घठौंदा के पथरा

ब झन कहिन्थे मैं पथरा के बने हौं-  करेज्जा घलाय पथरा साहीं हवय…..मैं का कहंव ? रानी के कुटकी मालिन कभू तलाव खनाय रहिस, नानचुक आमा के अमरईया, बर पीपर के रुख ले पार मा रसदा रेंगैया बर, असनांद बर आये मनखे बर-घन छईन्हा ! खेत ले लहुटत , कांदी के बोझा मूड मा धरे, खांध मा नांगर, कभू कोपर लेके आवत, छाँव मा सुरतावत जब कमिया, कमेलिन. किसान थिरान्थें, ता मोला थोरकुन बने लागथे. थोरकुन पसीना सुखा के पटकू पहिर के जब कमिया घठौंदा मा बैठ के तलाव के कँवल, खोखमा, पुरईन ला निहारथे, ता मोरो जीउ जुडा जाथे.
……………कभू हरियर कांदी, कभू सोनहा धान के बोझा उतार के कमेलिन मोर लखठा मा आके सुरताथे, कभू मुँह पोंछथे, कभू अन्जरी मा पानी लेके अपन चेहरा ला धोथे , ता पानी घलाय के जी जुड़ा जाथे . फेर थिरा के जब कमेलिन पथरा ऊपर बईठ के कुंवर ललहू ऐंडी ला रगर रगर के घसरथे, ता मोर पथरा के देहें घलाय चिक्कन चातर हो जाथे.

………….नांगर कोपर के जोंता ले छूटे जब बइला मन मोर कगरा पानी पिये बर हबरथे, ता बइला के घंटी के घन-घन मोर चारों कती घनघनाय लागथे . ऐसे लागथे जना-मना मोर अंतस में मन्दिर के घंटी, गिंजर गिंजर के गावत -गुंजत हें.

………….सच्ची, ये मोर तन, मोर मन पथरा के मन हे, फेर कुंवर, गोद के रगड़े ले तन के कठोर रूप हा चिकना गये हे – फेर जब एक पांत मा पारा के बहुरिया ला घाट में दसनहावन के दिन लाइन, ता भीतर भीतर मोर मन दरक गे…….चुरी फोर के, रंदसारी पहिरें तो मै रो डारेंव, मोर आंसू मोर अंतस मा औंट गे…….मैं बोले नई सकेंव, मैं वोला चुप नई करा सकेंव, हाय रे पथरा तन रांडी, दुखिया के आंसू घलाय नई पोंछे सकेंव.

चौमास मा जब पटापट पानी के बड़का बूंदी पुरैन पाना ला ठोनकय, ता कँवल, खोखमा मन मूडी डोलावंय ता जड्काला मा ओस के बूंदी मोती संही चमके, ता कभू कोहरा तरई ऊपर टंगाय, चिरई चुरगुन चुरुल चुरुल करत रवनिया तांपय.

