गदहा मन के मांग

एक दिन गदहा मन के गांव म मंझनिहां बेरा हांका परिस- गुडी म बलाव हे हो- ढेंचू , जल्दी जल्दी सकलावत जाव हो ढेचू। सुनके गांव के जम्मो गदहा गुडी म सकलागे, कोतवाल गदहा ल पूछेगिस- कोन ह मईझनी-मंझनिहा बईठका बलाय हे ? तब एकझन सियान गदहा ह बोलिस-में ह बलायहंव ग बईठका ल, बात ये हे के आज बिहनिया बेरा जब में ह ईस्कूल कोती चरेबर गेरहेंव, त ईस्कुल के खिडखी ह खुल्ला रहिस हे,ओती ले अवाज आवत रहिसहे जेमा- बडे गुरूजी ह छोटे गुरूजी मन ल खिसियावत काहत रहिसहे के कोन्हों लईका ल अब भूल के भी गदहा नई कहना हे यदि कोनो गदहा कहेव त तुमन ल जेल जाय ल पड जही, अतका ल सुनके में ह गुनेव – आज मोटर-गाडी के जमाना म हमर काम-बूता ह तो नंदा गेहे कोन्होकाल के ईस्कुल म हमर नाव ह चलत हे तेनो ह नंदा जही तईसे लागथे, अईसन म तो हमर कोन्हों जघा पुछारी नई रईही। अतका ल सुनके ऊंहां बईठे जवान गदहा मन तमतमागे, अउ बडे गुरूजी ल फलान-ढेकान कहेबर सुरू करदिस, तब सरपंच गदहा ह सब झन ल चुप करावत कहिस के अरे छोकरा हो थोरकन धीरज धरव न जी, पहिली बडे गुरूजी ल इंहा बला के पूछ तो लव, वो ह अईसन काबर कहिस तेला। तब जवान गदहा मन खुरचत- खुरचत चुप होगे अब कोतवाल गदहा ल बोलेगिस के जा बडे गुरूजी ल बला के लाबे, कोतवाल ह बडे गुरूजी ल बलायबर चल दिस।
एती जम्मो गदहामन आपस म बिचार करके निरनय लिन के ये मनखेमन के मनमानी ह मुडी ले उप्पर नहांकतहे, अब कुछ न कुछ जतन करेच्चबर परही, सबोझन हव कहिके एकमत होगे। ओतकेबेर कोतवाल संग बडे गुरूजी ह बईठका म पहुंचगे, जवान गदहामन बडे गुरूजी ल देख के आंखी ल तरेरेबर लगिन, गुरूजी घलो सकपकागे, सोंचेबर धर लिस के का बात होगे… तभे सरपंच गदहा ह बडे गुरूजी ल जय जोहार करिस अउ पीपरतरी चउरा म बइठारिस, अब सब्बेझन चूप होगे, भई गुरूजी आखिर गुरूजी होथे ओखर आघू म बडे बडे के मुंह सीला जथे, देख-ताक के गोठियाय ल परथे, ये दसा ल समझ के बडे गुरूजी ह कहिस- का बात हे सरपंच जी, कटकट ले जुरियाय हव जी अउ मोला काबर बलवायहव ग । तब सरपंच गदहा ह हिम्मत ल बटोर के जम्मो बात ल गुरूजी ल बतईस अउ पूछिस के आपमन काबर छोटे गुरूजी मन ल बरजत रहेव के कोन्हों लईका ल भूल के भी गदहा नई कहना हे कहिके।बडे गुरूजी ह समझगे के जवान गदहामन काबर वोला गुर्री गुर्री देखत हाबय, अउ कहिस के आर. टी. ई. आगे हे सरपंच जी।सरपंच गदहा कथे आंय… आर. टी. ई.,ये काय बला ये गुरूजी। कोन्हों गदहा समझ नई पईन, तब सरपंच गदहा ह पूछथे ये आर. टी. ई. ह का हरे गुरूजी, बने फोर के बतावव। बडे गुरूजी ह समझावत कहिस – ये ह हमर देस के नवा कान्हून हरे जी, जे ह कहिथे- हमर देस के जम्मो लईका ल बिना खरचा के आठवी तक पढे के अधिकार हे, अउ ये पढई म कोन्हों लईका ल मारना पीटना नई हे, गारी गल्ला तको नई देना हे, कुकूर-बिलई-बेंदरा अउ गदहा घलो नई कहना हे, यदि कोन्हों कईही त कान्हून ह ओखर बूता बना दीही, उही बात ल मे ह छोटे गुरूजी मन ल बतावत रहेंव जी जेला तूंहर सियान गदहा ह सुन डरिस, अब तूहीमन बताव, मे ह का गलत कहेंव। अतका ल सुनके पूरा बईठका म बिरबिट ले सांति झपागे।