गुड़ी के गोठ : महतारी भाखा म कब होही पढ़ई..?

केहे बर तो छत्तीसगढ़ी ल ए राज के राजभाषा बना दिए गे हवय, फेर अभी तक अइसन कोने मेर नइ जनावत हे के इंहा के सरकार ह एला जमीनी रूप दे खातिर कोनो किसम के जोंग मढ़ावत हे। हां, ए बात जरूर हे के राजनीतिक लाभ ले खातिर राजभाषा आयोग के गठन कर दिस, लाल बत्ती के मजा ले खातिर वोमा लोगन ल बइठार घलोक दिस। फेर अब तक जब ए बुता ल पूरा करे दू बछर होए जावत हे, वोमा बइठे ‘लाल बत्ती’ वाले मन ‘सफेद हाथी’ कस जनाए लागत हें।
अइसन रिस एकर सेती के अभी एदे जम्‍मो राज के नान्हे लइका मन के स्कूल-मदरसा खुलगे हवय, फेर उन स्कूल म अभी तक महतारी भाखा के माध्यम ले पढ़ई-लिखई के बेवस्था नई करे जा सके हे। सरकारी खुरसी म बइठे लोगन के कहना हे के अभी पाठ्यक्रम के जुगाड़ नइ हो पाए हे, काला कइसे पढ़ावन, कतका अकन पढ़ावन तेकर चेत नइ करे पाए हावन, कइसे हर्रस-भर्रस कुछु-काहीं पढ़ा देवन?
अचरज लागथे इंकर अइसन गोठ ऊपर काबर ते इहां भाखा अउ राज आन्दोलन ले जुड़े मनखे मन कतकों बछर पहिली ले अतका अकन जिनीस सकेल के रख डारे हवंय के वोला सिरिफि प्राथमिक शिक्षा नहीं, भलुक उच्च स्तर के शिक्षा खातिर घलोक उपयोग करे जा सकथे। हां, ए बात जरूर हे ‘निजी क्षेत्र’ म सकेले गे जिनीस मन के हर्रस ले उपयोग करे म ‘खुरसी’ म बइठे लोगन मन के एक तो नाक जाही अउ ऊपर ले कुछु-काहीं पाए के रस्ता घलोक मुंदा-तोपा जाही, एकरे सेती उन जरूरी बुता ल छोड़ के फोकटइहा बुता म जादा भीड़े रहिथें।
इहां के शिक्षा विभाग ह पाठ्यक्रम बनाये ल छोड़ के शब्दकोश अउ बियाकरन बनाये के पचड़ा म परे रिहीसे। जबकि ए बात ल सब जानथें के इहां कतकों झन के लिखे शब्दकोश अउ बियाकरन कब के आ गए हे। हमर पुरोधा हीरालाल चन्द्रनाहू काव्योपाध्याय ल बियाकरन बनाए (लिखे) तो 125 बछर होगे हवय। अतेक सब होए के बाद घलोक शब्दकोश , व्याकरण अउ मानक रूप के पचड़ा म परे रहना ह असल म छत्तीसगढ़ी के माध्यम ले शिक्षा दे के बुता म अटघा अटकाना आय।
जिहां तक स्कूल-कॉलेज म छत्तीसगढ़ी म पढ़ाए के बात हे त पहिली घलोक एक विषय के रूप म अइसन करे जा चुके हे। ‘हमर छत्तीसगढ़’ के रूप म स्कूली शिक्षा घलोक दिए जा चुके हे, अइसन म प्राथमिक शिक्षा खातिर कोनो भी किसम के बहाना ल माने नइ जा सकय। अच्छा हे के इही सत्र ले महतारी भाखा छत्तीसगढ़ी के माध्यम ले जम्‍मो प्राथमिक स्कूल मन म शिक्षा दिए जाय।
सुशील भोले
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  • वाह भैया , सही फरमाया आपने .. सब राजनीति है जो ‘महतारी भाखा’ के महत्व को सही से नहीं रख पा रही है .. अच्छा कर रहे हैं आप कि लेखन के माध्यम से भाषा को जारी रखे हैं .. मेरा भी मानना है कि प्राथमिक शिक्षा को इन जन-भाषाओं में दिया जाना चाहिए , वह भाषा जिसे बच्चा पैदा होने के साथ सीखता है .. पर दुर्भाग्य है कि लोगों में दृढ राजनीतिक इच्छा शक्ति नहीं है और ‘महतारी भाखा’ से प्रेम भी .. जन-भाषाओं का समर्थक हूँ , अवधी में ब्लॉग लिखता हूँ , आपके ब्लॉग का आज अनुसरण कर लिया है , अब छत्तीसगढ़ी के सौन्दर्य को भी पा सकूंगा .. जारी रहें .. आभार ..

  • बने कहत हस भैया,
    कुकुर मन भुंकरे त पहिलि बत्ती परत रहिसे।
    अउ अब भुंकरथे त लाल बत्ती पर जथे,
    फ़ेर राजभाषा बर काय करत हे ते्खर कहुंचे आरो नई ए।
    अपने ला चिकना के जगर-मगर करत हे
    भले बाकी हां खरदुसरा परे रहय

    जोहार ले

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