चित्रगुप्त के इस्तीफा

यमराज – मिरतू के देवता
चित्रगुप्त – यमराज के मुकरदम, जीव मन के पाप-पुण्य के हिसाब रखईया
यमदूत – यमराज के दूत
एक आत्मा – टेस्ट-ट्यूब बेबी के आत्मा
दूसरा आत्मा – कोख किराया लेके पैदा होये मनखे के आत्मा
तीसर आत्मा – क्लोन के आत्मा
ब्रम्हा, विष्नु, महेष –  त्रिदेव
( यमलोक म यमराज के राज-दरबार म यमराज अउ चित्रगुप्त गोठियात हें )

यमराज – इस्तीफा ?
चित्रगुप्त – हाँ महराज मोर इस्तीफा।
यमराज – इस्तीफा ! ये इस्तीफा काये चित्रगुप्त ?
चित्रगुप्त – इस्तीफा, इस्तीफा होथे महराज।
यमराज फेर येला तो मैं पहली घंव सुनत हँव चित्रगुप्त। येला तैं कहाँ ले पागेच अउ येकर का अरथ होथे, तेनो ल तो बता ?
चित्रगुप्त – महराज जब कोनो ल ककरो इहाँ नौकरी नइ करना रहय त अइसने लिख के दे जाथे, तेन ल इस्तीफा कहिथे, ये हर मिरतू लोक के शब्द ये महराज।
यमराज – हमर इहाँ ये इस्तीफा-फिस्तीफा ह नइ चलय चित्रगुप्त तोला बुता तो करेच ल परही नइते मैं तोर बुता बना देहूँ।
चित्रगुप्त – मैं ह आप मन संग अतेक दिन ले अड़बड़ मिहनत अउ ईमानदारी ले बुता करत आत हँव फेर अब मोला अइसे लागत हे, के मोर हिसाब-किताब ल ये मनखे मन गलत करवाके मोर फजीहत करवा दिही।
यमराज – का होगे तेमा ?
चित्रगुप्त – काय नइ होये महराज ?
यमराज – काय नइ होये ये ?
चित्रगुप्त– बहुत कुछ होगे महराज।
यमराज – देख चित्रगुप्त तैं ह तो जानत हस तोर बिन मोर काम नइ चलय। मोला अइसे लागत हे सरलग अतेक दिन ले अतेक जादा बुता करत-करत बुता के बोझा म चपका के तोर चेत-बुध हरागे, बइहा-बरन कस तोर हाल होगे हे। तिही पाय के आँय-बाँय गोठियावत हस। थोकन अपन दिमाग ल ठंडा रख अउ सोझ-सोझ गोठिया नइते कहूँ मोर सुर बदल जाही त एकाद गदा ठठा देहूँ।
चित्रगुप्त – ठठाबे ते ठठा ले महराज फेर मैं अब ये बुता ले हक खा गे हँव।
यमराज – ये चित्रगुप्त तैं ह एक ठन नवा चरित्तर ल नइ देखत अस का ?
चित्रगुप्त – मैं ह कई ठन चरित्तर ल देखत हँव तेकरे सेती तो इस्तीफा देत हौं। फेर आप-मन कोन चरित्तर के गोठ करत हव ?
यमराज – ये जमदूत मन कइसे बाबू-पिला के आत्मा ल जादा धर के लानत हें अउ माइलोगिन मन के आत्मा ल कमती लानत हें ?
चित्रगुप्त – आजकल पिरथी म माइलोगिन मन के संख्या कमती होवत जात हे तेकर सेती कमती लानत हे।
यमराज – कमती काबर होवत हें ?
चित्रगुप्त – वो का हे महराज मनखे मन अइसना मषीन बना डारे हें के पेटे भीतरी ले जान डारथें लइका ह नोनी ये धन बाबू। नोनी होइस तहान ले अब्बड़ झन मन वोला पेटे भीतरी मरवा देथें।
यमराज – ओ हो ! ये तो बिलकुल गलत होत हे। अइसना करइया ल तो कड़ा से कड़ा सजा मिलना चाही। हमर कानून म येकर बर का सजा हे ?
चित्रगुप्त – अइसना कानून तो नइये महराज पहली अइसना नइ होवत रहिस, होय घलो हे त वो केस ल भगवान खुदे देखे हे। परीक्षित ल मारे बर अष्वत्थामा ह कोषिष करे रहिस तेकर सजा भगवान श्रीकृष्ण जी ह खुदे दे रहिस। वोकर माथा के सार चीज बुद्धिरूपी मणि ल सइघो बाहिर निकाल ले रहिस अउ तउने बेरा ले वोकर तन म कुछ नइ रहिगे, जीव भर के छोड़े।
