कहिनी : चटकन

‘ओ खाली परिया जमीन म न मंदिर बनाए जाय न मस्जिद बनाए जाय। ओमा एक अइसे आसरम बनाए जाए जेमा बेसहारा डोकरा, डोकरी, बइहा कस किंजरइया मनखे, अनाथ लोग लइका राहय।
संग म गांव के अइसे मनखे जेखर गुंजाइस के लइक ठउर-ठिकाना नइ हे तउने मन ए आसरम म रहि सकंय। हिन्दू भाई अउ मुसलमान भाई आप मन मंदिर अउ मस्जिद बनवाए बर जउन चंदा सकेले हव तेला आसरम बनवाए बर लगा दव।’
सड़क तीर मा पीपर खाल्हे खाली परिया में जब बनही ते बजरंग बलीच के मंदिर बनही। ए बात मां फूलगोंदा गांव के जम्मों हिन्दू मन अड़गें। बाह्मन पारा, लोधी पारा, ठाकुर पारा अउ सतनामी पारा सबो झन एक होगे। कुंआ पारा के सबो मुसलमान मन घलो पीपर खाल्हे परिया मा मस्जिद बनाए बर रोम्हिया दीन। जामिल, साहबुद्दीन, फारूख जइसे सियान मन तको मस्जिद बनवाए बर परियास तेज कर दीन। दूसर पक्ष मां मनराखन रमेसर, दरसू संग म दू-चार झन छोकरा मन घलो बजरंग बली के मंदिर बनवाए बर उम्हियागे। गांव के बइठका मां गांव भर के मन सकलाए रिहिन। कोनो काखरो गोठ ला नी सुनत रिहिन। मछरी बजार कस चिंव-चांव होवत रिहिस। एक पक्ष काहय- खाली परिया मां मंदिर बनाबो। दूसर पक्ष काहय मस्जिद बनाबो। खींचतान अब्बड़ चलत रिहिस। काबर के गांव म आधा हिन्दू अउ आधा मुसलमान रहिन हे।
जामिल, रमेसर बर बगियागे- ‘तैं काली के टुरा कांही नी जानस। एके ठन भर तो मस्जिद हे हमर गांव मां अउ मंदिर जगा-जगा हे। सबो जगा ल तुहीं मन रोप डरे हवव।’ अतका मं रमेसर तको तमकगे- ‘कहूं ए जगा बजरंग बली के मंदिर नइ बनही, ते हमन कुंआ पारा मा लंका दहन कर देबो।’ अतका बात ल सुनिस ते जामिल संग चार- पांच झन मन रमेसर ल मारे बर उठगे। दूनो पक्ष मां हाथापाई होगे। गजब बेरा मां दूनो पक्ष थिरइन। दूनो पक्ष मां सुलाह नई होवत देखके कतको मनखे बइठका ले उसल के आगें। बइठका सिरागे, फेर कोनो नतीजा नइ निकलिस।
फूलगोंदा गांव के जम्मो मनखे मन दू गुट म बंटगे। मंदिर-मस्जिद के झगरा नंगतहेच माढ़गे। संझा होते गांव सिमसाम हो जय। एक पारा के मनखे मन दूसर पारा नी जात रिहिन। मनखे मन अकेल्ला-दूकेल्ला नई रेंगत रिहिन। अब दूनो पक्ष के अलग-अलग बइठका होय लागिस। दूनो पक्ष मन मंदिर-मस्जिद बनाए बर चंदा सकेले के अभियान ल अउ तेज कर दीन।
मंझनिया कून सुखीत ह अंगना के चंवरा मा बइठके ढेरा आंटत रहिस। ओतके पइत डेरउठी डाहर ले आवाज अइस- ‘भगवान के नांव मां दे दव दाई! दे दव ददा!’ एक झन भीखमंगा ह डेरउठी मां आके बइठगे। भीखमंगा ल देखिस ते सुखीत भड़कगे- ‘ये मंगइया मन तको हदास कर दीन गा। दू-चार दिन होथे ताहंन डेरउठी मां दत जथे।’ अइसने सुखीत ह अब्बड अकन ओलिइस। भीखमंगा चिटियाहा कस झोला ल धरे रिहिस। देखे म न ओ हिन्दू कस दिखत रिहिस न मुसलमान कस दिखत रिहिस। ओ तो सिरिफ भीखमंगा कस दिखत रिहिस। सुखीत घर कांही मिले के आसा नइ दिखिस ते डेरउठी ले उठके गली कोति रेंग दीस।
