गनेसी के टुरी

आज संझा बेरा पारा भर म षोर उड़ गे – ‘‘गनेसी के टुरी ह मास्टरिन बनगे…………..।’’
परतिंगहा मन किहिन – ‘‘काबर अइसने ठट्ठा करथो जी? ओली म पइसा धरे-धरे fकंजरत हें, fतंखर लोग-लइका मन कुछू नइ बनिन; गनेसी के टुरी ह मास्टरिन बनगे? वाह भइ ! सुन लव इंखर मन के गोठ ल।’’
हितु-पिरीतू मन किहिन – ‘‘अब सुख के दिन आ गे ग गनेसी के। अड़बड़ दुख भोगत आवत हे बिचारी ह जनम भर।’’
तिसरइया ह बात ल फांकिस – ‘‘अरे, का सुख भोगही अभागिन ह? बेटी के जात, पर अंगना के षोभा ; के दिन संग म रहिही? काली-परोन दिन बिहा के चल दिही, तहां गनेसी के कोन हे? फेर का के सुख?’’
बसंती के जउन संगी-सहेली अउ गांव वाले मन वोकर पढ़ाई के मजाक उड़ावंय, अउ जिंखर लइका मन के नौकरी नइ लग सकिस, उंखर मन के मुंह ओरम गे रहय। खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे। कहत रहंय – ‘‘मास्टरिनेच् तो बनिस हे, कलेक्टरिन तो नइ बनिस?’’
जे ठन मुंह, ते ठन गोठ।
बात सोला आना सच आय। बसंती ह पढ़-लिख के आज मास्टरिन बन गिस। जउन प्रण करिस, वोला पूरा करके देखा दिस। मने-मन वो ह आज फेर प्रण करिस – ‘अब मंय दाई ल कोनों तकलीफ नइ होवन दंव।’
बसंती ह आज गजब खुस हे।
दाई गनेसी ह घला गजब खुस हे। कब सोंचे रिहिस हे वो ह कि वोकर बेटी ह मास्टरिन बन जाही? बसंती ह बेटी आय, बेटा नोहे, अइसनो फांस वोकर हिरदे म गड़े रहय, वहू ह आज निकल गे।
गांव वाले मन, चाहे लइका होय कि सियान; बसंती ल कभू बसंती कहिके नइ बलाइन। जब किहिन, गनेसी के टुरिच् किहिन। सच तो कहिथें सब। बसंती ह गनेसिच् के टुरी आय। दाई कहस कि ददा कहस, गनेसी के सिवा वोकर अउ कोन हे? जनम धरे के पहिलिच् ददा ह बइमान हो गे। मुड़ी म राख चुपर के कहां भागिस ते गांव म लहुट के फेर नइ आइस। खार म खेत नहीं, गांव म घर नहीं; कहां जातिस, का करतिस बिचारी गनेसी ह? गोसंइया ह तो नोहर हो गे। फेर गजब हिम्मत गनेसी के। दू खोली के टुटहा-फुटहा घर; न खपरा के ठिकाना, न खरिपा के। इही घर म वोकर डोला उतरे हे, इfहंचेच् ले वोकर अर्थी उठही। भरे जवानी, गोसंइया के जीते-जी वो ह रांड़ी-रउठी कस हो गे। कतरो सगा आइन। संगी-सहेली मन घलो उभराइन, फेर कोनों जगह हाथ नइ लमाइस। बेटी के मुंह ल देख-देख के जिनगी ल खुवार कर दिस। दिन-रात रांय-रांय कमाइस, लांघन-भूखन रिहिस, पानी-पसिया पी-पी के दिन बिताइस, फेर बेटी ल पढ़ाय म कमी नइ करिस। अपन मरजाद ल कभू नइ छोड़िस। बसंती ह वोकर टुरी नइ होही त काकर होही? अब वोला सुख के दिन दिखे लगिस।
अंगना म हितु-पिरीतू मन सकलाय रहंय। बसंती ह वो मन ल चहा-पानी पियावत रहय। कोनो मन वोकर नौकरी के कागद ल टमड़-टमड़ के, उलट-पुलट के देखंय, त कोनों मन वोला तिखार-तिखार के पूछंय – ‘‘कोन गांव के स्कूल म लगिस हे बेटी?’’
