कबिता : चंदा

रोज रात के आवै चंदा,
अउ अंजोर बगरावै चंदा।
सुग्घर गोल सोंहारी बनके,
कतका मन ललचावै चंदा।
होतेच संझा चढ़ अगास मा,
बादर संग इतरावै चंदा।
डोकरा कस फेर होत बिहनिया,
धीरे-धीरे जावै चंदा।
तरिया पार के मंदिर ऊपर,
चढ़के रोज बलावै चंदा।
पीपर के डारा मा अटके,
कभू-कभू बिजरावै चंदा

दिनेश गौतम
वृंदावन 72, श्रीकृष्णविहार
जयनारायण काबरा नगर, बेमेतरा दुर्ग

आरंभ म पढ़व :-
कठफोड़वा अउ ठेठरी खुरमी
गांव के महमहई फरा

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