कहिनी : सिद्धू चोर

सब झन एती ओती माल-टाल टमरत राहंय। सिध्दू गोमहा कस ठाढ़े रिहिस। एती ओती झांकिस त देखथे चुल्हा म तसमई चूरत राहय। उही मेर कोठी म पीठ टेकाय डोकरी अउंघात राहय।
सिध्दू गीस, अउ माली म तसमई हेर के खाय धर लीस। थोरिक बेरा म डोकरी ल जमहासी आईस। मुहुं फार के आऽऽऽ करके हथौरी ला मुंहु मेर लेगिस। सिध्दू ओरखिस डोकरी दाई इसारा करत हे मुहुं म तसमई डार।
एक साहर राहय जी, साहर के ओप्पार गांव गोहड़ा राहय जी। कोरई ढेखरा अऊ खदर मसर टेकनी झिपारी के घर कुरिया, छेरी, गोधनी, कुकरी गोड़ा, कुकुर, कोनहा, मऊहा पास बर कोलकी वाला गांव नांव के हे ले बोइर गांव। तरिया, नरवा, कुंआ, बखरी, उत्ती-बुड़ती ए पार ले ओ पार, पीपर अऊ बर वाला गांव। जिहां कुरिया मन ले जादा रूख-राई अऊ मनखे ले जादा गाय-गरू, छेरी-पठरू तसने कोरी खैरखा चिरई-चिरगुन राहय जी। भियां अऊ बादर आकाश दाई-बाप बरोबर राहय। सल्लो केजी ऊंचे हे मरार पारा में एक झन कोंदी डोकरी राहय। भाखा थोरिक घनेघेनहा, बने नी ओरखाय। एको दू बेर तिखारे बिना समझ नी परय। फेर बात मयारू कमेलहिन अऊ जिहां तीही बर ले ले मरय। अपन छै बच्छर के सिदावा अलगोजवा टूरा ला बगोड़ के पेट बियारी निपटात राहय।
टूरा के नांव लल्लू लाल रिहिस हे। ओकर देहे पांव तो टन्नक रहाय। कोनो हुदरंय, नीते मारंय त अलथ-कलथ देवय। फेर काबर मारे कहिके पूछय नहीं। चेत-बूझ थोरिक सोरलो रहिसे पट जोजवा। कोंदी बपरी कंदर गेय रिहिस वो लइका ला चेतावत भुलियारत- ‘बेटा कुछू बुता काम सीख ठेलहउवा, लेड़बेड़हा झिन बन रे! सुरर जाबे कमाबो नीही तो काला खाबे? में आधा शीशी बुढ़िया कतेक दिन ले संग दे हूं?’ देख तो तोर जहुंरिया मन ला।
फेर लल्लू गिा ले हांस देवय नीते आनी-बानी उतलईन करय कभू बेंदरा कस नाचय, कभू उलानबाटी खेलय मूंड के भार खड़ा हो जाय, डंगचेघहा मन कस अऊ कतकोन में छरई देखावय जी। टोटा बोजात ले खावय अऊ जेती-तेती छुछुवारय। कोनों बिजरा देवय ते बिजराय। कहूं मारे-पीटे त अलथ-कलथ देय, फेर काबर मारे हुदरे? कहिके नई पूछय। तेकरे सेती ओला सिधवालाल केहे धर लीन। उही हर सिध्दू होगे। सिध्दूलाल सिध्दलू लल्लू तोर मुड़ी में ढुल्लू-बल्लू कहिके उष्टावंय, हंकरावंय फेर वो तौ घात अनचेतहा अकबका के बोक-बोक देखय। नीते उहू ऊंकरे संग देवय। जमे लइका सियान गदक जावंय।
एक दिन सिध्दू बपरा एलम-ठेलम करत, जंगल कोत रेंग दीस। उहां एक ठक आमा रूख मं चढ़ गीस। लाहालोट आमा फरे राहय। सिध्दूलल्लू थैली भर आम गोंज के रूखे ऊपर बइठे खावत राहय, कचलोइहा आमा ला आधा खावय आघा ल फेंकय। तसने म चार झिक चोर मन उही रूख तरी आके बइठिन अऊ सुन्ता बंधावत राहंय- आज रात कन फलाना-ढेकाना घर चोराबो कहिके उही बेरा थैली के एक ठक आमा गिरगे अऊ एक झिक चोर के मुड़ी ला ठर्रस ले परीस। केंदरा के चोर थथमरागे। तीनों चोर ऊपर कोत देखिन ते सिध्दू बइठे राहय मगन होके आमा खावत। वो हा किहिस- ‘अभी तो एके ठक आमा मारे हों, तुमन चोरहा आव जाके राजा ला बताहूं।’
चोर मन कपसगीन पांव पलेगी करे धर लिन- ‘टार ना बाबू रे हमर करा ले कुछू काहीं ले ले। फेर राजा मेर झिन बहुरबे रे दऊ। तैं तो खुदे राज दुलारा कस दिखथस जी,’ कहिके बने गुरतुरहा सुलहारिन ‘ले बता कतका रुपिया-पइसा, गाहना-गुरिया लेबे?’