कोनों पूछंय – ‘‘तनखा कतिक मिलही नोनी? जाबे तिंहा आपन दाई ल घला लेग जाबे। गजब दुख सहि के तोला पढ़ाय-लिखाय हे बपुरी ह।’’
जउन आवंय, मन भर के आसीस दे के जावंय।
का मन होइस ते दुषाला ओढ़ के ठकुराइन काकी ह घला गनेसी….गनेसी कहत आ गे। वोकर हाथ म मिठाई के डब्बा रहय। बसंती ह धरा-रपटा अंगना म खटिया ल जठाइस। ठकुराइन काकी ल बड़ सनमान सहित बइठारिस अउ वोकर पांव परिस। ठकुराइन ल अपन अंगना म बइठे देख के दुनों दाई-बेटी के आंखी डबउबा गे। ठकुराइन काकी घला बोटबिट ले हो गे। मिठाई के डब्बा ल बसंती ल देवत-देवत कहिथे – ‘‘खुस रहा बेटी, खुस रहा। तंय आज अपन दाइच् के नाव ल उजागर नइ करे हस, ये गांव के नाव ल घला उजागर कर देस।’’
ठकुराइन काकी ल देख के बसंती ल पांच-छः साल पहिली के एक ठन बात के सुरता आ गे। ठकुराइन काकी अउ गनेसी दाई ल घला विहिच् बात के सुरता आ गिस होही तइसे लगथे।
बिहिनिया के बेरा रिहिस। ठकुराइन काकी ह तिसरइया घांव मुहाटी ले निकल के गनेसी के घर कोती के गली ल देखिस। गनेसी के दउहा नइ रिहिस। रात के जूठा बरतन मन के नहानी तीर कुढ़ी गंजाय हे। घर के बाहरी-पोंछा नइ होय रहय। धोय के कपड़ा मन के खरही माड़ गे रहय। स्कूल के बेरा हो गे रहय, कइसनो करके लइका मन ल स्कूल भेजिस। बेरा चढ़ गे फेर गनेसी के अता-पता नइ चलिस। ठकुराइन काकी के एड़ी के रिस ह तरूवा म चढ़गे। गारी-बखाना सुरू कर दिस।
परोसिन, साहेबिन बाई ह ठकुराइन के गारी-बखाना ल सुन के परदा डहर ले झांकत कहिथे -’’ अइ, का हो गे ठकुराइन? बिहिने-बिहिने कोन भगवान के नाव ल लेवत हस?’’
‘‘अब तहूं ह जरे म नून झन डार साहेबिन बाई। घर म सब fछंहीं-भिहीं परे हे। रोगही गनेसी ल आजेच् मरे बर रिहिस होही? अभी ले नइ आय हे, कहां मुड़ाय होही ते।’’ ठकुराइन ल अपन मन के भड़ास निकाले के बहाना मिल गे।
साहेबिन बाई ह तो ठकुराइन काकी के कुलबुलाई ल देख के मने-मन कुलकत रहय। ऊपरछांवा रोनहू बानी बना के कहिथे – ‘‘झन पूछ ठकुराइन बाई, तुंहर घर के होय कि हमर घर के, काम वाली बाई मन के इहिच रवइया। दू दिन जाय न चार दिन, नांगच्-नांगा। काम होय कि झन होय, महीना पूरे रहय कि झन पूरे रहय, पइसा बर जोम दे के बइठ जाहीं। फेर तोर गनेसी ह तो कभू नांगा नइ करय। का हो गे होही वोला आज?’’
‘‘मरे चाहे सरे, हमला तो काम से मतलब हे…’’ कहत-कहत ठकुराइन ह गनेसी घर कोती चल दिस।
थोरकिच दुरिहा म गनेसी के घर रहय। मुहाटी म बसंती ह कापी-किताब खोल के बइठे रहय। उनिस न गुनिस, जाते भार ठकुराइन काकी ह सुरू हो गे -’’ तोर दाई ल मरना आय हे अउ तंय गजब पढ़ंतिन बने बइठे हस। कहां गे हे रोगही ह ? बेरा ह वोला जनावत नइ होही?’’
