छत्तीसगढ़ मं बिहाव के रीति-रिवाज

छत्तीसगढ़ के रीति-रिवाज ह खोज अउ शोध के बिसे आय। काबर कि इहां के जम्मो संस्कृति ह कृषि संस्कृति ले गुंथाय हे। यहू बात के परमान मिलथे कि इहां के कतको संस्कृति, रीति-रिवाज ह रामायण अउ महाभारत काल ले जुड़े हे।
कतको रीति-रिवाज अउ परम्परा जउन ह जनम ले लेके मरन तक गुंथाय हे वोमा सब ले बड़े हे बर-बिहाव। जिनगी के गाड़ी ल चलाय बर नर अउ नारी दूनो के होना जरूरी हे। नर-नारी के रूप म जिनगी भर एक बंधना म बंधाय के पक्का बंधना होथे बिहाव।
ये बिहाव के बंधना म बंधाय बर हमर छत्तीसगढ़ म अलग-अलग जात, समाज म अलग-अलग रीति-रिवाज के चलन हे। सबो जात समाज म बिहाव के समे दूल्हा अउ दुलहिन बर ढेंड़हा अउ ढेंड़हीन राखे के प्रथा हे। दूल्हा बर ढेंड़हा ढेंड़हिन दूल्हा कोती ले अउ दुलहिन बर दुलहिन कोती ले राखे जाथे। ढेंड़हा-ढेंड़हिन के काम बर जादा करके दूल्हा दुलहिन के फुफु-फूफा या फेर दीदी-भांटो मन ल नेमे जाथे। हमर छत्तीसगढ़ म बिहाव के कतको परकार हे, जइसे ठिका बिहाव, बड़े बिहाव, मंझली बिहाव, बरेंडी बिहाव अउ अब तो आदर्श बिहाव के चलन घलो होगे हे। पहिली ठिका बिहाव जादा होय, जेमा दूल्हा हा बिना मऊर बांधे बरात जाय अउ दुलहिन ल सगई करके अपन घर ले आनय तेकर पाछू हरदी-तेल, लगिन, पानी गरहन, टिकावन के सबो नेंग जोग होय। ये सबो नेंग ह चार-पांच दिन म होय। जइसे एक दिन बरात, दूसर दिन तेल, तीसर दिन मैन, चौथा दिन लगिन टिकावन अउ पांचवा दिन दुलहिन ल वोकर मां-बाप ह अपन संग म धर के ले आनय। तेकर पाछू पिंयर धोवाय के नेंग पूरा करे बर दूल्हा ह दुलहिन के घर जाय। पहिली जमाना म लइकुसहा उम्मर म जादा बिहाव होय, ते पाय के गवन पठौनी के नेंग घलो चले। काबर कि दूल्हा-दुलहिन ह छोटे उम्मर के राहय तेकर सेती बिहाव बखत दुलहिन ल तुरते ससुरार नइ भेजयं। जब दू-चार साल म दूनो बाढ़ जातिन तब दूल्हा ह दुलहिन ल गवन पठौनी करा के लानय। अइसने मंझली बिहाव के परथा हे। येमा दूल्हा ह बरात लेके जाथे। दुलहिन घर ढेंड़हा-ढेंड़हिन मन सबो नेंग जोग ल पूरा करथे, लगिन टिकावन होथे अउ दुलहिन दूल्हा संग बरात ल बिदा कर देथे। बिहान दिन लड़की वाला मन चौथिया जाथे। लड़का घर धरम टिकावन के नेंग होथे। तेकर पाछू लड़की के दाई-ददा अउ जतका चौथिया जाय रथे ते मन लड़की ल ले के वापिस घर आ जथे। तेकर पाछू जइसे समें दिखथे तइसे लड़का ह लड़की घर जाथे अउ बिदा करा के अपन घर लेलानथे।
अइसने किसम के बड़े बिहाव होथे। अब इही बड़े बिहाव के परथा ह जादा चलन म हे। येमा सब ले पहिली सगई के नेंग होथे। लड़का वाला मन लड़की के घर जाके सगई के नेंग ल पूरा कराथे। पहिली लड़का के परिवार वाला मन चार-पांच झन जाय अउ लड़की के घर सगई के नेंग करवा के आ जाय। अब तो जइसे बिहाव म बरात जाथे वोकरो ले जादा सगई म बरात जाए के चलन होगे हे। सगई म पंडित ह लड़का-लड़की दूनो के नाव, राशि, गोत्र अउ फेर बिहाव के दिन तिथि मुहुरत सबो के ऊपर बिचार करके बताथे। पहिली लड़का वाला मन लड़की ल कपडा लत्ता अउ चांदी के छोटे कुन मुंदरी पहिना के बंधना कर देय। जेला चिन्हा मुंदी के नेंग केहे जाय। अब तो लड़की