यमराज – येकर बर नवा कानून बनवाये ल परही।
चित्रगुप्त – सही बात ये महराज।
यमराज – अवइया आत्मा मन म एक ठन बात अउ देखे म आवत हावय के आजकल छोकरी मन के आत्मा जादा आवत हे, डोकरी-ढाकरी मन के आत्मा ह कमती आवत हे अइसना काबर होवत हे चित्रगुप्त ?
चित्रगुप्त – दाईज महराज दाईज।
यमराज – दाईज के मरई ले का लेना-देना हे ?
चित्रगुप्त – दाईज के तो लेना-देना हे महराज। कमती दाइज लाथे त ससुरार के मन बहू ल कइसनो करके मरे बर मजबूर कर देथें। अपन होके नइ मरय त बरपेली माटी तेल डार के जला के, नइते फाँसी म अरो के मार देथें महराज। तइहा घलो तो कहयँ भागमानी के पत्तो मरथे, तेने ल करत हें।
यमराज – पहली तो अइसना नइ होवत रहिस चित्रगुप्त, ये मनखे मन का-का करे बर धर ले हें ?
चित्रगुप्त – कलजुग नोहय महराज, मनखे जेन कर दय कमतीच हे।
यमराज – सिरतोन ए।
चित्रगुप्त – महराज एक ठन अउ गड़बड़ी होवत हे।
यमराज – तैं आज गड़बड़ी के छोड़ अउ काँही नइ सुना सकस चित्रगुप्त ?
चित्रगुप्त – अइसे हे न महराज गड़बड़ी ल तो बतायेच ल परही। नइते पाछू आपे मन काबर नइ बताये कहिके बद्दी देहू।
यमराज – ले भई बता डार।
चित्रगुप्त – यमदूत मन जेन आत्मा मन ल धरके लानत हे उँकर मिलान करे म कई झन तो उँकर लेखा-जोखा ल सुनाबे त सोझ कहि देथे ये सब गलत-सलत हे न तो हमर ये नाव रहिस जेन कहत हव न वइसना करम तो हम कभू करेन। नाव पता बताबे त कहिथें हम तो उहँा कभू रहिबे नइ करेंन जेन बतात हव सब गलत हे। यमलोक म तको भारी भ्रष्टाचार फैलगे हे तइसे लागथे कहिथें महराज। पता करे बर यमदूत मन मिरतू लोक जाथे त उँकर कहना सिरतोन म सही निकलत हे उहां उँकरे मुंहरन के वोकरेच हिस्सा के मनखे मिलत हें। यमदूत मन चक्कर म पर जाथे महराज येला धरवँ ते वोला धरवँ येला लेगवँ ते वोला कहिके। ये का होवत हे कँाही समझ म नइ आवत हे ? पहली तो कभू-कभू धोखा हो जात रहिस अब तो अति होगे हे।
यमराज – ये का कहत हस चित्रगुप्त ?
चित्रगुप्त – सिरतोन काहत हव महराज।
(बाहिर हल्ला-गुल्ला, नारा बाजी के आवाज होथे)
यमराज – ये बाहिर म कोन मन चिचियावत हें ?
चित्रगुप्त – बाहिर म आत्मा मन नारेबाजी करत हें महराज।
यमराज – वोमन ल बाहिर म कोन छोड़ के आये हे ?
चित्रगुप्त – वोमन ल कोनो नइ छोड़े ये महराज।
यमराज – कोनो नइ छोड़े ए ?
चित्रगुप्त – हाँ महराज।
यमराज – वोमन ल कोन ले के आये हे ?
चित्रगुप्त – वोमन ल कोनो नइ लाये हे, महराज।
यमराज – (चमक के) का कहे वोमन ल कोनो नइ लाये हे, त फेर वोमन इहाँ कइसे आगे ? का तमाषा ए रे।
चित्रगुप्त – वोमन अपने-अपन आगे हें महराज।
यमराज – बिन यमदूत के लाने ये मन अपने-अपन कइसे आ सकथें ?
चित्रगुप्त – कइसे आ सकथें नहीं महराज आ गे हें।
(बाहिर म फेर हल्ला-गुल्ला होथे)
यमराज – वोमन ला भीतरी म लानव अउ उँकर पुण्य-पाप के लेखा-जोखा पढ़के सुनाव।
चित्रगुप्त – इही ह तो हलाकानी के कारण ये महराज येकरे सेती तो मैं ह इस्तीफा देहूँ काहत हँव।
यमराज – फेर तोर इस्तीफा के गोठ आगे न, छोड़ येला अउ बता इंकर लेखा-जोखा ल काबर नइ सुना सकस ?
