केसरिया रंग मत मारो कान्हा

छत्तीसगढ़ के प्रयागधाम राजिम म भगवान राजीवलोचन संग होली खेले के जुन्ना परम्परा हे। घुलैण्डी के दिन जब राजीवलोचन के पट खुलथे तब रूप रंग अलगेच नजर आथे। श्रध्दालु बिहंचे ले मंदिर परिसर में नंगाड़ा बाजा में बिधुन होके नाचथें। दू बजे के बाद भोग प्रसादी लगाथें। ऐ बेरा देस परदेस के जम्मो भगत मन भगवान राजीव लोचन संग होली खेले बर पहुंचथे।
हमर संस्कृति म होली तिहार ल बढ़ सुग्घर ढंग ले मनाय के परम्परा हाबे। चारों डाहन बगरे मया सकलाय असन दिखथे। बैरी के बैर भुला जथे त दूरिहा के सगा सोदर तक लकठा में आ जथे। जम्मो तिहार म होली अइसन आय कि येकर रंग म लइका, सियान संग माई लोगन मन तक रंग म रंगे रहिथें। जौन ह मिलजुल के एकता के संग रहे के पाठ पढ़ाथे। रंग-गुलाल, अबीर, चंदन के लेपन देह म उमंग अउ ताजगी भर देथे। फेर भांग के मस्ती घलो देखे के लइक रहिथे। कुल मिला के उल्लास अउ संघरा रहे के सांस्कृतिक वातावरण जेती देखबे तेती बगरे रहिथे। कोन्हों भी परब तिहार पौराणिक घटना क्रम ल उधारथे। एक बेरा के गोठ आय दैत्यराज हिरण्यकश्यप के लईका प्रहलाद नान्हेपन ले भगवान विष्णु के भगत रिहिस। हिरण्यकश्यप कठिन तपस्या करके बरम्हा जी कर अमर होय के वरदान मांगिस। सुन के परगट देवता ह अचरज रहिगे, तब बरम्हा जी ह कोन्हों दूसर बरदान मांगे बर कहिस। घातेच सोच-विचार के बाद दिन में न रात में, न धरती में न आगास में, अस्त्र से न शस्त्र से, भीतरी में न बाहिर पार, मनखे से न पशु से देव न दानव से कभू मत मरव कहिके बरदान पा लिस। अउ इंद्रासन मं अधिकार करके अपन आप ल अजेय घोषित कर डारिस। भगवान विष्णु ल अपन सगे भाई हिरण्याक्ष ल मारे हे कहिके बैरी समझे। एक दिन बेटा प्रहलाद ल ओकर सिक्छा बर पूछिस त वोहा श्री हरि के भक्त ल श्रेष्ठ बतायिस। अतका गोठ ल सुनिस त पिता हिरण्यकश्यप ह तमतमा गे बड़ ग़ुस्सा करे लागिस। बेटा ल जान से मारे बर सोच डरिस। ओला मारे बर नाना परकार के उदिम करिस। कथे जेकर संग भगवान हे वोला नानचुन खराेंच तको नई आय, हर घांव बाच जाय। तब कउवाके अपन बहिनी होलिका ल तियारिस कि तेंहा प्रहलाद ल धरके जला डार। काबर कि तोला वरदान मिले हे। फेर प्रहलाद के जलाय के चक्कर म होलिका खुद जलगे। सिरतोन आय सच के आगू गलत ह जादा बेर ले टिक नई पाय। प्रहलाद सकुशल जीवित बांच गे। तब ले लईका लोग के सुरक्छा खातिर होलिका दहन के परम्परा प्रचलन में अइस।
जइसन ढंग ले बरसाना के लठमार होली ाम्मो मुलुक म छाय हाबे, वोइसने छत्तीसगढ़ के प्रयाग धाम राजिम म भगवान राजीव लोचन संग होली खेले के जुन्ना परम्परा हे। घुलैण्डी के दिन जब राजीव लोचन के पट खुलथे तब रूप रंग अलगेच नजर आथे। सरदधालु बिहंचे ले मंदिर परिसर में नंगाड़ा बाजा में बिधुन होके नाचथें। दू बजे के बाद भोग प्रसादी लगाथें। ऐ बेरा देस परदेस के जम्मो भगत मन भगवान राजीव लोचन संग होली खेले बर पहुंचथे।
छत्तीसगढ़ म तको बसंत पंचमी के दिन होलिका दाड़ में अरण्डी के लकड़ी गड़ा के तिहार के शुरूआत करथे। फेर होलाष्टक के बादेच तिहार के रंग चढ़थे। नगाड़ा के थाप अऊ लोगीत के सुग्घर धुन उमंग भर देथे। कोन्हों भी गीत के सुरू म दोहा कहे जाथे। पंक्ति देखव-
दोहा – राधा तू बड़ी भागिनी, कठिन तपस्या कीन्ह।
तीन लोक के नाथ को, अपने बस कर लीन्ह।
बोलो जय-जय राजीव लोचन की जय
सुमरनी गीत
प्रथम चरण गणपति को, प्रथम चरण गणपति को
गणपति को मनाऊं, गणपति को मनाऊं
प्रथम चरण…
काकर पुत्र गणपति भयो, काकर राजाराम
काकर पुत्र भैरव भयो काकर हनुमान
गौर के पुत्र गणपति भयो, कौशिल्या के राम
कालिका के पुत्र भैरव भयो, अंजनी के हनुमान
प्रथम चरण…
अइसने अब्बड़ अकन गीत मस्ती, विरह अऊ मनखे के लोक जीवन की गाथा फाग गीत म गाय जाथे।
हमर संस्कृति म डंडा गीत अउ राहस नाचा के बढ़ मायने हाबे। डंडा गीत नाचा ल जवान डोकरा बाबू पीला मन घातेच गा-गा के नाचथे। गली-मुहल्ले म झूल-झूल के प्रस्तुति देखे-
नवरंगी सुवा दू नैना लड़ा के उड भागे
उड़ सुवाना घुटवा म बइठे
घुटवा के रस ल ले भागे
नवरंगी सुवा…
अच्छा उड़ सुवाना माड़ी म बइठे
उड़ सुवाना कनिहा म बइठे
कनिहा के रस ल ले भागे
नवरंगी सुवा…
राहस नाचा म तो मंडली के कलाकार नाना उदिम ले उन्हा पहिरे कोन्हों राधा, कृष्ण सखियाप संग ग्वाल बाल के वेषभूषा म नीक लागथे। नाचा करथे त कृष्ण गोपी के रास लीला के सुरता देवा देथे-
केसरिया रंग भरी मत मारो कान्हा
सखी री मय ठाडे बीच गलियन में
कौन के हाथ म रंगे कटोरा
कौने के हाथ म पिचकारी
राधा के हाथ म रंगे कटोरा
मोहन के हाथ म पिचकारी
सखरी री..1
होली जलाय के बाद लोगन मन धुर्रा माटी तको खेलथे। अइसन गांव म जादा देखे बर मिलथे। शहर म तो रंग गुलाल खासकर खेलथे। होलिका म छेना अऊ लकड़ी डाल के लोगन मन एकता के परिचय देथे कि सबो साथ-साथ हन। इही रकम ले होली के खुशी म डूब जथे।
संतोष कुमार सोनकर मंडल
चौबेबांधा (राजिम)

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