कविता

Matura Prasad Vermaदेख के इकर हाल मोला रोवासी आ जाथे । ।।
रोए नी सकव मोर मुँह मा अब हाँसी आ जाथे ।।

आज काल के लइकामन भुला गिन मरजादा,
मुहाटी मा आके सियान ला तभो खासी आ जाथे ।।

बरा अउ सोहारी बेटा बहु रोज खाथे ,
सियानिन के भाग मा बोरे बासी आ जाथे ।।

पढ लिख के बेटा हा हो गेहे सहरिया ,
हाल पुछ बर कभू कभू चपरासी आ जाथे ।।

मथुरा प्रसाद वर्मा ‘ प्रसाद’
सडक पारा कोलिहा बलौदाबजार छ ग
मो. 8889710210

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2 comments

  • ramesh kumar chauhan

    वाह भई वर्माजी सुघ्घर कविता लिखे हव । समाज के बदलत परिवेश उपर बढिया व्यंग बने हे । ये प्रयास बर आपल बधाई

  • jatin

    Wow this is amazing…

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