कहिनी : बेर्रा टूरा बेर्रा टूरा

सहदेव गुरूजी के ओ दिन इसकूल में पहिली दिन रहीस। ओहा पहिली कक्षा में लइका मन के हाजिरी लेवत रहीस। ओतके बेरा इसकूल में लइका मन गोहार पारे बर धर लीन। ”बेर्रा टूरा बेर्रा टूरा अपन दाई बर जठाथे पैरा” कहीके। गुरूजी कक्छा ले बाहिर निकल के देखीस तव उहां एक झन सोगसोगवान गड़हन के लइका अपन महतारी संग कक्षा के बाहिर खड़े रहीस। गुरूजी हा लइका मन ला दपकार के चुप करइस। लइका हा तो सुसक सुसक के रोवत रहीस। ओकर महतारी के आंखी हा घलो डबडबा गे रहीस। लइका के महतारी कहीस एला चार आखर पढा देतेव गुरूजी तो ये हा कहुं जी-खा लेतीस। ”गांव वाला मन तो एकर पीछू परे हावयं। ओखर मन के बस चलही तो ओमन पथरा मार-मार के एकर जीवे ला ले हीं। एहा गली खोर जिहां जाथे, का लइका का सियान एला ‘बेर्रा टूरा बेर्रा टूरा अपन दाई बर जठाथे पैरा कहीके चिढ़ाथें।’ मोर पाप के सजा ला ए नानकुन लइका ला भोगे बर परथे। कभु कभु तो एला लेके कोनो कुआं, बावली में कूदा देतेंव अइसे मन हो जाथे।” गुरूजी के आघू में नानकुन लइका अउ ओकर महतारी खड़े रहीस शिक्षा के भीख मांगत। गुरूजी ओला कहीस मोर इसकुल में जेन लइका पढ़े बर आथे तेला पढ़ाना मोर धरम आय। मय हां तोरो लइका ला पढ़ाहु ए बचन मय हा तोला देवथव। लइका के महतारी गुरूजी के पांव में अपन मुड़ी ला रख दीस अउ लइका ला गुरूजी के सुपुरद करत हुये कहीस कि आज ले एक लइका के बाप महतारी तो तय आस गुरूजी एला बनावस चाहे एला बिगाड़ा अतका कहीके लइका के महतारी ओला छोड़ के चल दीस।

