवेशी बाजार अउ सोमनाथ मेला के वर्णन मितानजी अपन कविता म सुघ्‍घर ढंग ले करे हे जेन ल पढ के मन म उत्सुकता होथे के अतेक प्रसिद्ध जघा कोन मेर होही –
लखना सोमनाथ के मेला / चल ना जाबो संगवारी
भुइया फोर के उद्गरे हे / बबा भोले भण्डारी ।
गाँव म बोले जाने वाला ठेठ छत्तीसगढी़ शब्द ल कवि अपना रचना म प्रयोग करे हवय जेला पढे़च म बड मजा आथे- धनहा, भरी-भाठा, कोठी-डोली, नरवा-झोरकी, संसी-कोलकी, कुकुर-माकर, झुकुर-झाकर, नाहना, जोता, खुमरी, गेरवा,परई, कुड्रेरा, ठेकवा, भंदई, अकतरिया, काँसडा ये शब्द कुछ उदाहरण आय जेन ये संघरा म मिलथे। खोइला भाटा, रखिया के बरी, जीमी काँदा, कनसइया लेडगा बरी, अदउरी बरी, चेंच अमारी, पटवा, सुकसा, कुरमा भाजी, नून मिरचा के चटनी अउ अँगाकर रोटी ल अपन रचना म जघा दे के गाँव देहात के नंदावत संस्कृति ल बचाय के काम मितान जी करे हय। आज के नवा पीढी मन अइसन शब्द ले विमुख होत जावत हे जन गंभीर चिंता के विषय ये।
साहूजी जउन माटी म जनमिस, जिहाँ के पानी पीस, जेकर धुर्रा फुदकी म खेल के बडे होइस वो माटी के करजा ल उतारे के काम ए संघरा के माध्यम ले करे हवय जेमा रचनाकार पूर्ण रूप ले सफल होय हवय। चूँकि उँकर पहिली संघरा आय वो हिसाब से शब्द चयन अउ मात्रा उपर पूरा सावधानी बरते गे हवय। अनुस्वार, अनुनासिक, लिंग अउ वचन के पूरा धियान रखे गे हवय ये कारण से भी लेखक के परिपक्वता साफ झलकथे। पुस्तक के छपाई सुघ्‍घर अउ कव्हर पेज “ओरिया के छाव” शीर्षक के हिसाब ले सटीक बने हवय।
अजय ‘अमृतांशु’







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