थोरकन देर म सरपंच गदहा ह कथे- बडे गुरूजी आपमन ठीके कहे हव।…फेर आपमन गुरूजी हरव, जम्मो मुस्किल ले पार निकले के रद्दा बतईया, मोर आपमन ले बिनती हे के आपेमन कउनो अइसन उपाय बतावव जेमा हमर नामो चलत रहय अउ आपोमन ल कांही झन होय। तब बडे गुरूजी ह थोरकन गुने के बाद कहिस- एक काम करव सरपंच जी, तुमन दिल्ली जावव ऊंहां एकठन रामलील्ला मईदान हे, जिहां जाके धरना देके बईठ जव। कोनो गदहा समझ नई पईन के ये गुरूजी ह का काहत हे।तब सियान गदहा पूछथे- ये धरना ह का हरे, त बडे गुरूजी बताथे- धरना मतलब अपन मांग ल सरकार ले मनवाय खातिर बिन खाय पिये जुरिया के कई दिन ले तब तक बईठे रहना जब तक सरकार ह मांग ल नई मान जाय। तुमन सरकार ले एक्केठन मांग करहू के आर. टी. ई. म सुधार करे जाय, जनरल परमोसन ल बंद करे जाय अउ लईका मन के फेल-पास ल फेर सुरू कर दिये जाय, काबर के लईका मन तो पास हो जथंन कहिके पढना-लिखना ल बंद कर देहे अउ गुरूजी मन पढाना।बस अतके बोलहू सरकार करा।एकबार फेल-पास ह सुरू हो जही तहांले फेर गुरूजी मन लईका मन ल बने पढाय खातिर मारही पीटही अउ गदहा घलो कईही, अईसन म ईस्कूल म तूंहर नांव घलो चले बर धर लिही अउ हमूंमन कान्हून ले बांच जबोन जी ।तब सरपंच गदहा पूछथे- हमर बात ल सरकार ह मान जही गुरूजी! तब गुरूजी कथे- हां जी, बस तूंहर जुरियाय के देरी हे, तुमन ऊंहा देखहू कईझन पत्रकार अउ टीवी वाला मन झूम जही, ओखर मन के आवत देरी रथे तहां ले भीड घलो जुरिया जथे, सरकार के बिरोधी पार्टी वाले नेता मन तो अइसने घटना ल खोजत रहिथे, तूंहर संग वहुमन धरना म बईठ जही अउ तूंहर पूरा सांथ दीही।अतका ल सुनके जम्मो जुरियाय गदहा मन हांमी भर दीन, सरपंच गदहा ह हूंत करात बोलिस के दू दिन बाद जम्मो गदहा ल अपन बाल-बच्चा सहित खाना-खर्चा ल धर के दिल्ली कूच करे बर टेसन म इकट्ठा होना हे।
अब दू दिन का महिना भर दिन बीतत हे,फेर गदहा मन दिल्ली कूच नई कर पाय हे, चउक-चउक म उंघाय खडे हे, कोनो अघुवा बनही त संग म लग जबो सोंचत हे, झंझट अउ खरचा ल घलो डर्रात हे।
अईसनहे आज हमरो हाल हे, सब ल समझ म आवत हे के ये नवा सिक्छा कान्हून म बडका खामी हे, अउ वो हे- जनरल परमोसन, हमर लईका मन पढई म लगातार पिछवावत जात हे, फेर ये बात ल उठाय बर कोनो अघुवा के इंतजार म हे। हे भारत माता तोर लईकामन कब जागही वो ?

ललित वर्मा “अंतर्जश्न”
छुरा

Related posts:

Leave a Reply