चित्रगुप्त – हमर सो इंकर लेखा-जोखा ह नइये महराज।
यमराज – अइसे कइसे हो सकत हे के कोनो परानी के पाप-पुण्य के लेखा-जोखा हमर सो नइ रहय ? ये मन पैदा कइसे होगे ? अतका बाढ़ के मर घलो गय अउ अपने-अपन इहाँ तक आ गे। तैं अपन बुता म ढेरियास ल धर ले हस तइसे लागथे चित्रगुप्त अइसना कइसे होगे ?
चित्रगुप्त – होगे भई होगे। कइसे होगे तेन ल मैं हर का जानव। मैं ह तो अतके ल जानत हँव ब्रम्हाजी के डिपार्टमेंट ले इंकर काँहीं विवरण नइ आये हे।
यमराज – ब्रम्हाजी ल चिट्ठी लिखके पूछ बिन बताय ये काय करे ल धर ले हें ? एक तो पहली ले आनी-बानी के, रंग-रंग के जीव-जन्तु बनाके सबके हिसाब-किताब रखे बर कहिके हमन ला वइसनेच्च हक्क खवा डारे हे, तेमा ये उपराहा ले अब नवा जीव मन के जानकारी घलो नइ भेजत हें।
(चित्रगुप्त ह चिट्ठी लिख के पठोथे थोकिन देरी वोकर जुवाब आ जाथे)
चित्रगुप्त – महराज ये दे चिट्टी के जुवाब आगे। उँकर कहना हे जेतका जीव बनाय जाथे एक-एक के हिसाब भेज दे गे हे हमन मिलान कर डारे हन।
यमराज – त ये बुजा मन कहाँ ले आ गे चित्रगुप्त ?
चित्रगुप्त – कभू-कभू भगवान बिस्नू अउ भोले बबा तको तो जीव रच देथें फेर वोकर जानकारी ल तो खच्चित पठो देथें। फेर ये बुजेरी मन बिना लेखा-जोखा के इहाँ कइसे आ गे समझे म नइ आवत हे ?
यमराज – जल्दी पता लगवा तो येमन कोन ये ? कहाँ ले आये हें ? कइसे आयें हें तेन ला ?
चित्रगुप्त – का पता लगवाना येला तो मही हर पता लगाये बर जात हँव। पायलागी महराज।
यमराज – जल्दी जाके पता कर भई।
(चित्रगुप्त के जाना। द्वारपाल ह यमलोक के छोटे कपाट ल खोलथे वोमा ले चित्रगुप्त ह बाहिर निकलथे। बाहिर म आत्मा मन धरना दे हें अउ नाराबाजी करत हें। चित्रगुप्त ल देख के चुप हो जाथें।)
आत्मामन – कपाट ल हेरवा अउ हमूमन ल जल्दी भीतरी म लेग। बाहिर म बइठे-बइठे हमन असकटा गेंन।
चित्रगुप्त – तुँहरेच चक्कर म तो परे हँव ददा हो। तुमन तो मोर दिमाग के बारा बजा डारे हव। कहाँ-कहाँ ले आगे हावव ? कोन तुमन ला इहाँ लाये हे ते ?
एक आत्मा – हमन मिरतू लोक ले आये हन महराज। अउ हमन ल कोनो नइ लाये हे हमन अपने-अपन आये हन।
चित्रगुप्त – अपने-अपन आयके शक्ति कइसे आगे ? अकाल मिरतू ये का ?
दूसर आत्मा – हौ महराज।
चित्रगुप्त – तुमन मे बतावत हमर यमदूत के बिन लाने काबर आगेव ?
तीसर आत्मा – हमन तो उहाँ मरगे रहेन फेर देखेन आपमन के यमदूत मन हमन ला नइ लेगत ये त का करतेन हमन जुरिया के उँकरे पाछू-पाछू आगेन। अब हमन ला भीतरी म नइ खुसरन देत रहिन त का करतेन। नारा लगा के जगावत रहेन।
चित्रगुप्त – कलेचुप भीतरी चलव अउ अपन नाव पता अउ जनम स्थान ल एक-एक करेक बताहव। द्वारपाल मन मोला तुँहर बारे म बताये रहिन फेर तुँहर काँहीं विवरण नइये ते पायके मे ह बने ढंग ले तुँहर मन के जाँच करके देख हँव। एक-एक करके ये मेर आहू अउ ढलंगत जाहू। बाँचे मन हल्ला झन करहू।
(सब झन ला एक-एक करके बताए जघा म सुताके अपन ह धियान लगाके आगू म बइठे राहय बीच-बीच म छू-टमड़ के देखत जाथे। फेर मुड़ी ह सब झन के दरी नहीच म हालत जाथे। आखरी म उठके बइठगे अउ अपने-अपन बड़बड़ाय बर धर लीस।)
