चल जाबो राजिम कुम्भ – कहिनी

माघी पुन्नी ले महाशिवरात्रि तक पन्दरा दिन बर हर साल राजिम के तिरवेणी संगम मं कुंभ मेला भरात हे। दुरिहा-दुरिहा के साधु संत ऋषि मुनि मन आए रथे ओकर मन के परवचन म अमरित बरसथे, नदिया के पानी मं नहाय बर कुण्ड बने हे, एमा नहाए ले मन ह पवित्र हो जथे, कहावत हे, के जइसे कौंवा मन के मरे के बेरा आथे त कासी मं जाके मरथे। जेन मनखे ह कोन्हो महानदी मं जाके मर जथे वोहा सीधा बैकुण्ठ लोक मं जाथे।”
बिहनचे जुआर पारा के टुरा मन आगी तापत-तापत किसम- किसम के गोठियात रहाय। फेर सुकालू के खिलखिलई ल देख के कथरी ल ओढ़हे बुधयारिन ह अपन नतनीन ल पाय तीर मं आके कथे-”का बात ये रे सुकालू तैं अड़बड़ हांसत हस, कोन्हो जिनिस मिलगे हे का।” अतका ल सुन के सुकालू चुप हो जाथे अउ तोर सुने के नोहे डोकरी। कहिके गोठ ल पलटा देथे, भुर्री म पैरा ल जोरत-जोरत बिसम्भर ह कथे ठउका बेरा आय हस बडे दाई तोरेच लइक गोठ करत रहेन। सियनहा मन कथे, जिनगी भर के पाप ह कुंभ मेला मं जाके नहाय ले धोवा जाथे, फेर ये पानी के बुलबुला कस जिनगी के का ठिकाना। कब फट ले फुट जाही अउ माटी म मिल जाही। बुधयारिन के समझ मं कुछु नई अइस अढ़ही बिचारी कुंभ मेला के रसखस ल का जाने, वोकर बर तो जम्मों दिन एके बरोबर हरे। आगी मं हाथ ल सेंकत-सेंकत कथे-”बने सफ्फा-सफ्फा बता न रे बेटा, गोठ ल त सुलिनहा करेस। फेर कुंभ मेला हमर असन अढ़ही अऊ गरीबहीन के बस के बात नोहे, कहां काशी, हरिद्वार जा सकबो। आजकाल मोटर गाड़ी के भारी भीड़, चोर-ढोर तको मेला मड़ई मं अड़बड़ किंजरत रथे। मेहा अभी नई मरव रे, मोर नाती बहू के हाथ ले पानी ल पीहूं तभे परान ह छूटही।” बिसेसर ह जोर से हांस के गोठियाथे-”हत्त ओ डोकरी, तेंहा निच्चट अढ़ही हस, तोला कासी अऊ हरिद्वार जाय ल नई कहात हन। न तो तोला चोर-ढोर, गाड़ी-मोटर मं भोसाय बर भेजत हन, तेंहा तो घातेच दिन ले जीबे। हमन तो राजिम कुंभ मेला के गोठ करत हन।
माघी पुन्नी ले महाशिवरात्रि तक पन्दरा दिन बर हर साल राजिम के तिरवेणी संगम मं कुंभ मेला भरात हे। दुरिहा-दुरिहा के साधु संत ऋषि मुनि मन आए रथे ओकर मन के परवचन म अमरित बरसथे, नदिया के पानी मं नहाय बर कुण्ड बने हे, एमा नहाए ले मन ह पवित्र हो जथे, कहावत हे, के जइसे कौंवा मन के मरे के बेरा आथे त कासी मं जाके मरथे। जेन मनखे ह कोन्हो महानदी मं जाके मर जथे वोहा सीधा बैकुण्ठ लोक मं जाथे।
तहूं ह जा न ओ। अतका ल सुन के सबो टुरा खिलखिलऊवा हांस परिस। रउनिया ह आगे, भुरर्री तक बुतागे फेर गोठ ह माते रहाय, चंदन ह कथे-”सुन ककादाई मेंहा राजिम कुंभ मेला के बारे मं तोला बतावत हाें कान देके सुनबे। हम राज के राजधानी रइपुर ले पन्दरा कोस धूरिहा मं राजिम नगरी ह बसे हे। पुरान के गोठ ल ज्ञानी मन बताथे कि काशी ह तिलशुल के उप्पर, शंख म द्वारिकापुरी, ओइसने ढंग ले कमल फूल मं राजिम ह विद्यमान हे, ये कमल फूल के पांच पंखुड़ी मं पांच शिवलिंग