बर कपड़ा लत्ता, सोन-चांदी के गहना जेवर अउ सबो सिंगार लेगे के चलन होगे हे। लड़की-लड़का मन एक-दूसर ल सोन के मुंदरी पहिराहीं अउ जयमाला डारहीं। अइसने ढंग के बिहाव के आधा काम हो जथे। सगई म अउ पइसा के खरचा घलो बहुत अकन होथे। सगई होय के बाद जउन तिथि बंधाय रथे तेकर मुताबिक बिहाव सुरु होथे। अपन-अपन जगा लड़की-लड़का के घर तेल मैन के नेंग होथे। तेकर पाछू दूल्हा ह मऊर बांध के बरात जाथे। लड़की घर लगिन, भांवर, पानी गरहन, टिकावन, साखोचार के सबो नेंग होथे। तेकर पाछू लड़की वाला मन दुलहिन दूल्हा अउ बरात ल बिदा कर देथें। पहिली करसा संग बिहाव होय के परथा घलो चलत रिहिस। लइकुसहा पन म बिहाव हो जाय ले पाछू लड़का के अल्पकाल कहूं मउत होगे तब बिहाव होय लड़की के जुग जोड़ी बनाय बर दूसर कुंवारा लड़का संग करसा बिहाव करे जाय। करसा ल साखी गवाही बना के बिहाव के सबो नेंग जोग ल पूरा करे अउ वो करसा ल बने जतन लगा के जिनगी भर राखे राहय। अइसने बरेंडी बिहाव- जउन लड़की नान्हेपन म बिहाव होगे अउ गवन पठौनी जाय के पहिली वोकर पति के अल्पकाल मउत होगे त अइसन म वो लड़की ह बरेंडी कहाय। बरेंडी लड़की के दूसरी जुग जोड़ी बेवस्था बर जउन परथा रिहिस तेकर मुताबिक लड़का वाला मन लड़की बर नवा कपड़ा लत्ता, चूरी-फुंदरी के सिंगार अउ अपन पूरत भर गहना जेवर धर के बरात के रूप म लड़की घर जाय अउ लड़की ल दुलहिन के सबो सिंगार करवा के ले लानय। आज घलो ये परथा ह कोनो-कोनो जगा चलन म हे। अइसने बिधवा बिहाव के परथा हे। जेला हमर छत्तीसगढ़ म चूरी पहिराई परथा केहे जाथे। ये हू म हाथ खाली होय बेवा लड़की बर नवा कपड़ा लत्ता, जेवर गहना लड़का वाला मन ले जाथे अउ मांग म सेंदूर भर के, हाथ में चूरी पहिरा के ले लानथे। एकर छोड़ उढ़रिया बिहाव, पैठू बिहाव के घलो चलन हे। फेर ये बिहाव ल समाज अउ परिवार ह स्वीकार नइ करे। एक परकार के ये हा परेम बिहाव आय। अपन जात समाज के होय या अलग-अलग जात समाज के होय, कोनो लड़की लड़का ह एक-दूसर ल चाहत हे, परेम करत हे तंहा ले कोनो जगा उढ़रिया भगा के चल देथे। अउ उही कोती मंदिर म या फेर कोट कचहरी म बिहाव कर लेथे। अइसने पैठू परथा म लड़की ह खुद लड़का घर चल देथे। तेला पैठू कूदना केहे जाथे। येती सामूहिक आदर्श बिहाव के परथा ह घलो अब खूब चलन म होगे हे। सरकार घलो अइसने बिहाव खातिर मदद करथे। कोनो जगा यज्ञ हवन या बड़का सभा सम्मेलन म सामूहिक आदर्श बिहाव होथे। उहां दूल्हा-दुलहिन ल धर के परिवार वाला मन जाथें अउ बिहाव के बंधना म बंधइया जतका दूल्हा-दुलहिन जाय रथें उंकर सबके एके संग पानी गरहन जयमाला के सबो नेंग जोग हो जथे।
हमर छत्तीसगढ़ म बिहाव के परथा परम्परा जुन्ना रीति-रिवाज अउ नेंग जोग के बिस्तार ह अब्बड अकन हे। वोमा के कतको ह अब नंदागे अउ नंदावत जात हे। अब तो बराती संग बैलगाड़ी अउ गंडवा बाजा-गाजा घला नइ दिखे। कार-मोटर, बैंड बाजा अउ डीजे के जमाना आ गेहे। कइसनो होय फेर ये बिहाव के काम ह सगा सोदर, नता-गोता, समाज-परिवार सबो ल एक जगा मिल भेंट करे के मउका देथे।
चिंताराम सिन्हा ‘सुजारी’

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