गोठ बात : पानी बचावव तिहार मनावव

तैं माई लोगिन होतेस त जानतेस पानी-कांजी भरे म कतका दु:ख अउ सुख लागथे तोला काय लगे हे। भात ल खा के मुंह पोंछत निकल जाबे। मैं हर जानहा कतका दु:ख तेला सत्ररा घांव पानी भर छुही म पोत घर ल फेर रंग म पोत आजकल तो बोरिंग ले पानी घलो नई निकलत हावय। अभी म पानी नई निकलत हे त अभी तो जम्मो दिन बांचे हावय।’
देवरिहा समय एक दिन सोन साय हर बिहनिया हांसत- गोठियात रहीस। ओकर आगू-पाछू कोनो नई रहीस। मैं देवरहीया छुही रंग लाय बर दुकान जात रहेंव। मैं सोनसाय कका मेर गेंव अउ पूछेंव कस कका सोनसाय तैं अकेल्ला कइसे हांसत जात हस कका? मोला कुछु नई बताइस। मैं फेर दुसरइया पूछेंव। नहीं-नहीं कका कुछु जरूर बात ये फेर तैं मोला नई बतात हावस। मैं अइसने पूछते रहेंव, सोन साय कका हर भाव सिंग बबा करा गोठियाय बर धर लिस। येती मोला घर बर समान बिसाय बर रही से। तभो मैं दुकान समान बिसाय बर नई गेंव। घर म लहुट के आयेंव मोला रोहन के दाई चुच्छा हाथ देख मोला कइथे कस हो रोहन के बाबू! तैं तो समान बिसाय बर दुकान गे रहे हच का होगे तोला तैं टुच्छा हाथ लहुटत हावच। धन ककरो मेर लड़ई -झगरा होय हावस, तैं काबर चुपेचाप खड़े हावच। येकर गोठ ल सुनके मैं धीर लगा के गोठयावं, सुनथच ओ रोहन के दाई! मैं समान बिसाय बर दुकान मेरा पहुंच गे रहेंव। ओती ले सोन साय कका हर हांसत आवत रहीस। अकेल्ला ओकर हंसई मोला थोरकिन घुस-घुस लागिस मैं ओला काबर हांसत हावस कईके पूछे बर भुलागे तहांले येती समान नई बिसाय सकेवं। मोर अतका गोठ ल सुन के बघवा हर गरजथे तइसने गरजे बर धर लिस। अपन आंखी ल लाल कर लीस अउ मोला सुनाइस- तैं माई लोगिन होतेस त जानतेस। पानी-कांजी भरे म कतका दु:ख अउ सुख लागथे तोला काय लगे हे। भात ल खा के मुंह पोंछत निकल जाबे मैं हर जानहा कतका दु:ख तेला सत्ररा घांव पानी भर छुही म पोत घर ल, फेर रंग म पोत। आजकल तो बोरिंग ले पानी घलो नई निकलत हावय अभी म पानी नई निकलत हे त अभी तो जम्मो दिन बांचे हावय। येकर गोठ ल सुनके मैं चुपचाप ओ मेरा ले भाग गेंव। सांझ के बेरा होवत रहीस मैं रात के होवत ले गुनत रहेंव ये सोन साय कका हर मोला देख के कइसे हांसिस मैं गुनत-गुनत खा पी के सुतगेंव। मोर मन नई माढ़िस मैं बिहनिया ले फेर सोन साय कका घर कोती गेंव ओकर दुवारी मेर जाके पूछेंव कस गो सोन साय कका हावच घर म। सोन साय कका मोर भाखा ल ओरख के कहीच- थोरकिन अगोर ले बे मैं आवथ बाबू, में उही मेर एक ठन पैरा के पिढ़हा म बइठगेंव। थोरकिन के बाद म सोन साय कका हर अपन पीठ म खेत म छिचे वाला स्पियर ल बोह के आइस मैं सोन साय कका ल देखके हांसे बर धर लेंव। सोनसाय कका मोर तीर म आईस मैं पूछेंव- कस कका तैं ये काय उदीम उठाय हावच। सोन साय कका कइथे- देख बाबू मैं हर ये पानी के समस्या ल देख के सब उदीम ल उठाय हाववं। काबर दस-बीस लीटर पानी डारके ओमा रंग भर दे अउ स्प्रे बराबर सब भितिया म मार। जा देखबे मोर भितिया कतका बढ़िया दिखत हावय येमा कतका पानी के बचत होवत हावय। सोनसाय कका के गोठ ल सुन के मोर मन गद-गद होगे अपन मने मन मैं गुने लागेंव… आज पूरा दुनिया म पानी के किल्लत हावय हाहाकार होवत हावय जब हमन एक-एक बूंद ल बचाबो उही एक-एक बूंद पूरा संसार म बाचही त कतका कन पानी बाचही।
फेर अभी देवरिहा घर कुरिया ल कई घांव पोते बर पड़थे। येमा कतका कन पानी बर्बाद होथे तेकरे सेती मैं ये उपाय ल करे हावंव। कका के गोठ ल सुनके मैं कहेंव- तैं सही कहे कका येमा अब्बड़ अकन पानी के बचत होही। मैं जात हंव कका स्पियर म पानी डाल के मैं अपन भितिया ल पोतहा अउ पानी के बचत करहां। मोर संग मैं पूरा गांव ल बताहूं अउ पानी के बचत करवाहूं ये साल तिहार ल पानी बचावव। देवारी मनावव तिहार मनावव। ले मैं जात हंव कका, घर, कुरिया ल मोरो लिपे-पोते बर लागही। अइसने कइके मैं घर आगेंव।
श्यामू विश्वकर्मा
मु.पो. नयापारा (डमरू)
जिला- रायपुर (छ.ग.)

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