गणपति : जयकरी छंद

आव गजानन हमरो – द्वार, पहिराहौं गज मुक्ता हार
बुद्धि संग हे रूप अपार, रिद्धि सिद्धि के रंग हजार।

गणपति उवाच
मोर भक्त पावै – वरदान, गम्मत ला पूजा झन मान
मोला देख बने पहिचान, झन होवौ भैया हलकान।

जा नानुक ढेला ले आन, थोरिक पानी ले के सान
शकुन बना गणेश भगवान,देदे आसन पीपर पान।

शकुन खवा दे मनसा – भोग,आडंबर के तज दे रोग
जुर जाथे जी जस के जोग,बड़े बिहिनिया होथे योग।

हल्ला गुल्ला के काम, देख तोर मन मा घन- श्याम
माँदर ढोलक छोड़ तमाम, मनमंदिर मा मिलथे राम।

गली मुहल्ला ला झन घेर, डहर चलैया ला झन पेर
मोदक खा मुसका ए मेर, पौर साल आहौ गा फेर ।

देख विदा कर दे चुपचाप,घर मा करौ विसर्जन आप
जयजय जयकारा के जाप,देखौ सुनौआज पदचाप।

जावत नइ अँव रखबे ध्यान, तोरे मन मा हावौं मान
भूख भाव के हावै जान, मोला मानौ अपन मितान।

शकुन्तला शर्मा
भिलाई, छत्तीसगढ़


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