कहिनी : डोकरा डोकरी : शिवशंकर शुक्‍ल

शिवमंगल शुक्ल। हमर छत्तीसगढी भाखा के विद्वान साहित्यकार हें, इमन छत्तीसगढी के पहिली उपन्यासकार यें । इखर उपन्यास ‘दियना के अंजोर’ अउ ‘मोंगरा’ हा मेकराजाला म उपलब्ध हावय । इखर एक ठन लइका मन बर लिखे गये कहिनी किताब ‘दंमाद बाबू दुलरू’ के एक ठन कहिनी ला हम इहां प्रस्तुत करत हन । कथानक लइका मन के रहस्य परेम के कारन थोरकन चित्र बिचित्र हे कहिनी म कहिनीकार का कहना चाहत हे ये हा रहस्यबाद-छायाबाद के बिसय ये लगथे । आपो मन पढव अउ अपन बिचार हमला देवव । संजीव

एक सहर मा एक डोकरा डोकरी रहय, तेखर एक झन लईका रहय । जब डोकरा डोकरी मन कुछ दिन के गये ले बहुत बेमार परगें । त लइका ह बैद गुनिया बर खोजे ल निकल गे । ओला खोजते खोजत दू झन बैद मिलीन । एक के नाम छैना अउ दूसर के नाम ढेला । तब छैना अउ ढेला हा कहिथे, फेर तैं हमन ला एक कुकरा अउ एक कुकरी देबे । तब लइका हूंकारू भर देथे अउ उमनला अपन घर ले जाथे ।

बैद गुनिया के फूंके फांके ले ओखर दाई ददा अराम होगे । तब लइका ह उमनला एक कुकरा अउ एक कुकरी दीस । तब छैना अउ ढेला ह बिचार करथें कि येला जंगल मा ले जाके भूंज के खाबो कहिके दूनों झन सुनता होगे अउ ओला धर के चल दीन । अब ओमन जंगल मा पहुचिन त ढेला ह छैना ल कहिथे, के हे छैना तैं आगी बर जा अउ मैं पानी बर जाहंव । तैं आगी लानबे त तैं भून अउ मैं पानी लानिहंव त खाबोन पीबोन । अइसे कहिके ढेला ह छैना ला आगी बर भेज दीस । छैना ह आगी लानत लागन खप गे अउ ऐती ढेला ह पानी बर गीस अउ पानी ल जइसनेहे भरथे आइसनेहे वो ह घूर जाथे । ओमन ओही डाहर ले उबर के नइ आवंय । येती वो कुकरा कुकरी के पांच लइका होइस । तब जंगल के जीव मन अपन अपन चारा पानी खोजे बर जंगल मां निकल गे अउ मानुष, बइला रहय ओमन बांचगे । तब बइला रहय वोह अपन गोसइंया मानुष बर एक डउकी खोज के लानिस । ओ डउकी के संग ओखर बिहाव होगे । डउकी बहुत सुघ्घ र रहिस । जब ओमन ओ गांव मा गइन तब उंहा के राजा घर नैकरी लगिन । जब बइला चरे बर जंगल गइस तब जंगल मा एक गोल्लहर संग लडाई होगे । बइला ह ओला मार डारिस । सब पाहट के बइला मन लडिन त सब बइला ला मार के मोटियार बइला आवत रहय । ये बात ला राजा सुनिस ओ बइला ला अपन घर बला के कहिथे, के तैं ये मकाम ला गिरा दे । तब बइला रहय वो ह नद गिरा सकिस अउ अन्त म मर गे । ये बात ला जब मानुष रहय सुन पाइस, तब बो ह बइला के सींग, गोड, सिर, आंखी अउ ओखर हाड ला नवां हडिया मा भरके गाड दिस । एक दिन मानुष के बाल ला बनाये बर नाउ ह आइस । तब नाउ ह ओखर सुघ्घ।र डउकी ल देख के छटपटा के गिर गे अए कहिथे के मैं ह काली ले नई खाये रेहेंव तौन पा के गिर गे हंव, कहि के बहाना बना दीस । अउ ओ हा राजा के महल गइस । नउवां ह राजा ल बताथे के हे राजा, ओ मानुष के डउकी ह बड सुघ्घ र हे, तैं ओला लान के अपन पटरानी बना तभिच्चे बनतिस । जब ये बात ल राजा हा सुनथे तब नाउ ल कहिथे चलबो रे नाउ ओ डउकी ला देखबो कतेक सुघ्घचर हवय । नउवा ह राजा ला ओ डउकी देखाये बर लेगे । ओला देख के राजा के आंखीं ह चौंधिया गे । राजा रहय ओ ह डउकी ला देख के ओखर मन ललचागे अउ डउकी ल लाने बर अपन फउज फटाका ला ओखर घर लान के अडा दिस । तलवार बने रहय अउ आंखी ह अवंरा भंवरा किरा बने रहय । जब सब झन एकसरा होगे तब सब कोनो अपन अपन लइक हथियार ल धर के जोहरा लराई कर दिन अउ राजा ल बांध के मानुष के आघू म ले आनिन । अउ कमइन खइन राज करिन ।

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