‘दाई मोला सरफोकन, दयलाहा कथे। घुसियाथे, कुछू कमास नीही कहिके। अइसे करो महूं ला संघेर लेतेव।’ सिध्दू के बात चोर मन तुरते मान गीन। अधरतिहा एक घर चोराय बर गीन। त सिध्दू कथे- ‘भईया हो मंय तो कभू चोराय नइ हों। कुछू नी जानों अभी जावाथन तिहां काय चोराबो? मुखिया चोर कथे- भारी-भारी जिनिस चोराना हे भई।’ चोर अपन बुध म किहिस माहंगा ले माहंगा, सोन-चांदी जेवर गाहना। ओती सिध्दू समझिस भारी-भारी केहे ले गरू-गरू अऊ उसने जिनिस के चेत करत। संगे-संग चल दीस। चोर मन गाहना-गुरिया के गठरी बनात राहंय, त खोजत-खाजत सिध्दू ला कोन्टा के जांता दिखथे। उठा के देखिस घात गरू राहय, पखरा के ताय। सिध्दू मने मन कुलक गीस वोला लागिस पोट्ठ जिनिस पा गेंव। जांता के ऊपर खांपला तनिया के उठईस। खांघ म बोती के खारे के चांवरा मं मढ़ा दीस। ताहन भीतरी जाके एक मन आगर चोर मन ला बतईस- ‘भइया हो मंय तो घात बरकस जिनिस चोराय हों, जल्द आव, देखव…।’
चोर मन समझिन सिध्दू कहू तिजोरी तो नई पा गीस? उत्ता-धुर्रा चांवरा मेर गीन। उही जांता खाप ला देखके, बउछागीन। सबोझिन ओला पीटिन। त सिध्दू किकियात कथे- ‘तुमन देरचकहा हो, भकलेड़वा कहां के तूही मन तो बताय रेहेव, तइसने करे हौं। अब जावाथंव राजा करा गोहराहूं।’ चोर मन, डर के मारे फिफिया गीन। ओला पोटार के मया देखावत किहिन- ‘अइसन किकियाबे त गांव वाला मन जाग जाहीं रे भई। चल हटा अब भागन इहां ले’ कहिके अउहा-तउहा भागिन। थोरिक दिन म फेर एक घर म चोराय बर गीन। घर म नीगे के पहिली सिध्दू कथे- ‘आघू ले बता देय राहव भई काय-काय चोराना हे तेला…’ मुखिया चोर किहिस- ‘कोनो जिनिस होय चोराय के पहिली बने ठोंक-ठठा के देख लेबे जाने ना…’ ऊंकर केहे के मतलब रिहिस बने गिनहा के परछो कर लेबे। सपटत झांकत पांचों झन जोंगाय घर मं खुसरिन। चोर मन ला खब ले तिजोरी मिलगे। ओमन तारा टोरे के उदीम करीन। तसने म सिध्दू ला खूंटी म टंगाय ढोलकी मिलगे। वोहा गुनिस- ठोंक ठठा के देख लेथौं अऊ दनादन पीटिस। आरो पाके घरगोंसिया मन जाग गीन हाय हुदूर गोहार पारिन दउड़ो रे भई होऽऽऽ चोर खुसेरे हे घर म छेंकव गा, धरव मुसेटवऽऽऽ।
सबे चोर जीव बचाके तिड़ी-बिड़ी कूदत-डांहकत भागिन। अपन ठीहा मेर सकलईन। काकर ओनहा चीराय राहय ते कोनो चिखला सनाय राहय, माड़ी कोहनी छोलाय राहय, ते कोनो कांटा गड़े राहंय। जमो झन सिध्दू ला गुरेरिन। ताहन मुहुं ओथार के सिध्दू किहिस एक तो मुखिया के बताय बुता करथंव तभो ले गुरेरथंव। भइगे टार तुंहर संगत जावाथों राजा सहेब मेर चोर मन फेर थरथरागीन। आनी-बानी कलोली करिन। कान धरके उठ-बइठ करिन अऊ मयारू-दुलरू बरोबर लगार करके किहिन- ‘अब ले जिहां चोराय बर जाबो। तोला कुछू नी करना हे बस तेहां संगे संग रेहे बनही ना?’