चित्रगुप्त – (अपने-अपन) – अतेक झन ल जाँच कर डारेंव फेर ककरो काँहीं लेखा-जोखा नइ मिलीस। अउ ते अउ ब्रम्हाजी के टेªडमार्क घलो इंकर माथा म नइये। अउ न कोनो देवी-देवता के घलो टेªडमार्क दिखत हे। येकर मतलब हे के इनला न तो ब्रम्हाजी बनाय हे अउ न कोनो आन देवी-देवता मन बनाये हें। त येमन ला बनाय तो बनाये कोन होही ? इंकरे सो पूछ लँव कहूँ कोनो जानत होही ते।
चित्रगुप्त – तुमन के जाँच करके देख डारेंव फेर तुमन कहाँ के मेड इन अव तेन ल नइ जान पायेंव। तुमन कहाँ कइसे पैदा होय हव काँहीं पता हे त बतावव ?
एक आत्मा – इंकर ल तो मैं हर नइ जानव फेर मोर दाई ह बताये रहिस मैं हर परयोगषाला म पैदा होय रहेंव टेस्ट ट्यूब बेबी अव। मोर जनम ह भगवान के संजोग ले नहीं बिज्ञानिक मनके दिमाग ले होये रहिस।
दूसर आत्मा – ‘‘हमला तो हमर दाई-ददा मन कोख किराया लेके डाॅक्टर मनके दिमाग अउ मिहनत ले पैदा करवाय रहिस।’’
तीसर आत्मा – मैं हर तो अपन दाई के शरीर के कोषिका ले पैदा करे गे हँव। मैं हर अकेल्ला नहीं मोरेच कस दस झन बनाये गे हे, हमन सब्बो झन एक्केच बरन दिखथन हमन ला क्लोन कहिथें।
(चित्रगुप्त मुड़धर के भीतरी खुसरथे अउ राज-दरबार म जाके यमराज ल जाके बताथे)
चित्रगुप्त – ये मनखे मन भारी लाहो ले बर धर ले हें। येमन जम्मो नियम ल उलट-पलट करत हें महराज।
यमराज – का नियम ल उलट-पलट करत हें ?
चित्रगुप्त – ब्रम्हाजी जीव नइ बनाना चाहत हें उहाँ येमन जीव बनावत हें। ब्रम्हाजी ह एक ठन जीव बनाके मिरतू लोक म भेजत हें त ये मनखे मन तो वोकर ले पता नहीं के ठन बनात हें महराज। इही पायके मोर हिसाब-किताब ह मिले ल नइ धरत रहिस अब समझ म बात ह आइस।
यमराज – तइहा मनखे मन जादा गड़बड़ नइ करत रहिन। कोनो-कोनो रिसी-मुनि मन भर कभू-कभू अइसनहा करय उँकर सो अइसना करे के शक्ति रहिस। फेर आज तो मनखे जेन मन म आत हे करत हें।
चित्रगुप्त – सिरतोन कहेव महराज येकरे सेती तो मैं ह इस्तीफा देहूँ काहत हँव।
यमराज – तोर गोठ ल सुन-सुन के मोर दिमाग ह घूमे ल धर ले हे अउ तैं ह घूम-फिरके भइगे इस्तीफा के रटन धरे हस। ये मनखे मनला जेन करना चाही तेन ला करय नहीं अउ येती-तेती के जम्मो लंदर-फंदर म परे रहिथें।
चित्रगुप्त – बने काहत हव महराज।
यमराज – फेर मनखे के दिमाग ल माने बर परही चित्रगुप्त। काय-काय नइ गुनत रहय, काय-काय नइ करत रहय। वो तो बने होथे के बीच-बीच म परलय मचा के दुनिया के शुरूआत फेर से करे के रिवाज बनगे हे नइते येमन तो हमर संगे संग ब्रम्हाजी ल घलो सोज्झे रेंगा देतिन।
चित्रगुप्त – येकर काहीं उपाय खोजे बर परही महराज।
यमराज – उपाय तो खोजेच बर परही फेर ये हमर हाथ-बात थोरे ए। ब्रम्हाजी सो खबर पठो तो बड़ भारी समस्या आगे हे तुरतेताही सबो देवी-देवता के मिटिंग रखना हे।
(ब्रम्हा, बिस्नू, महादेव अउ जम्मो देवी-देवता मन जुरियाये हें। यमराज सबो झन ला अपन अभी के अउ अवइया नवा समस्या ल उँकर आगू रख डारे हें। उँकर बीच सोच-विचार चलत हे का फैसला ले जाही ये तो अवइया समय ह बताही।)

