छत्तीसगढ़ी व्याकरण के 125 बछर

जे मन आज घलोक छत्तीसगढ़ी ल संवैधानिक रूप ले भाखा के दरजा पाए के रद्दा म खंचका-डिपरा बनावत रहिथें, उंकर जानकारी खातिर ये बताना जरूरी होगे हवय के ए बछर ह छत्तीसगढ़ी व्याकरण बने के 125 वां बछर आय। आज ले ठउका 125 बछर पहिली हीरालाल चन्द्रनाहू “काव्योपाध्याय” ह सन् 1885 म छत्तीसगढ़ी ब्याकरण ल लिखित रूप म एक किताब के रूप दिए रिहीसे, जेला सन् 1890 म अंगरेजी भाखा के बड़का व्याकरणाचार्य सर जार्ज ग्रियर्सन ह अंगरेजी अनुवाद कर के छत्तीसगढ़ी-अंगरेजी के शमिलहा छपवाए रिहीसे। हीरालाल चन्द्रनाहू जी ल बंगाल सरकार द्वारा वो बखत उंकर भाखा अउ संगीत के क्षेत्र म विशेष योगदान खातिर “काव्योपाध्याय” के उपाधि घलोक दिए गे रिहीसे।
सर जार्ज ग्रियर्सन ह छत्तीसगढ़ी व्याकरण के बड़ाई करत अपन टिप्पणी म लिखे रिहीसे- ‘भारतीय भाषा मनला जाने-समझे खातिर छत्तीसगढ़ी व्याकरण ह एक अच्छा माध्यम साबित होही।’ निश्चित रूप ले ए ह हर छत्तीसगढ़ी भाषी मनखे मन बर गरब के बात आय काबर ते वो समय तक हिन्दी सहित कोनो भी हिन्दी नित भाखा मनके प्रकाशित रूप म व्याकरण नइ आए रिहीसे। आजादी के आन्दोलन के समय जब देश ल एक स�पर्क भाखा के जरूरत होइस त खड़ी बोली म जोड़-तोड़ अउ सुधार कर के एक नया रूप दे गेइस, जेला हिन्दी के नांव म आज जानथन। फेर एकरो व्याकरण ह सन् 1921 म बनीस। माने छत्तीसगढ़ी ले कतकों के पाछू।
आज छत्तीसगढ़ राज बने के बाद इहां के सरकार ह छत्तीसगढ़ी ल राजभाषा के दरजा दे के राजभाषा आयोग के गठन कर दिए हे, तेकर सेती छत्तीसगढ़ी के संबंध म कुछ जादाच चर्चा होए ले धर लिए हे। अउ ये चर्चा म कुछ अइसन मनखे मन घलोक झपाय परत हें, जे मन ल अभी एकर कई किसम के व्यावहारिक जानकारी नइ हो पाए हे। वोकरे सेती कभू ए मन मानकीरण के बात करथें, कभू व्याकरण के, बात करथें, त कभू लिपि के बात करथें।
अइसन मनखे मनला संक्षेप म अतके बता देना जरूरी लागथे के छत्तीसगढ़ी के सब कुछ हावय। सन् 1885 म लिखे हीरालाल चन्द्रनाहू ‘काव्योपाध्यायÓ ले के आज के डॉ. चन्द्रकुमार चन्द्राकर के लिखे व्याकरण तक करीब सात-आठ लेखक मनके, शब्दकोश के घलोक इही स्थिति हे, कतकों लेखक मन के संयुक्त प्रयास ले भाषिका प्रकाशन, वैभव प्रकाशन के संगे संग छत्तीसगढ़ शासन के शिक्षा विभाग डहर ले घलोक एकर प्रकाशन हो चुके हे। जिहां तक लिपि के बात हे त छत्तीसगढ़ी के मूल लिपि ल पहिली श्रीहर्ष लिपि कहे जाय, जेला आज घलोक कतकों जुन्ना मंदिर के शिला लेख म देखे जा सकथे। वइसे भाखा के मान्यता खातिर लिपि के अनिवार्यता नइहे। हिन्दी, संस्कृत, मराठी, अंगरेजी जइसने कतकों भाखा के अपन खुद के लिपि नइहे। अइसने छत्तीसगढ़ी घलोक ल अभी नागरी लिपि म लिखे जाथे। ए अच्छा घलो आय काबर ते आज नागरी लिपि ल पूरा दुनिया म समझे जाथे, एकर ले ए फायदा के बात आय के नागरी लिपि के सेती छत्तीसगढ़ी ल घलोक पूरा दुनिया म आसानी के साथ पढ़ लिए जाही।
कतकों मनखे छत्तीसगढ़ी के मानकीकरण के बात करथें, त मोला एहर फोकटइहा के गोठ बरोबर लागथे काबर ते सबसे पहिली बात तो ए हवय के इहां के जुन्ना भाषाविद् मन एकर ऊपर कतकों पइत चर्चा कर डारे हें, अउ रायपुर-दुरुग म बोले जाने वाला छत्तीसगढ़ी ल मानक रूप म स्वीकार कर डरे हें। तभो ले महूं ल एमा थोक-मोक गोठियाये के मन होवत हवय। काबर ते मैं चाहथौं के एला एक निश्चित खांचा म बांध-छांद के झन रखे जाय, अभी नंदिया के धारा बरोबर हरहिंच्छा बोहावन दिए जाय। जेन क्षेत्र म जइसन बोले जाथे वो क्षेत्र ले वइसने लिखके आवन दे जाय। धीरे-धीरे जब सब झन एक-दूसर ल पढ़हीं, त सबो वोमा के अच्छा-अच्छा रूप ल धरत जाहीं, तहां ले मानकीकृत भाखा खुदे बन जाही।
वइसे भी हमर इहां कहावत हे- “कोस-कोस म पानी बदलय, चार कोस म बानी।” ए बात सही आय, तभे तो आज घलोक हिन्दी ल दिल्ली म बोले के तरीका आने हे, त हैदराबाद म आने, मुंबई म आने हवय त कोलकाता म आने। भाखा के निरंतरता ल कोनो किसम के छेंका डार के रोके झन जाय, जइसे बोहावत पानी ल रूंध के छेंक दिए जाथे त वो सर-गल जाथे, तइसने कस भाखा घलोक हो जाही।
सुशील भोले

सहायक संपादक – इतवारी अखबार
41191, डॉ. बघेल गली
संजय नगर, टिकरापारा, रायपुर

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