सिध्दू बर तो मुंहू भंगा नेत बनगे। ये बखत ओमन एक झिक डोकरी घर चोराय बर खुसरिन। सब झन एती ओती माल-टाल टमरत राहंय सिध्दू गोमहा कस ठाढ़े रिहिय। एती ओती झांकिस त देखथे चुल्हा म तसमई चूरत राहय। उही मेर कोठ म पीठ टेकाय डोकरी ऊंघात राहय। सिध्दू गीस, अऊ माली म तसमई हेर के खाय धर लीस। थोरिक बेरा म डोकरी ल जमहासी आईस मुहुं कार के आऽऽऽ करके हथौरी ला मुंहु मेर लेगिस। सिध्दू ओरखिस डोकरी दाई इसारा करत हे मुहुं म तसमई डार। वोहा करछुल म तातेतात तसमई निकाल के डोकरी के मुंहूं म डार दीस। मुहुं उसना गे। डोकरी ताला बेली होगे,ख् बोम फारके रोईस। किलबिलात घात बोंबियईस। आरो पाके पारा परोसी मन तांय-फांय दौरिन। चारों चोरहा मन घर के चारों कोनहा म सपट गीन। सिध्दू पठउहां म चढ़गे। परोसी मन आके देखिन पूछिन- का होगे तोर मुहुं म तसमई कोन डारिस?
डोकरी कल्थत सुसुवात किहिस- ‘मोला कुछू गम नइहे वो ऊपर वाला जाने मोर तो मुहुं पलपला गे। आगी लगे ऊपर वाला ला हाय दई डोकरी कलपे धर लिस। सिध्दू सोचथे डोकरी घेरी बेरी मोर हिन्ता करत हे। मंय तो अलपाढुल हंव अऊ मुहिंच ला दोस देवत हे- खिसिया के बोहर कथे- ‘मुहिंच ला किथस डोकरी गतर, ओदे चारों कोन्हा म लुकाय हंवय, ते मन ला नी काहस?’ सुनके परोसी मन पठउहां ले सिध्दू ला अऊ चारों कोन्हा ले चारों चोरहा ला धर डारिन। कुटकुट्टा बजेड़िन। कांखत कोंघरत माफी मांगिन, अब कभू नई चोरावन। बनी भूती करबो ये चोरहा धंधा बने नोहय आज ले थूक के छोड़त हन सुग्घर कमाबो खाबो ददा हो। किरिया खवा के छोड़िन ताहन साबो रनपट्टा भागिन। रद्दा भर सिध्दू ला गुरू कस मानगुन दीन। तोरे खातिर ये चोरहा-धंधा टूटिस आज ले सुल मढ़ा के गांव जगाबो, नीत रद्दा म जाबो सिध्दू राजा तोर जय जय होय। ताहन बने सुलगढ़न जीइन खर्इा। फूल फूले छेकती मोर कहिनी एकती।
किसान दीवान

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