नानकुन लइका जनमे के पहिली ले सबके दुसमन बन गे रहीस। अपन दाई के पेट में रहीस तो ओला मारे के कोसीस ओकर नानी दाई म करीन। जनमे के बाद तो ओकर दुसमन गांव भर के होगे। गांव वाला मन काहय ‘ये दुनिया में पाप अब्बड़ बाढ़ गेहे तभे तो ये बेर्रा टुरा हा अपन दाई के पेट ले सांगर मोंगर निकल गे हावय। कोनो ला धरम रसातल में जात दीखय तव कोनो कोनो ला गांव भर के माई लोगन मन के बिगड़े के खतरा दीखे बर धर लेवय। मउका पावय तो कोनो नानकुन लइका ला चीमट देवय। तव कोनो-कोनो ओकर कालर ल धर के चीथे बर धर लेवय। कोनो कोनो तो ओला बिना कसूर के दू चार राहपट मार घलो देंवय। ओहा रोवत घर आवय तव ओकर ममा म ओला दू चार राहपट अउ मार देवय। का करतीस बिचारी ओकर महतारी हा ओला पोटार के रोय के सिवाय। एक दिन तो हद होगे। गांव में गोदना गोदवइया म आय रहीन। गांव के दूर चार बदमास टूरा म ओला धर लीन अउ ओकर जउनी हाथ में बेर्रा टूरा कहीके गोदना गोदवा दीन। लइका रोवत रोवत अपन घर अइस। ओकर महतारी हा गांव के सियान मन मेर सिकायत लेके गीस। गांव के सियान मन धृतराष्ट्र होगे। उल्टा ओम हाँस के कहीन ‘बेर्रा टूर्रा के हाथ में बेर्रा टूरा नई लिखही तो का खनदानी सपूत लिखाही। का करतीस बिचारी हा रोवत कलपत अपन घर आगे। ओकर का गलती रहीस? गांव में सरकारी राहत कार्य खुलीस तव गांव वाला मन साहेब ला खुस करेबर ओ बिचारी ला ओकर बर भात रांधे बर राख दे रहीन। साहेब काम खतम कर के चल दीस अउ अपन चिनहा ला ओकर कोख में छोड़ दीस। ओहा गांव वाला मन मेर सिकायत करीस। तव गांव वाला म ओला कहीन तोर सउख रहीस तव तैंहा अपन पेट भरायस एला हम काबर भुगतबो। उल्टा ओ बिचारी के भात पानी गांव वाला मन बंद कर दीन। मजबूरी में ओहा सड़क तीर चाय पानी के होटल खोल के अपन अउ अपन लइका के पेट पोसे बर धर लीस।
एती सहदेव गुरूजी हा ओ लइका बर कापी, किताब, पट्टी, पेंसिल सबो के इंतजाम कर दीस। ओकर संगवारी गुरूजी मन ओकर संग मजाक करय कि अइसे लागथे गुरूजी कि ए लइका के बाप तहीं आस। गांव वाला मन घलो काहय कि गुरूजी तय लइका मन ला पढ़ाय बर आय हावस कि ओ होटल वाले ला पढ़ाय बर आय हावस। कइबे तव ओला तोर बर चुरी पहिरवा देथन।
एती ओ लइका ऊपर सरस्वती माता के बिसेस किरपा रहीस। ओला गुरूजी हा एक बेर जेन पढ़ावय तेन हा ओला रटा जावय। ओकर अक्षर घलो हा मोती के दाना कस बनय। एती ओ लइका कक्षा में अव्वल आय अउ ओती गांव वाला मन के करेजा में आगी लग जाय। गांव वाला मन नेतागिरी कर के गुरूजी के बदली अब्बड़ दुरिहा के इसकूल में करा दीन। जावत बेरा गुरूजी हा लइका ला अपन संग लेगहूं कहीस तव ओकर महतारी मना कर दीस ए कहीके कि एकर गियान के दीया ला तय बार देस गुरूजी अब ओला मय हा नई बुतावन देवव। अपन नवा जगह ले गुरूजी हा ओ लइका बर मनीआर्डर करय तव ओ मनीआर्डर वापसी आ जाय। ये लिखाके कि ए नाम के इहां कोनो नई राहय।
गंजदीन बाद सहदेव गुरूजी रिटायर होगे। ओकर ईमानदारी के इनाम रहीस कि ओकर पास बुक में भोंगटी कौड़ी नई बाचे रहीस। ओहा जेन लइका ला गरीब देखय तव ओकर मदद ओहा अपन तनखा ले कर देवय। तब अइसे में गुरूजी के नोनी के बिहाव कइसे होतीस। गुरू जी जिहां जावय तव ओकर गरीबी ला देख के लड़का वाला मन ओकर संग ढंग के गोठियाय बर घलो न धरयं। ओ बिचारा गुरूजी जिहां जातीस उहां ले ओहा अपमानित होके लहुटय। एक दिन गुरूजी रेल ले उतरत रहीस। तव एक झन पुलिस के बड़े साहब ओकर कोती दउड़त अइस। ओकर पीछू-पीछू दरोगा सिपाही मन घलो दउड़त रहीन। ओ पुलिस वाला साहब हा ओकर गोड़तरी गिरगे। गुरूजी का रेल स्टेशन में जतका आदमी रही सबो अकबकागे। पुलिस वाला साहेब गुरूजी के हाथ के झोला ला धरत हुए कहीस। आपमन मोला नई चिन्हतव का गुरूजी मय किसना आव जेला तुम पहिली कक्षा में पढ़ाय रेहेव। गुरूजी कहीस कोन किसना आस बाबू मोला सुरता नई आवत हे। तब ओ साहब अपन बांह ला उधार के गुरूजी ला देखइस में उही किसना आव गुरूजी बेर्रा टूरा कही के जेला गांव वाला मन सतावयं। अब गुरूजी ला सबो बात सुरता आगे। ओकर नजर में सोगसोगावत लइका अउ डबडबाय आंखी ओकर महतारी दीखगे। गुरूजी कहीस तय कहां चल दे रेहेस रे किसना मय तोला अब्बड़ खोजेंव फेर तोर कोनो पता नई चलीस। किसना गुरूजी ला अपन बंगला लेगे। अउ अपन दाई ला गुरूजी के आय के बात बतइस। ओकर महतारी दउड़त अइस अउ गुरूजी के गोड़ ऊपर अपन मुड़ी ला रख के कहीस गुरूजी तय मोरा बेटा ला मनखे बना देस। नहीं तो गांव वाला मन मोर बेटा ला मार डारतीन। किसना गुरूजी ला बतइस कि गुरूजी के जाय के बाद गांव वाला मन के अत्याचार अब्बड़ बाढ़गे। परेसान होके ओमन ला सहर आय बर परगे। सहर में ओकर महतारी सबके बरतन भड़वा मांज के रेजा के काम करके अपन लइका ला पढ़इस। होस सम्हाले के बाद किसना घलो अखबार बांटके, मुनीमी करके कालेज पढ़ीस। आज ओ पुलिस के डीआईजी बन गे हवय।
पुलिस के डीआईजी ल लड़का खोजिस तव लड़का वाला मन के रेम लगगे। एक झन बने लइका ला देख के गुरूजी अपन नोनी के बिहाव तय करीस। किसना अपन गुरूजी अउ गुरू माता ला सोफा ले उठन नई दीस। भाई बनके गुरूजी के नोनी के डोली ला बिदा करीस।
ये होथे गुरूजी के पूंजी। जे गुरूजी लइका मन ला अपन संतान मान के पढ़ाथे। ओला ओकर सिस्य मन घलो जिंदगी भर सुरता राखे हे इही तो विद्यादान के फल आय।

शशिकुमार शर्मा

तुमगांव, जिला महासमुंद

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