कातिक

पहला सरग:- उमा के जनम
भारत के गंगाहू मा, हे हिमालय पहार।
जे हे उड़ती बूड़ती, धरती के रखवार।।
धरती ल बनाइन गाय, पीला बन गिरिराज।
मेरू ला ग्वाला बना, पिरथू दूहिस आज।।
हिमालय रतन के खान, हावय सेता बरफ।
महादेव के गला मा, सोभा पाथे सरफ।।
हिमालय के चोटी मा, हे रंग बिरंग चट्टान।
बादर छांय सुघर लाल, परी सम्हरे पहान।।
पहरी चोटी बड़ उपर, मेघ नी सके जाय।
साधु पानी ले घबरा, चोटी मा चढ़ जांय।।
शेर मारथे हाथी ला, परथे रकत निसान।
बरफ मा लहू मिटाथे, गजमोती मा जान।।
हाथी के सोंड़ साही, मिलत हे भोजपतर।
पढ़ोइया लिखे जेमा, आपन परेमपतर।।
हवा भरे बाजत रथे, पोंडा पोंडा बांस।
किननर ओकर संग गा, मनाथे ओमन रास।।
गज कनपटी खुजियाथे, देवदार के रूख।
ओकर दूध के कहरे, अड़बड़ मिलत हे सुख।।
बड़ मिलथे जरी बूटी, चमके जेहर रात।
गुफा मा मयारू करा, बिहार करे किरात।।
बरफ मा रेंगथे टूरी, अंगठी जाथे अइठ।
चूतर अउ दूद बोझा, ओहर जाथे बइठ।।
लंबी गुफामन मा घलो, दिन रइथे अंधियार।
हिमालय देइथे शरण, ओहर हवय उदार।।
चंवरी हिरनी होत जादा, पूछी बनथे चंवर।
एती ओती डोलात, चंदा साही संवर।।
गोरी गुफा के भीतर, मयारू खेल सादर।
हिठथे सरीर के बस्तर, लाज मिटाथे बादर।।
गंगा झरना के फुहार, कंपाथे देवदार।
किरात मिटाथे थकान, मंद शीतल बयार।।
सातरिसी टोड़े कमल, उंच चोटी के ताल।
सूरजदे के उए मा, कमल फूले कमाल।।
पिथवी सम्हाले के बल, मिले पूजन समान।
जग मा बिधना दिस भाग, परवत स्वामी मान।।
हिमालय सुमेरु मितान, अपन मरजाद जान।
पितरतन जनमे कइना , मैना बनीस जान।।
दूनों के होइस बिहा, करीन भोग बिलास।
हांसि बकबकात मैना, धरिस हे गरभवास।।
मैना के पहिली पुतर, मैनाक हो जवान।
नागकइना ल बिहाइस, सागर बना मितान।।
कइना सती आघु जनम, ओ जग मा समाइस।
सती मैना कोख अइस, नांव ला बगराइस।।
सती मैना कोख अइस, कइना ल जनमाइस।
मैनाक के बहिनी बन, अबड़ नांव कमाइस।।
कइना के जनम होइस, सफ्फा रिहिस अगास।
संख बजा फूल बरसात, देवता मना रास।।
बादर के गरजना मा, सूली आथे रतन।
कइना कोरा मा पाके, चमकिस मैना बदन।।
चंदाकला सही बाढ़े, हे पारबती नांव।
अंग अंग जगमग जोत, सुगघर ओकर पांव।।
पारबती सबो पियारी, करे बर लागिस तप।
उ मा हे नीही हे नह, मैना कहे झप झप।।
बसंत मा फूलथे फूल, मौर मंडराय भंवर।
पारबती मा अटकथे, हिमराजा के नजर।।
तेज लौ पाके दीया, गंगा पाके सरग।
बियाकरन पाके मनइ, कइना पा सुघर जग।।
कभू बनाय घरबुन्दिया, खेल गिंया सो पोंक।
कभू सजाय गुडि़या ला, नानू काहांॅ सोक।।
पारबती पढ़े लागिस, पहिली गियान भांड़।
तुरत हो जाए सूरता, हंस गंगा आय जाड़।।
