कोनो ल झन मिलै गरीबी, लइका कोरी कोरी : रघुबीर अग्रवाल ‘पथिक’ के गीत





निचट शराबी अऊ जुवांड़ी, बाप रहै झन भाई।
रहै कभू झन कलकलहिन, चंडालिन ककरो दाई॥
मुड्ड़ी फूटगे वो कुटुम्ब के, उल्टा होगे खरिया।
बेटा जेकर चोर लफंगा, भाई हर झंझटिया॥
छानी के खपरा नई बाचै, वोकर घर के ठउका।
निपट अलाल, शराबी होगे, जेकर घर के डउका॥
ओकर घर मं दया मया अऊ, सुमत कहां ले आवै।
जेकर बहू बिहिनिया संझा, झगरा रोज मचावै॥
अइसन मिलय दमाद न जे, हाथी के माई भइंसा।
परम लोभिया, अपरिध्दा, मांगय बिहाव बर पइसा॥
मिले न मक्खीचूस ससुर, जे धन पाके इतरावै।
सास मिलय झन अइसे जे, बेटी के धन ल खावै॥
झन मिलतिस अपरिध्दा साढू, सक्की मन के खोटा।
भइंसा जइसे अक्कल वाले, बिन पेंदी के लोटा॥
अइसन मिले मितान, न जेहर मन के भीतर करिया।
नियतखोर, मतलबिया सुक्खा, लद्दी वाले तरिया॥
कोनो डाका डालैं झन, अउ करैं न कोनो चोरी।
कोनो ल झन मिले गरीबी, लइका कोरी कोरी॥
नेता अइसन मिलै कभू झन, जेकर रंग चितकबरा।
चुहकय लहू देश के अब्बड़, बोली में मिठलबरा॥
चुगलखोर झन मिलैं परौसी, गर कटरा व्यापारी।
अइसन मिलय गिराहिक झन, जे मांगय रोज उधारी॥
मिलै न टिवशनखोर गुरु, जे कक्षा में अउंधावै।
चेला मन झन बात बात मं, मोटर रेल जलावैं॥
अपन अपन मरजाद छोडके, मनखे जब इतराही।
तुहीं विचारों हमर देश हर, कौन दिशा में जाही॥
बंधे रहे मनावे मन, मनसे के दुलार मं भाई।
घर समाज अउ देश घलो के, करते रहै भलाई॥

रघुबीर अग्रवाल ‘पथिक’
शिक्षक नगर, दुर्ग






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