टेंशन वाली केंवटिंन दाई 1

केंवटिन धमतरी राजिम के गाड़ी तीर धमतरी टेसन म चना मुर्रा बेचय। पचास साल ले टेशन मास्टर रहे बंगाली बाबू एक दिन अइस अऊ केंवटिन ल रयपुर घुमाय बर गाड़ी म बइठार के लान लिस। केंवटिन के पहिली बेर गाड़ी म बइठे अउ घूमेके अनुभव ले पढ़व।
‘ए दाई भालो आहे।’
‘अरे बंगाली बाबू, भालो हे, सुग्घर हे। रिटायर होएके बड़ दिन बाद बाबू तोला इंहा के सुरता आइस। तोर बाल, बच्चा मन कहां रथें, अउ तैं कहां रथस।’ छोटे रउल लाइन के धमतरी टेसन म चना मुर्रा, लाड़ू बेचवइया केंवटिन दाई ह एक बेर म बड़ अकन चीज पूछ डारिस।
‘हम सब उधर कोलकाता में रहता। बेटी ससुराल में और बेटा अपुन के पास रहता। पोता, पेती सब रहता।’ बंगाली बाबू एक संसा में सब बता डारिस।
‘अपन आ रहा, तुमको कल रायपुर ले जाएगा।’
‘केंवटिन दाई- हमर बड़ भाग ए बंगाली बाबू।’
केंवटिन ह राजिम ले बिहा होके धमतरी आए रहिस ओई समय ए टेशन ह बने रहिस अऊ कुछ दिन बाद ए छोटे रउल लाइन म रउल गाडी चले लागे रहिस। बिहा के बाद 5 बच्छर तक गांव म किंदर-किंदर के चना मुर्रा, लाड़ू बेचिस फेर टेशन के चहल-पहल देख के केवटिंन ह अपन समान बेचे बर स्थाई ठिकाना ऐला बना लिस। आज 55 बच्छर होगे ओला टेशन म अपन समान बेचत। सब ओला चिनथें, पहचानथें ओहा टेशन वाली केवटिंन दाई होगे हे। अब उमर भी पचहत्तर के होगे हे।
धमतरी बस्ती म ओकर सियान, बेटी, बेटा, बहू, दमाद, नाती, पोता, सब रथें। सियनहा ह जाल अऊ चोरिया लेके रोज मछरी मारे चल देथे। अऊ संझा ओला हाट, बाजार म बेंचथे। नई बेचाय त रांध के सब परिवार मिलके खाथें। बड़े बजार के दिन रात के मंद पीथे अऊ चुपेचाप जाके सुत जाथे। अन्जान मन ल पता नई चलै कि सियनहा केवटा ह मंद पीए हे। सियनहा ह अस्सी बछर के होवत हे तभोले पानी देखके मछरी के लोरस म भुजा ह कोतरी कस फरकथे। केंवटा अऊ केंवटिन के शरीर ह अभी भी पोठ हे। केवटा के देंह ह घाम म अऊ केंवटिन के देंह ह आगी म सीझगे हे। पोठ देंह ह करिया-करिया तेल चुपरे कस चिक्कन चमकथे। जुन्ना आदमी के पोठ होड़ा ए।
धमतरी टेसन बने के कुछ बछर बाद बंगाली बाबू ह टेशन मास्टर बनके आए रहिस। पूरा चालीस बछर इंहा ऐके जगा नउकरी करके रिटायर होये रहिस अउ परिवार सहित अपन देश चल दे रहिस। पन्द्रा बछर बाद लहुटिस त सब तीर भेंट करिस।
दूसर दिन बिहन्ना के रेलगाड़ी में रैपुर जाये बर केंवटिन अपन दुकान के समान लेके निकलिस। संग म बड़का नाती भी रहिस। अपन चना, मुर्रा, लाड़ू के पसरा ला बगरा के नाती ल दुकान चलाए के हिल्ले लगाके टेशन मास्टर के कमरा के बाहिर एक बेंच म केंवटिन बइठगे। रउल गाड़ी छूटे के पहिली बंगाली बाबू आ गिस। केंवटिन ल देखके बोलिस ‘दाई आगे हस।’
‘हाहो बंगाली बाबू।’
डब्बा म बइठे बर दाई ला बंगाली बाबू बलाइस त। दाई हरउल के डब्बा ल माथा नवा के परनाम करिस फेर जै हो रउल देवता बोलिस अऊ गाड़ी म चढ़िस।
दाई ल पचपन बछर होगे टेशन म अपन दुकान चलात। कभू रउल गाड़ी म नई बइठे रहिस लकठा जाके रउल ल छूके जरूर देखे रहिस। डब्बा भीतर बइठे दाई ह सबे सवारी मन ला धान लगा के देखिस फेर डब्बा के बाहिर दुनो कती के खिड़की ले देखे लागिस।
