खेत के मेड़




पूनाराम अपन 10 बच्छर के बेटी मोनिका ल फटफटी म बैईठार के भेलाई ले अपन पुरखौती गांव भुसरेंगा छट्ठी म लेजत रहीस।भुसरेंगा गांव पक्की सड़क ले एक कोस म जेवनी बाजू हावय।नहर के पार के खाल्हे म मुरुम के सड़क बने हे जौन ह अब डामर वाला पक्की सड़क बनईया हे। तीरे तीर गिट्टी के कुढ़ा माढ़े हे। दुनो बाप बेटी गोठियात फटफटी म बैइठ के जावत हे। पूनाराम अपन नानपन म बिताय दिन ल सुरता कर-करके नोनी ल बतावत हे।येदे गौटिया के खेत आय, येदे पटइल के, ये दाऊ के खेत आय।राहेर बोंवाय हावय ते मेंड़ के पीछू म हमर मंझला कका के खेत हावय। मोनिका घलाव कभू नाहर के पानी ल देखय त कभू खेत म बोंवाय धान के हरियर हरियर पेंड़ ल अऊ अड़बड़ खुस हो जाय।वोकर जनम ह भेलाईच म होय हे, पहिली घांव गांव आवत हे। बेलौदी ले एक कोस जावत ले बहुत कन गोठ बात होवत होवत लईका ह ऊदुपहा पूनाराम ल पूछ परीस – बाबू ! ये मेंड़ काय होथे अऊ काबर बनाय जाथे। उदूप ले पूछे लईका के सवाल ले पूनाराम अकबका गे। तुरते ताही कहीं नई सुझीस त कही दिस कि अपन अपन खेत ल चिन्हे जाने बर मेंड़ बनाय जाथे।फेर ओकर मन म ऐ बात रहिगे। छट्ठी के परोगराम ल निपटा के रतिहा नौबज्जी अपन घर अमरगे। बिन खाय खटिया म चल दीस। खटिया म ढलंगीस त फेर ऊही बात घूमे लगीस कि खेत म मेंड़ काबर बनाय जाथय।भुईंया ल बिन मेड़ के बऊरे जा सकत हे। ढलंगे ढलंगे बिचार करिस कि मेड़ बनाके अपन खेत के चिन्हारी ल करथन फेर मेड़ ह पानी भरे अऊ रोके बर बनथे।रद्दा रेंगे बर बनथे।




एक कथा म साधु के बताय दिस्टांत ह सुरता आईस। हमर काया ह खेत आय, अऊ मेंड़ माने मरयादा। अईसे सरीर घलाव खेत आय जेमा काम, क्रोध, लोभ, मोह के नीदा जागे रथे।ऐला उखाड़ना जरुरी हावय। सरीर रुप खेत म घलाव मेंड़ बनाय के जरवत हावय।मेंड़ माने हद, हक अऊ सीमा।परवार के बड़े ल अपन संस्कार अऊ परंपरा ल आगू चलायबर, बेवहार, आचार बिचार, के मेंड़ बनाना चाही। खेत म मेड़ नई रहे ले न ओकर पानी रुकय न फसल होय, उसने घर परवार म नियम नीतके मेड़पार नई रहेले परिवार के मान मरयादा बोहा जाथे।एकर सेती लोग लईका बर मेड़ बनाय रहना चाही। *रामचरित मानस म तुलसीदास* ह अरण्यकांड म बताय हे कि सीता ह लखन ल राम के तीर भेजत रहीस त लखन ह डांड़ खींच के मेड़ बना दिस।अऊ कहिस के ऐला फोर के बाहिर झन निकलबे। फेर ओ मेड़ ल फोरे के पाछू काय होईस तौन सब जानथव। अइसने लोग लइका मन बर ,बाढ़े बेटा बेटी मनबर, खाय -पिये, पहिरे-ओढ़े , बड़े छोटे संग गोठियाय बताय के मेड़ पार बनावव। बिना मेड़ के अपन खेत के चिन्हारी नई हे लोग लइका सुछंद हो जाथे।वइसने बिना संस्कार के हमर जात ,धरम, राज्य अऊ देस के चिन्हारी नई होही। फेर अरोसी परोसी म अइसने कतको हावय जौन दूसर के मेड़ ल फोरइया हे। अपन मेड़ के हियाव करना चाहिये।कहे जाथे- *जौन नई करही रखवारी, ओकर ऊजरही कोला बारी*।आज बेपारी, करमचारी, सरकार अऊ अधकारी जम्मोझन ल छोटे, मंझोलन अपन अपन खेत के मेड़ बनाय बर परही।आज हमर इस्कूल म गुरुजी मन अनुसासन के मेड़ बनावत रहीस, जौन सरकारी चोचला म फंसगे अऊ आरटीआई के अजगर ह लील दिस। बेपारी ल अपन बेपार के , करमचारी ल अपन कामबुता के, राजनीति करइया ल अपन पाल्टी के मेड़ बनाय बर परही नहीं ते भ्रस्टाचार रुप रावन अऊ आलसी रुप कुम्भकरन हमर ऊपर अइताचार करही। संस्कार, संस्कृति रुप सीता ल हर लेही।

हीरालाल गुरुजी” समय”
छुरा, जिला- गरियाबंद


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