नरेन्द्र वर्मा
सुभाष वार्ड, भाटापारा
जिला – रायपुर (छत्तीसगढ़)
पि. को. – 493118
मो. नं. 94255-18050

Related posts:

13 comments

  • बहुत बढ़िया .. मज़ेदार है. इसका मंचन मस्त होगा.

  • वहाद्दे!
    मजा आगे गा गऊकिन।
    ये ला मंच मा कब लावत हव फेर?
    देखे म तो अऊ मजा आ जही।

  • Jabardast he.Chha jahi ye to..

    Narendra Bhai ye to kamal ka lekhan hai,
    Sanjeev Bhai aisan koi bhi sankalan la hamar tak pahuchat raihu aise mor kamna he,Bahut Bahut Danyavad he aapla…..

    Vinay Tiwari
    Raipur

  • नरेन्द्र वर्मा जी,
    बहुत ही खांटी नाटक लिखे हा… विषय के चुनाव भी हर बहूत सही हे… औ लेखन शैली हर तो सबसे बढ़िया हे… पाठक ला बंधे के कला बहूत बढ़िया आते आप मन ला… अतका सुंदर नाटक हमर भाषा मा लिखे के खातिर आप मन ला कोटि कोटि धन्यवाद

  • बड सुग्घर परसतूती हवय,

  • vikram verma

    भारी निक लागिस हे

  • varsha thakur

    नरेन्द्र भाई, बड़ सुघ्घर लगीस ,दिल बाग -बगईचा होगे। अब तक तो देवी -देवता मन फैसला ले लीन होही। काय होइस थोरकुन जल्दी बताहू। फैसला के अगोरा में। …………।

    • Narendra Verma

      वर्षा ठाकुर जी — चित्रगुप्त के इस्तीफा बने लागीस येकर बर आप मन ला धन्यवाद । देवी—देवता मन के फैसला का होही , ये तो मैं पाठक मन बर प्रश्न के रूप म छोड़े रहेंव । पाठक मन ही येकर फैसला करयँ त मोला अच्छा लागही ।

  • ramesh kumar verma

    ChitraGupta ke stiff bar nil lagis badhai

  • Narendra Verma

    रमेश भाई चित्रगुप्त के इस्तीफा आप मन ला बने लागीस येकर बर धन्यवाद ।

  • ओमप्रकाश चन्देल

    नरेन्द्र जी बहुत बढिया नाटक लिखे हावव, खासकर के जेन माईलोगन के आत्मा के विष्लेषण आप करे हव बहुत ही शिछा परद हे आपल बहुत बहुत बधाई, अ उ अतका सुग्घर नाटक पढे बर मिलिस आपके द्वारा तेकर बार आपके धन्यवाद भैय्या

  • शकुन्तला शर्मा

    भारी मरना हो गय हे यम – भाई के , कइसे अपन कर्तव्य के पालन करय ?
    वोकर बारे म कहूँ नइ सोंचयँ । कतका जंजाल म परे हे बिचारा हर ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *