कविता -खुरसी के खेल

आजकाल के जमाना मे भइया
खुरसी के हाबे मांग
जेला देखबे तेला संगी
खींचत हे खुरसी के टांग |
खुरसी के खातिर नेता मन
का का नइ करत हाबे
अपन सुवारथ सबो साधत
कहां ले सुराज लाबे |
बड़े बड़े आशवासन देके
जनता ल लुभाथे
खुरसी के मिलते साठ
सबला भुला जाथे |
भुखमरी गरीबी बेरोजगारी ल
मुद्दा बना देथे
जनता ल सब बुध्दु बनाके
वोट ल ले लेथे |
खुरसी के महिमा भारी हे
का का नइ कर देथे
जेती मिलथे खुरसी ह
उही कोती चल देथे |
नेता से चपरासी तक सब
खेलथे खुरसी के खेल
बड़े बड़े आफिस में देखबे
होथे रेलम पेल |
जेहा बइठथे खुरसी में
उही राजा कहाथे
लछमी के बरसा ओकरे कर होथे
उही गंगा नहाथे |
जेकर किसमत चमकगे
उही ह खुरसी में बइठथे
सब कोई ल टुंहू देखाके
अपने अपन अइठथे |
खुरसी के महिमा भारी हे
बांटत सब कोई परचा
रायपुर से दिल्ली तक संगी
खुरसी के हाबे चरचा |

Mahendra Dewangan
रचनाकार
महेन्द्र देवांगन “माटी”
पंडरिया (कवर्धा)
मो.-8602407353
Email-mahendradewanganmati@gmail.com

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