जोवना सिरतो सिंगार, मदिरा बिन मतवार।
बिना फूल मारे बान, कामदे कर संचार।।
सूरज मा फूले कमल, रंग ला भरिहा चितर।
पारबती नवाजोवन, लागे अबड़ सुगघर।।
पांव के अंगठी के नख, देय ललाई उगल।
जिहां जिहां राखे पांव, जागथे उहां कमल।।
बिछियामन के रुनझून, राजहंस के चाल।
नवाजोवन के बोझा, करे बड़खा कमाल।।
बिधाता बनाइस जांॅघ, माटी होगिस खतम।
अउ अंग ला सुगघर बना, दुख उठाइस बड़तम।।
जांॅघ के उपमा आधा, केरारुख गजसूड़।
केरारुख हावय ठंढा, कड़ा हवय गजसूड़।।
चूतर हावय बड़ सुघर, कोरा राखे शंकर।
नारी के हावय साध, कोन्हो नी पाय हर।।
नाड़ा उपर गहिर नाभि, पातर रेखा बाल।
करधन के नीलम चमक, होइस जी जंजाल।।
पेट तीन चिरमोटाय, कन्हिया हवय पातर।
जोवन बनाय मिसेनी, काम चढ़े सुपातर।।
कमलनयना पारबती, नी समाय मिरनाल।
कारी चूं पड़री दूद, बाढ़ हे अनसंभाल।।
सिरिस फूल ले हे नरम, ओकर दूनों बांॅह।
काम गिस शिव करा हार, हार बनाइस बांॅह।।
गोल गला मा ओरमे, मोतीमन के हार।
गला के छबि बढ़ा हार, गला बढ़ाय हार।।
पारबती के मुंहू क,े चंदा कमल के गुन।
दिन रात नी मिले मजा, लछमी गोठ ला सुन।।
लाली होंठ मुचमुचई, अतका लागय सुघर।
नावा पाना मा फूल, मूंगा म मोती जर।।
बानी हवय अबड़ मीठ, बहाय अमरित धार।
कोयल के कूक कड़वी, अनारी छेड़ तार।।
बड़खा बड़खा नयन के, हावय चंचल चितवन।
हिरन ओकर सो सीखिस, ओहर सीखिस हिरन।।
टेपरा हावय लामा, अतका हावय सुघर।
कामदेव के धनुस हर, नी सकथे ओ ठहर।।
बाल के नीए मिसाल, अड़बड़ सुगघर जाल।
चैंरी हिरनी लजाथे, देख के चमक बाल।।
अइन मनमौजी नारद, देखिन ओकर हाथ।
अघोर तप अउ मया ले, मिलही शिवजी साथ।।
मं़तर ले देत हन हवन, ओला पाथे आग।
महादेव हावय इहां, पारबती के भाग।।
महादे मांगे कइना, हिमालय उचित जान।
अपन कति ले जाना नी, संका हवय अपमान।।

शिव के नारी सती हर, सरीर दीस तियाग।
ओइ बेरा ले हावय, महादेव बैराग।।
शिवजी करत हावय तप, बाघाम्बर ला पहन।
गंगा छींचे देवदार, गात हे गंधरव गन।।
शिवजी के समाधि लीन, रक्छा करे सबो गन।
माला पहिने भोजपतर, चट्टान बजे ठनाठन।।
शिवजी के सवारी नंदी, बइठे ओकर तीर।
सेर साही दहाड़थे, सीना जाथे चीर।।
तप के फल देवोइया, खुद करत हावय तप।
का पाय ओकर चाहत, जो करत हावय तप।।
शिवजी के पूजा करे, सरग सबो देवमन।
हिमालय आपन बेटी, करीन हवय अरपन।।
तप मा बाधा पहुंचही, तभू करीन गरहन।
महान ला कछु नी होय, सांप लपेटे चंदन।।
पारबती करथे काम, नी करथे आराम।
चंदा के ठंढा किरन हर, हरथे थकान काम।।

सीताराम पटेल

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