……………आज मंझनिया के सुन्ना बेरा, कौआ, कोंकडा, घलाय रुख के डारा मा बैठ के सुरतावत हें, ओंघावत हें – मोला सुरता आवत हे – नोनी, बेटी के बहुरिया….के. कैना- नोनी के कई ठन रूप -रंग, बेटी, घियरी, बहु, दीदी, दाई, सास, बूढी दाई, नानी…वोकर रूप रंग बदलत रहिथे-फेर तिरिया के जनम लेहे बर नी होवय, सरबस देहे बर होथे ……..नानचुक …कोरा के लइका ….दू रेसमाही चिक्कन ओंठ दाई के दुदू ला चिचोरत हे – चिचोरत हे…..! ता दाई के देवी रूप ला देखे के लाइक होथे …दाई अपन लरिकाई ला फेर पा जाते…जैसे मन के बछरू कलोर गाय के थन ला हुदेनत हे, दाई जैसे फेर नोनी बन जाथे. नोनी जब दाई बन जाथे, ता ओकर ले बड़का सुख कुच्छु नोहे, सरग के सुख वोकर साम्हू…..सब्ब ……फिक्का.
……………फेर मया के बांगुर जाल मा मछरी का मनखे फँस जाथे ….फेर अरझ के तड़प-तड़प के रहि जाथे ….फेर लइका के मन सफ्फा धोवय लुगरा सही रथे, बाधे ले मन मा सलवट, सिकुड़न आय लागथे. जब बेरा के चिरई फुर्र ले उड़िया जाथे, नोनी ससुरार जाये के लाइक होगे…..सेदूर के बलदा मा कपिला गाय साही ददा ला नोनी ला बर के पिछौरी मा बाँध देथे…बस ससुरार के खूंटा मा जनम भर बंधा जाथे……….लइका टुरी – नोनी कोन ए ?  सिरिफ लइकाई के सुघ्घर तितली ए, जिनगानी मा बिहनिया के बिहार ए, भिनसरहा के सुरुज ये, सोनहा किरन ऐ, जूही चमेली के महमहाई ये, लरिकाई एक सपना ए, जौन बीत जाथे, फेर लहुट के नी आवय -फेर सपना के सुरता मन ला गुदगुदाथै, मन ला झुलाथय, हरु हरु झुला के थपकी देथे,……अनजान म सुरता के चंदन ममहाथय फेर कपूर सही उड़िया जाथे,….. जुच्छामन …… खाली मन रहि जाथे….. फेर बाढे पोढे नोनी……. बसंत जैसे इंदर धनुस के सात रंग, सुरसती दाई के बीना के सात सुर …… सतबिहिनिया के सात दियना के अंजोर….. जगर …..मगर …. जगर….. मगर…. कथें तिरिया जात के पेट मा बात नी रहे, पचे नही, फेर करन के महतारी- कुंती कभू छाती ठोंक के कही सकिस के करन मोर बेटवा ये – नहीं न ? काबर? कैसे ? कुछु ऐसनाहा रहस्य ……रथे … जेला तिरिया जनम भर अपन अंचरा मा लुकाय रथे, ओली मा बांधे रथे, वोला कभू उघारे निही न, वोला कभू बतावे निहीं- जैसे सुहागरात के रहस्य-विचित्र, नोखन के होथे – हर जोड़ा के अपने अपन मा जुच्छा अकेल्ला – पोगरी असन – वोमा कोनो के साझा मिंझारा नी रहे. येही हर – नारी के सत ये ….पत ये ….एकरे…बर सतवंती बने रहना – तिरिया जात के एक गुन ये.
……………जौन देस में तिरिया जात के…..दाई माई के हुरमत लुटाथे, चाहे सधुवाईन होय, चाहे सुहागिन- वो देस खंचावा मा , नरक मा बोजाय बिन नई रहय.

……………वैसनाहे – लैकाई म गोद म जब कांकर गडथै ता रकत जम जाथे, धीरे-धीरे वो खून हा गठान पर के गोखरू बन जाथे, फेर जनम भर रेंगे मा आदमी खोराथय, तइसन हे लरिकाई के संस्कार होथे. सुरुज संही नॉनपन ले संसकार के – किरण के असीस धरती के माथा ऊपर परथे, धरती सही नोनी चोला तरी मूड होके धारण करते, ओंटी ओली मा धरते – वोई नोनी जब दाई बने बर अपन कोख म जीउ ला पोंसथे, पालथे, तब जम्मो देवता – देवी के देवताई वोकर अंचरा मा समां जाथे, सुरुज के तेज, चन्दा के अमृत, कामधेनु के पेउस, कल्प बिरिछ के वरदान, शिव के दया, शिवानी के मया, दुर्गा के दुलार – जम्मो मिल जाथे- सधौरी के साध-साधना- सिद्धि मा बलद जाथे…..सच्ची ये…..दाई, दीदी सुहागिन-सुवारी बिन- डर भूत के डेरा ये, जिनगी, जुच्छा सुनना ए. अउ बिहाव – जैसे नदिया सागर मा, पानी के बूंदी कथरी म, लता-नार …..रुख मा तैसे कईना – कल्यानी, कालिंदी, कल्पलता बन जाथे.
…………….फेर- रांडी- बिधवा- कतका भयानक सबद – आखर.  जैसे बज्जर कैसे गिरथे.!  आदरमा कैसे फाट्थे ! करेज्जा कुटा कुटा कैसे होथे ?

…..पालेश्वर शर्मा

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  • बहुत मर्मस्पर्शी और ह्रदय स्पर्शी रचना.
    अपनी मातृभाषा का ये लालित्य बरबस
    आकर्षित करता है. पालेश्वर जी वैसे भी
    बहु भाषा विद् है. वे अपने प्रदेश के गौरव हैं.
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    बधाई
    डॉ.चन्द्रकुमार जैन

  • छत्तीसगढ़ के साहित्य अउ संसकार, संस्कृति सबे बर आदरणीय पालेश्वर शर्मा जैसे सियान मन के लेख ला तो कहव झन उनखर गोठ-बात तक धरोहर आय. गुरतुर गोठ ला एला सकेले के कारज करे बर साधुवाद पहुंचे.

  • पढ के गदगद होगे चोला !! मन के सब्बो याद ढुलढुली कस तरिया के घटौंदा तीर ढुले लागीस !!

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