विराजमन हे जेकर नाम पटेवा मं पटेश्वर नाथ, चम्पारण्य मं चम्पेश्वर नाथ, बम्हनी मं बम्हनेश्वर, फिंगेश्वर में फणिकेश्वर नाथ, कोपरा मं कोपेश्वर नाथ हे। इही ल पंचकोशी धाम के नाम से जानथे। संग मं ये नगरी ल कमल क्षेत्र, पदमावती पुरी, राजीवनगर, छोटाकासी, देवपुरी, बद्रीतीर्थ जइसन अब्बड़ अकन नाम लेके पुकारथें। ये कमलक्षेत्र के स्वामी राजिम लोचन आय, साक्छात् में भगवान विष्णु हरे। नदिया के कोर मं बड़ेचजान मंदिर हाबे जिंहा ये बइठे हे। सोचे के लइक गोठ ये ह कि सोढूंर, पैरी, महानदी के बीच मं पंचमुखी कुलेश्वर नाथ के ज्योर्तिलिंग इस्थापित हे। जनश्रुति हे कि त्रेतायुग मं बनवास के समय म राम लक्ष्मण संग सीता माई ह ब्रह्मज्ञानी लोमश ऋषि के दर्शन बर इहां आय रहिस हे। रतिहा रूकीन अउ बिहनचे ले सीता माई ह नदिया मं नहा के अपन देवता के पूजा करे बर हनुमान ल कहिस जा बेटा तेहा कासी ले शिवलिंग लाबे मेंहा पूजा करहूं। हनुमान जी के आय मं देरी होवत रहिस त सीता मइया ह खुद अपन हाथ से रेती के शिवलिंग बना के पूजा कर डारिस। हनुमान ह दुरिहा ले देख के कथे, कइसे माता मोला भेज के तेंहा शिवलिंग के पूजा कर डरेस, अब मेंहा येला कहां रखों, सती मइया कहिस, हनुमान ते जिंहा हस उही मेर येकर स्थापना कर दे, बाद मं वो शिवलिंग ह पटेश्वर नाथ के नाम से जाने गिस। सीता मइया के हाथ से बनाय शिवलिंग ह कुलेश्वर नाथ के नाम से प्रसिद्ध होइस। येकर उपास अऊ पूजा पाठ करे से मन के सबो मुराद ह पूरा हो जथे। पहली जमाना के इहां अब्बड़ अकन मंदिर हाबे। जेमा उत्कृष्ट कलाकारी के नमूना दिखाय गे हे। अइसने ये छेत्र के अड़बड़ महिमा हे। जेकर पार कोन्हो नई पाय। सुनके बुधयारिन ह गद्गद् हो जथे अउ कथे तहूं ह कुछु बता न रे भोकवा संतोष तोला हांसेच बर आथे धुन अऊ कुछु?” सन्तोष ह चेथी खजवावत अच्छा फांस देस मौसी कहात गोठियाथे- ”राजिम कुंभ मेला सचमुच मं पुण्य देने वाला हरे, पुन्नी नहाय बर, महाशिवरातरी मे शाही स्नान करे बर अड़बड़ मनखे सकलाथे, देवधामी के दरश करथे, अऊ अपन भाग ल सहराहथे। फेर ये परयाग नगरी मं अपन पितर के मोक्ष बर बारह महीना इहां भीड़ लगे रथे। अब काशी मथुरा जाय के जरूरत नइए। राजिम ह सबले बड़े तीरथ धाम बन गेहे। उही बेरा दुकालू ह गाड़ी बइला फांद के आथे, तेमा ओकर परिवार के मनखे मन बइठे हें, देख के बिसम्भर ह पूछथे- का बात ये दुकालू, जम्मो परिवार ल कोन्हो गांव घूमाय बर लेगत हस का, कहूं जगा बर बिहाव होत हे का। मने मन म मगन दुकालू ह कथे बर बिहाव तो नहीं भइया फेर मेंहा ओकर ले बड़े खुशी के जगा लेगत हावंव अऊ वो हा राजिम कुंभ मेला आय, चल जाबो का। आस्था परमपरा अऊ बिश्वास के राजिम कुंभ भारत के पंचम कुंभ हरे। जेमा छत्तीसगढ़िया संग जम्मो देश बिदेश के मनखे मन आके अपन श्रद्धा भावना ल समर्पित करथे।
संतोष कुमार सोनकर ‘मंडल’
चौबेबांधा, राजिम

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