छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल सुरूज ला ढि़बरी देखाए देबे अउ मर जवान, मर किसान

सुरूज ला ढि़बरी देखाए देबे

करबे करम तो कमाये देबे,
बारी म बीहन जगाए देबे।
बदरी ले पानी उतर आही,
जंगल म बंसी बजाए देबे।
गंगा जल गांव म छींच देबे,
दुखला रमायन सुनाये देबे।
धुंधरा म हपट उपट जाही,
सुरूज ला ढि़बरी देखाए देबे।

शायरे शहर यादव ‘विकास’
ब्रम्‍हपथ, अम्बिकापुर, छ.ग.

मर जवान, मर किसान

ए देस के बिधान अलग हे, अतकेच ल जान गा।
चोरहा ल चोरहा झन कहिबे, कहिना ल मोर मान गा।
चाकू – छुरा के अनठी धरे, लईका मन बाढ़त हवे।
का अचरज करथन संगी, लेवत हे जौन प्राण गा।
रोजेच सुनथन रेडुआ मं, लोकतंत्र के महिमा ला।
कोरी कोरी घपला होथे, किरा नी रेंगे कान गा।
अपनेच घर ले दुसमन ल, खेदे हमन सकन नहीं।
दुनिया के आघू मं कतका, खुदेच बनबो महान गा।
देवता असन नेता हा, नारा एक ठन देहे रिहिस।
ओ बदल के आज होगे, मर जवान मर किसान गा।
चारों डहार अंधियारी घपटे, बईठे मनखे डराय, सप्टे।
कब आबे तें सुरुज देवता, लाबे नवा बिहान गा।
हमर संगी रोज मरथे, ओखर मन के कोठी भरथे।
अईसन गोठ ल टार ‘हबीब’, चल खाए बार पान गा।

एस.एम. हबीब

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