लइका जात। का बोलतिस बसंती ह? फेर मान-अपमान, समय-कुसमय ल सब समझथें। भीतर म दाई ह जर म हकरत रहय, एती पथरा कचारे कस ठकुराइन काकी के बात; रोना आ गे बसंती ल। कापी-किताब ल धर के रोवत-रोवत घर भीतर भागिस ।
ठकुराइन ह भांप गे, कुछू न कुछू बात जरूर हे। ठक ले खड़े रहि गे, बक नइ फूटिस।
भीतर ले हकरत-हकरत गनेसी ह किहिस – ‘‘मरनच् तो नइ आय ठकुराइन। महूं सोचथों, मर जातेंव ते दुख-पीरा ले छुट्टी पा जातेंव; फेर कहां जा के मुड़ी ला खुसेरंव?’’
ठकुराइन काकी ह कहिथे – ‘‘रहन दे, जादा ढेंचरही झन मार। कतेक बीमार पड़े हस ते तंय सुते रह। तोर टुरी ह तो बने हे, नइ होय हे का काम-बूता करे के लाइक।’’
गनेसी – ‘‘बिहिने के पांव परत हंव ठकुराइन, जा बेटी जा; बरतन-भांड़ा ल तो घला मांज-धो के आ जा; फेर काबर मानही मोर बात ल? परीक्षा देय बर जाहूं कहिके बिहिनिया ले किताब म मुड़ी ल गड़ाय बइठे हे।’’
ठकुराइन काकी – ‘‘हां, अउ पढ़ा-लिखा। अरे, जादा पढ़ाय-लिखाय म अइसनेच होथे। अप्पत हो जाथें लइका मन। तेकरे सेती तोला घेरी-बेरी बरजथंव, जादा पढ़ा-लिखा के का करबे टुरी ल? कोन्हों मास्टरिन तो बनना नइ हे वोला। आठवीं पढ़ डारिस, नांव-गांव लिखे के पुरती हो गे। एसो पास होय कि फेल, भेज येला काम करे बर; नइ ते अपन हिसाब करा ले।’’
बसंती ह रोवत-रोवत कहिथे – ‘‘हव हम मास्टरिन बनबो। कुछू हो जाय, फेर हम पढ़े बर नइ छोड़न।’’
‘‘बहुत बात करे बर सीख गे हस, छोटे-बड़े के घला कोनों लिहाज नइ हे तोला? छोड़ ये किताब-कापी ल, चल मोर संग। निकता-गिनहा म दाई के अतको काम नइ करबे?’’ कहत-कहत ठकुराइन ह वोकर कापी-किताब ल झटक के परछी म फेंक दिस अउ चेचकारत वोला अपन घर कोती लेग गे।
ठकुराइन के बात ह बसंती के कलेजा म बाण कस गड़ गे। मने-मन प्रण करिस – ‘एक दिन मंय जरूर मास्टरिन बन के देखाहूं ठकुराइन काकी। आज तोर दिन हे, काली हमरो दिन आबे करही।’
बसंती ह आज अपन विही प्रण ल पूरा करके देखा दिस।
विही ठकुराइन काकी ह आज मिठाई के डब्बा धर के आय हे।
ठकुराइन काकी ह कहिथे -’’कते बात के सुरता करके रोथस बेटी। भूल जा वो दिन के बात ल तंय; मोला माफी दे दे।’’
बसंती – ‘‘अइसन कहिके तंय मोला पाप के मोटरा झन बोहा ठकुराइन काकी। वो दिन के बात ल कहिथस, वोला कइसे भुला जाहूं? विही ह तो मोर गुरू-मंत्र आय। वो दिन वइसन बात नइ होतिस ते कोन जाने, मंय मास्टरिन बन सकतेंव कि नहीं।’’
ठट्ठा मड़ाय म घला ठकुराइन काकी ह कोई कम थोड़े हे, मिठाई के डब्बा ल झूठ-मूठ के नंगावत कहिथे – ‘‘वइसन बात हे, तब तंय हमर मिठाई के डब्बा ल वापिस कर। अब तो तंय जउन दिन साहेबिन बाई बन के देखाबे, विही दिन मंय तोला मिठाई खवाहूं।’’
ठकुराइन काकी के गोठ ल सुन के जम्मों झन हांसत-हांसत कठल गें।

कुबेर
(कहानी संग्रह भोलापुर के कहानी से)

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