कविता : अब भइगे !






अब भइगे बंदुक ल छोड दव
बस्तर के माटी ल झंन रंगव
महतारी के कोरा सुना होगे
आॅखी ले आंसु बोहवत हे
छोटे बहिनी राखी ल थारी म सजाये हे
नान नान लईका मन रस्दा देखत हें
नावा बोहासिन के मांग ह सुना होगे
पडोसी के बबा गुनत हे
अपन नाती देख रोअत हे
तुमन ल लाज निलागे
मुरख हव निचट
कोनो अपन भाई ल छुप के मारथे का
काबर उदिम मचाये हव
बस्तर के माटी ल काबर बदनामी म डारे हव
अब भइगे बंदुक ल छोड दव
बस्तर के माटी ल झंन रंगव
गरीब के बेटा जंगल म जांगर टोरथ हे
अउ कतेक खुन बहाहा
छोड दव बंदूक ल
नक्सली काबर बने हव
अपनेच माटी म अपनेच भाई मन ल गोली दागत हव
छोड दव बंदूक ल
महतारी के कोरा सुना होगे
आॅखी ले आंसु बोहवत हे
अब भइगे बंदुक ल छोड दव
बस्तर के माटी ल झंन रंगव

लक्ष्मी नारायण लहरे “साहिल”
युवा साहित्यकार पत्रकार
सह संपादक सतयुग संसार रायपुर






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