रमेसर अउ दरसू सुखीत घर खखारत पहुंचिस। सुखीत ओमन ल हालचाल पूछिस। दरसू बतइस- ‘काला बताबे भइया! गांव के हालत बिगड़गे हे। कब मारकाट हो जही कोनो ठिकाना नइ हे। साहर के दूर चार झन नेता मन ओमन ल ऊभरावत हे…’ रमेसर दरसू के बात ल बीच म काट के अपन आए के मुख्य कारन ल बताइस कि ‘बइठका के दिन तंय ह मंदिर बनवाए बर दू सौ रुपिया दूहूं केहे रेहेस।’ सुखीत कुरिया डाहर गिस अउ सौ रुपिया के दू ठिन लोट ला लाके रमेसर के हांत मा धरा दिस। रुपिया ल धरिस अउ रमेसर अउ दरसू बिदा लेके सुखीत घर ले निकलगे।
मुसलमान मन तको चंदा सकेले के सुरू कर दिन। वसीम फारूख घर खटिया म बइठे रिहिस अउ बतात रिहिस- ‘सम्मार के दिन हमन साहर गे रेहेन, कका! ऊहिचे ले हथियार मन ल लाए हवन।’ फारूख ल एक ठिन छुरा ल देवत वसीम फेर किहिस- ‘एला धर ले कका! काम आही अकेल्ला- दुकेल्ला रेंगबे त एला संगे मा राखबे।’ छुरा ल फारूख कुरिया म भीतरइस अउ दू सौ रुपिया ल लानके वसीम ल दे दिस। वसीम नानुक कापी ल निकालिस अउ चिन्हा पार के फेर मूंद दिस।
फूलगोंदा गांव के मंदिर मस्जिद के झगरा चार महीना तक लामगे। ए झगरा के खभर दूरिहा-दूरिहा के गांव मा तको बगरगे। मनहरन पहिली फूलगोंदा गांव के परामरी इसकूल मा मास्टर रिहिस, उहू ल ए झगरा के खभर होइस। मनहर मास्टर फूलगोंदा गांव-मां करीब बीस बछर तक पढ़ाए हे। खभर पातेच्च मनहरन मास्टर फूलगोंदा गांव आए के पुरोगिराम जमइस। ओहा फूलगोंदा गांव खभर अमरइस कि अवइया सनिच्चर के दिन आहू किके। गांव भर खभर दंउड़गे कि मनहरन मास्टर सनिच्चर के दिन आही अउ संझा लीम चंवरा म बइठका घलो हे।
गांव के मन मनहरन मास्टर के बड़ सनमान करयं। ओखर बात ल कोन काटतिस। सनिच्चर के दिन संझा गांव के लीम चंवरा मा कटाकट बइठका सकलागे। हिन्दू, मुसलमान सबो झन आगे। मनहरन मास्टर अपन बात ला सुरू करिस- ‘आप मन पढ़े-लिखे होके नान-नान बात मां झगरा करथव, ए बने बात नोहे। ए खभर ल सुनके मोला दुख होइस। हमन ला समाज मं अइसे काम करे के जिद करना चाही जेखर ले समाज ल कांही फायहा होवय। मंदिर अउ मस्जिद बनाए ले हमर समाज ल कांही लाभ नइ होवय। केहे जाथे के जन सेवा ह परभु सेवा होथे ओखर सेती हमन ल धरम के नांव म नइ लड़के धुन के काम करना चाही।’ ननकू डोकरा किहिस- ‘त का करन मास्टर।’ मनहरन मास्टर बतइस मोर बिचार हे कि- ‘ओ खाली परिया जमीन म न मंदिर बनाए जाय न मस्जिद बनाए जाय। ओमा एक अइसे आसरम बनाए जाए जेमा बेसहारा डोकरा -डोकरी, बइहा कस किंजरइया मनखे, अनाथ लोग लइका राहय। संग म गांव के अइसे मनखे जेखर गुंजाइस के लइक ठउर ठिकाना नइ हे तउने मन ए आसरम म रहि सकंय। हिन्दू भाई अउ मुसलमान भाई आप मन मंदिर अऊ मस्जिद बनवाए बर जउन चंदा सकेले हव तेनला आसरम बनवाए बर लगा दव। एखर ले समाज ल फायदा तको होही अउ लड़ई-झगरा तको सिराही।’
मनहरन मास्टर के बात ल कोन काटतिस। ये बात ह गांव वाला मन ल जंचगे। रमेसर अउ फारुख थोकिन आना-कानी करत रिहिन, फेर बांकी सियान मन सुन्ता होगे। बइठका मां आसरम बनाए के बात जमगे। मनहरन मास्टर के मेहनत काम आगे।
दू-चार दिन म सड़क तीर के पीपरखाल्हे के परिया म ईंटा, रेती, गिट्टी गिरगे। आसरम बनाए के काम सुरू होगे। गांव वाला मन मगन होगे आसरम बनाए के काम ल करिन। आठ महीना मां आसरम बनके तियार होगे। गांव वाला मन सोचिन कि आसरम के उद्धाटन बर कोन ला बुलाना चाही। ओमन कोनो नेता ल नइ बुलइन। गांव वाला मन मनहरन मास्टर ला आसरम के उद्धाटन बर मुख्य अतिथि के रूप मां बुलइन। ओमन आसरम के नांव राखिन- ‘मनहरन आसरम, गांव- फूलगोंदा। बुधवार के दिन आसरम के उद्धाटन के प्रोग्राम जमगे।’
बुधवार के दिन मनहरन मास्टर लूना मां फूलगोंदा गांव म अइस। माइक मां एक ठिन गाना बाजत रिहिस- ‘न हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा, इन्सान की औलाद है इनसान बनेगा…।’ ठंउका चार बजे आसरम के उद्धाटन के पुरोगिराम सुरू होगे। मनहरन मास्टर फीता काटिस। गांव वाला मन ओला गजब जोजियइन कि ओमन माइक म कांही बोलय। मनहरन मास्टर किहिस- ‘संगवारी हो। आज हमर समाज मां दू-चार झन अइसे मनखे हे जेमन हमन ल धरम के नांव म लड़वाथे अपन सुआरथ के खातिर अउ हमूमन आंखी मूंदके एक दूसर के नरी मां छुरा चला देथन।’
आप मन ए जगा मं मंदिर-मस्जिद नइ बनाके आसरम बनाए हव अउ अइसे करके आप मन ओ मनखे मन के गाल मा अइसे चटकन मारे हव जेला ओमन जिनगी भर सुरता राखही। ए सुआरथी मनखे नइ चेतय, हो सकथे एमन भविस मा हमन ल धरम के नांव मां अउ लड़वाए के परियास करहीं। त हमन ल आपस म लड़ना नइ हे बल्कि अइसने काम करके ऊंखर गाल मां अउ अइसने चटकन मारना हे…। अब तो ऊहां ईद अउ देवारी तिहार के खुसी दुगुना होगे राहय। ईद के सेवई ल हिन्दू बनावयं अउ देवारी के पूरा के तइयारी ल मुसलमान मन करंय। सब संघरा बइठ के सेवई खांवय अउ देवारी के परसाद झोंकय। मनहर मास्टर के बात सही होगे। नेता मन के गाल ह चटकन खाय कस ललिया गे राहय।
यशपाल जंघेल
तेन्दूभांठा, गंडई
दनिया, छुईखदान

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