छत्तीसगढ़ी कहानी गीत विकलांग विमर्श म

शोभन – सिंहिका छंद –
सरगुजा मा हे बिसाहिन

सरगुजा – मा हे बिसाहिन, देख हे बिन – हाथ
फेर दायी संग गजहिन, भाग – बाचय – माथ ।
रोज मजदूरी – बजावय, मोगरा – सुख धाम
देख नोनी ला सिखोवय, पंथ के सत – नाम ।

देवदासा – गुरु – सिखोवय, पंथ के अन्दाज
रोज – दायी हर पठोवय, सफल होवय – काज ।
गोड मा सब काम करथे, हे – बहुत हुसियार
हासथे – गाथे मटकथे, मीठ – सुर – कुसियार ।

सुरुज ऊथे रोज बुडथे, दिन खियावत
रोज
देखते – देखत गुजरथे, देख ले अब – खोज ।
अब बिसाहिन नाचथे जब, नाचथे – सन्सार
बिधुन हावय नाच मा सब, छोड़ के घर – बार।

सुन बजाथे देख माण्दर, नाव हे बन – खार ।
मन मधुर मुरली मनोहर, बाजथे – सुकुमार।
बिकट – पैसा आत हावय, मोगरा – घर आज
बर बिहा के बात बाँधय, बाज – माण्दर बाज।

मोगरा हर बात कर लिस, माढ गइस – बिहाव
देख मडवा आज गड गिस,सब सुआसिन गाव।
आज खुश हावय बिसाहिन, नाचथे बन – खार
सरगुजा के मन नहाइन, आज बारम्बार ।




शोभन – सिंहिका छंद –
सुकमा म हे शकुन

सुकमा म मोर संगी हे, शकुन वोकर नाव
एकदम जुगल बंदी हे, दुनो झन सहिनाव ।
वो बपरी हर हे खोरी, हावय – होशियार
हे दया – मया के डोरी, देवारी – तिहार ।

भाई सरहद के पहरी, मनाही – दुइज तिहार
हम दुनो बइठे डेहरी, देखत – हन दुवार ।
” सुन खीर बनाबे बहिनी, मोला अति मिठाय
अथान के देबे बरनी, करण हर ललचाय ।”

छिन – छिन मा फोन करत हन, भाई गोठियाय
“मैं आवत हॅव झगरव झन”, वो बपरा मनाय ।
“सुन बरा बना के धरबे,” हास के बतियाय
“जा ना पहिली ले तरबे,” हँसी – बिकट आय ।

अब हो गे सबो तियारी, मन सुनय पद – चाप
धर – रे पूजा के थारी, खड़े हन चुप – चाप ।
फेर – फोन लगाएन हम , भाई नइ उठाय
देख दुनो झन हावन सम, फेर मन – भरमाय ।

फूल घला अइलावत हे, मन घला – मुरझाय
सूरज – बूडत जावत हे, भाई तै – पछुवाय ।
एदे जहाज आगिस अब, चल दिया अब बार
पूजा – थारी धर के सब,झन हो गिन तियार ।

देख कार मा आइन हे, हमर मन –  घबराय
भाई ला घर लानिन हे, अब मन अकबकाय ।
तिरंगा ला ओढे हवय, सुते हे – चुपचाप
भुखहा बिन खाए चल दिस, सुनत हॅव पदचाप ।

” तै रोबे झन ओ बहिनी, सूरज – ए – शहीद
सुन – सुन सूरज के कहनी, हम एकर – मुरीद ।
सौ झन दुश्मन ला मारिस, बढ़िया करिस – काम
मरते दम तक नइ हारिस, रइही – अमर – नाम ।”

अक्कल सबो सिरा गे रे, का करव – सहिनाव
तिलक – लगा पूजा कर रे, मन – मन मा पछताव ।
मरत तक दुश्मन ला धोय, हिम्मत ला समोय
मोर भाई अइसन होय, सब ला गरब होय ।




शोभन – सिंहिका छंद –
सरलग

कइसे खाबो पीबो रे, कोन दिही अनाज
कोशिश करके जीबो रे, करबो हमन काज ।
सहिनाव ला घर लानेव, करबो हमर काम
सौ – ठन बाँस मंगाएव, मिलही अब मुकाम ।

शबरी मन बने बताथे, सबो – बने तिखार
दायी हर अब समझाथे, मन म मनय तिहार ।
सूपा – टुकनी अब बनही, झन होवव उदास
सबके मन मा अब बसही, टुकनी हमर खास ।

धीरे – बानी काम चलिस, हमरे – मन न आय
तब मोर मन तुलना करिस, टुकनी खुद लजाय ।
देख अब बने बेचाथे , हमर सबो – समान
अब दुनिया भर मा जाथे, बने देथन ध्यान ।

जागर के जंग सरेखव, सुकमा ला निहार
आवव अब सब झन देखव, टुकनी के निखार ।
सहिनाव भले हे खोरी, मिलत हे सम्मान
आवव जी सबो अगोरी, झन करव अपमान ।

शकुन्तला शर्मा
भिलाई, छत्तीसगढ़

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