खजरी असनान – गुड़ी के गोठ

असनान तो वइसे कई किसम के होथे जइसे घुरघुरहा असनान, पानी छींचे असनान, साबुन असनान, झुक्खा असनान, गंगा असनान, शाही असनान, कुंभ असनान, चिभोरा असनान फेर अब ए सबले अलग हट के एक नावा असनान घलोक हमर इहां संचरगे हे, जेकर नांव हे- खजरी असनान। खजरी असनान बड़ा अलकरहा प्रजाति के होथे। ए असनान म अइसे होथे के जे मनखे ह बने पानी म चिभोरा मार के नहाथे, वोला खजर-खजर वाले खजरी ह बने कबिया के धर लेथे। तहांले मनखे वोला छोड़ाय खातिर चारों मुड़ा ले खजर-खजर खजुवात रहिथे। एकरे सेती अइसन किसम के असनान ल खजरी असनान कहे जाथे। 
कोनो भुक्त भोगी मन बताथें के ये खजरी असनान घलो दू किसम के होथे। पहला होथे सामान्य खजरी असनान अउ दूसर होथे मुख्य खजरी असनान। एला हमन शाही खजरी असनान घलोक कहि सकथन। ये हर बड़े-बड़े मेला-मड़ई या कुंभ आदि म असनान करे ले होथे। एकरे सेती एला मुख्य खजरी असनान या शाही खजरी असनान कहे जाथे। जे मनला खजरी असनान के सेवाद लेना हे, वोमन ल अइसन किसम के तरिया-ढोंडग़ा या नाली-गटर के शरण म जाना चाही जिहां के पानी बने गदगद ले गढ़ा जाय रहिथे, काई मन ह लसलसा के उफल जाय रहिथे। अइसन तरिया-ढोंडग़ा के पानी म चिभोरा मार के नहाए म अवस करके खजरी होथे। फेर अइसन खजरी ल सामान्य खजरी के श्रेणी म रखे जाथे। काबर ते अइसन खजरी ह बने देंह-पांव म गदगद ले तेल चुपर देय म एकाद घंटा म कम होवत-होवत मिटा जाथे। एकरे सेती एला सामान्य खजरी असनान कहे जाथे। 
आवौ अब जानीन मुख्य या शाही खजरी असनान के बारे म। ए ह बड़का मड़ई-मेला या कुंभ आदि म सकलाय लोगन ल जादा करके होथे। जे मनला ये शाही खजरी असनान के सेवाद लेना होय, वो अभी राजिम म चलत कुंभ मेला म जाके एकर सेवाद ले सकथे। काबर ते इहां के अभी नहवई ह शाही खजरी असनान के श्रेणी में आथे। एकर असल कारन ये हे के महानदी, पैरी अउ सोंढुर जइसे तीन बड़का नंदिया के संगम म घलोक कोनो ल बोर चिभोर के मारे के पुरती पानी नइए एकरे सेती बांधा के पानी ल ढील के इहां के रेती म बनाय गे तरिया बानी के डबरा मन म कनिहा अतका पानी सकेले गे हे। अब आपमन खुदे सोचव के डबरा कस कनिहा भर के सकलाय पान म लाखों लोगन जब नहाहीं, उही म जम्मे किसम के क्रिया मनला सम्पन्न करहीं त वोकर गति कइसन ढंग के होही? हरिद्वार आदि के कुंभ के बात आने हवय काबर ते उहां के नदियाके पानी ह चौबीसों घंटा बोहवत हावय एकरे सेती लोगन के नहाय-धोय ले होय गंदगी ह बोहावत पानी संग आगू बढ़ जाथे, तेकर सेती उहां खजरी-उजरी के खतरा नइ राहय। फेर राजिम म अइसन नइहे। इहां के पानी ह डबरा कस पानी एके जगा स्थिर हे, तेकर सेती गंदगी ह बोहाय के बदला एके जगा सकलावत जात हे। एमा आम आदमी मन के नहाए म तो जादा गंदगी नइ होवय, फेर अपन देंह म राख चुपरे साधु मनके मारे एकर दुरदशा देखते बनथे। 
बीते बछर के राजिम कुंभ म जे मन शाही खजरी असनान करे रिहिन हें, ते मन ला जा के पूछे लेवौ। ए बछर वोमन भोरहा म घलोक उहां नहाए के हिम्मत नइ करयं। उन बताथें के इहां के पानी म नहाने वाला मनला कई किसम के चर्म रोग होगे रिहीसे। सरकार ह छत्तीसगढ़ के मेला-मड़ई के संस्कृति ल बदल के कुंभ के नांव दे दिए हे, फेर वो सोचय के उहां लोगन के बाढ़त भीड़ अउ कम होवत सुविधा के सेती जेन शाही खजरी असनान होवत हे, तेकर लोगन ल कइसे बचाए जा सकेथ। का उहां नहाए ले लोगन सरग के रस्ता पाही ते नरक के दलदला म बूड़ जाही?

सुशील भोले
सहायक संपादक – इतवारी अखबार

41191, डॉ. बघेल गली
संजय नगर, टिकरापारा, रायपुर

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