घर-द्वार, खेत-खार, नदिया-नरवा, रूख-राई सब नहाकत गिस। पहिली बार गाड़ी म बइठे दाई ल ऐ छोटे लाइन के गाड़ी ह जोरहा भागत हे लगिस। जहां गाड़ी रूकै किसिम-किसिम के आदमी चढ़ै, अउ उतरैं गाड़ी ह अतका जोरहा भागत हे तभो ले कई सवारी मन ओला भंइसा गाड़ी कइके हासैं त दाई ल अचंभो लागै।
टेशन नई रहै तभो कई जगहा गाड़ी रूकै अउ सवारी मन चढ़ै, उतरैं। एहू बात ह दाई बर अचंभो वाला रहिस। अउ सबले ताजुब तब होवै जब गाड़ी के स्टाफ ह सड़क आवै त उतर के फाटक ल बंद करै तभो सड़क के चलवइया सबे गाड़ी वाले मन बरपेल्ली गाड़ी के आगू ले रउल लाइन ल नहांकैं। गाड़ी जब फाटक ले आगू बढ़तिस त गाड़ी के स्टाफ ल फाटक खोल के गाड़ी म बइठै।
जब रैपुर शहर भीतर गाड़ी ह पहुंचिस त सहीं म ओकर जोरहा चाल ह भइंसा गाड़ा कस होगे। गाड़ी कतको चिचियावै रिरियावै तभो ले रउल लाइन तीर ले अप्पत भइरा आदमी मन नई तियात रहिन। कई जगहा तो डरेबर ह ओमना ला भइंसा बइला जिनावर कस हंकालै त ओमन तिरयावै।
रैपुर टेशन हबरते सवारी मन भिरभिर ले पलेटफारम म उतरिन अउ छोटे लेन के छोटे डब्बा वाले गाड़ी ह सफ्फा खाली होगे।
बंगाली बाबू ह ओला एक ठन टिकट दिस अउ कहिस ‘संभाल के रखना। स्टेशन में सब तरफ घूमना पर टिकट किसी को देना नहीं हम लोग शाम को आखरी गाड़ी से वापस जाएंगे। तब तक आफिस में मेरा काम हो जाएगा और मैं वापस आ जाऊंगा।’
बंगाली बाबू रउल आफिस कति चल दिस केंवटिन दाई ह पहिली तो ओइ लंग ठाढ़े-ठाढ़े चारों कती ल देखिस ओकर बर सब कुछ नवा रहिस।
ए छोटे लजाइन के पलेटफार्म म राजिम अउ धमतरी के सवारी मन रोज गाड़ी जगहा ह रद-बद हे। कई जगहा के भितिया कुरिया मन बिन पोताई के करिया-करिया दिखत रहिन। दाई ल ए छोटे गाडी क़े चढ़वैया-उतरवैया मन कमजोरहा लागिन। लगत हे रउल सरकार भी ह अइसनहे मानथे तभे तो ऐती के हालत ह गरूवा कोठा कस हे।
दाई ल दूरिहा ले बडे लाइन के पलेटफार्म ह जगमग चकमक दिखत रहिस। धीरे-धीरे दाई ह ओती गईस। पूरा टेशन भर खमखम ले आदमी च आदमी दिखिन। ओतके आत हें ओतके जात हें। न भीड़ कम होत हे न अवइया-जवइया मन थिरकत हे। मेला-ठेला ले ओपार हावै। सब कती चिहरी परत रहिस। गाड़ी के आवाज, सवारी मन के गोठ बात अउ ठेला वाले मन के अपन समान बेचे बर हांका पारे कस चिल्लाई सब्बे ह मिझरगे रहिस। सबे रउल लाइन म बड़े गाड़ी, सबे पलेटफार्म म सवारी, दुकान अउ सरग निशेनी लोहेच लोहा। लोहा के गाड़ी, लोहा के सरग निशेनी, लोहा के छत, लोह के कुर्सी, अउ एकरे खंबा।
केंवटिन लंग आठ घंटा के समे रहिस। टेशन के महंगा चहा ह ओला नई मिठाइस पंचूहा लगिस। ओकर लाइक खवई जिनिस नई दिखिस। दार, भात, चना, मुर्रा, लाड़ू, कुछु नई मिलिस। सबै पलेटफार्म ल घूमत ओहा टेशन ले बाहिर निकले के दुवारी ल जान डोर रहिस।
डर-बल करके टेशन ले बाहिर निकलिस। हल्ला ले थोड़ अकन शांति मिलिस। बाहिर चउक तीर पहुंचिस तहां आटो, जीप, कार, सबे गाड़ी के शोर होवे लगिस, ऐमन के आवा जाही म सड़क पार करना मुसकल रहिस। ओपार एक ठन होटल के गंजा-गंजी मन दिखिस ओहा समझगे इहां पेट भरे लाइक जिनिस मिल जाही। सड़क नहाक के जइसने होटल दुवारी तीर हबरिस अपन खांधा म पटकू डारे एक झन लइका ह पूछिस ‘आ दाई, दार-भात खाबे।’
‘हाहो बाबू’
(शेष अगले अंक में)


डॉ. सीतेश कुमार द्विवेदी
पानी टंकी के पास,
पारिजात एक्सटेंशन बिलासपुर

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