छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य अउ देशबन्धु

अभी-अभी जुलाई के देशबन्धु अपन स्वर्ण जयंती मनइस हावय। रायपुर के निरंजन धरमशाला म बहुत बडे आयोजन होईस। हमर मुख्य मंत्री डॉ. रमन सिंह अवइया पचास साल के बाद काय होही एखर ऊपर व्याख्यान दीस। व्याख्यान बहुत बढ़िया रहिस हे। छग के नहीं विश्व के बात होईस जब पूरा विश्व एक हो जही। बहुत अच्छा बात आय। छत्तीसगढ़ी भाषा के कोनो बात नई होईस। पचास साल में चालीस साल होगे देशबन्धु म छत्तीसढ़ी कॉलम आवत। सबले पहिली टिकेन्द्र नाथ टिकरिहा एक कॉलम छत्तीसगढ़ी म लिखत रहिन हे। ओखर बाद भूपेन्द्रनाथ टिकरिहा ह ये कॉलम ल आगू बढ़इस।

सन् 1974 म परमानंद वर्मा बी. काम. करे के बाद देशबन्धु म आइन। ये मन सन् 76 ले छत्तीसगढ़ी म लेखन चालू करिन। ये ह करीब 1 से डेढ़ कालम राहत रहिस हे। बाद म उनला ये कॉलम के रूप बदले के इच्छा होईस त ”बेरा बेरा के बात” के रूप म एक ले डेढ़ कॉलम लिखे ले लगगें। इहां विषय के स्वतंत्रता हावय। इही कारन ले रंग-रंग के गोठ छत्तीसगढ़ी म पढ़े बर मिलिस। ये ह हमर भाषा ल पोट्ठ करत गीस। उही समय म सत्येन्द्र गुमास्ता के ”चलते चलते”, हरिशंकर परसाई के ”सुनो भाई साधो”, ओम भारती ”एक तमाशा मेरे आगे” बहुत चर्चित कॉलम रहिस हे। ये सब कॉलम 1986 ले 1990 तक चलत रहिस हे।
एक दिन केयूर भूषण ह ललितजी अउ सुनील जी के आगू म एक सुझाव रखिन के ये छत्तीसगढ़ी कॉलम के जगह पूरा एक पेज छत्तीसगढ़ी के निकलना चाही। ये बात ल तुरंत मान ले गीस। तभे ललित जी ह पूछिस के येखर नाम काय रखना चाही। उही समय केयूर भूषण जी ह नाम बतइन ”मड़ई” अपन बात घलो रखिन के मड़ई काबर रखना चाही। केयूर भूषण जी कहिन ये ह इंहा के संस्कृति से संबंधित हावय। मड़ई ल एक मेला के रूप म घलो मनाय जाथे। ये नाम ले सब परिचित हावयं अउ मड़ई नाव रख दे गीस।
तब ले मड़ई आज तक सरलग निकलत हावय। अइसना कोनो छत्तीसगढ़िया साहित्यकार नईए जेखर रचना मड़ई म नई छपे हे। लक्ष्मण मस्तुरिहा ह समवेत शिखर म छत्तीसगढ़ी म लिखना चालू करीस। थोडेच्च दिन म बंद होगे। बाद म दैनिक भास्कर में माटी कहे कुम्हार से लिखत रहिन। वो ह बहुत जल्द बन्द होगे। देशबन्धु छत्तीसगढ़ी भाषा मं साहित्य प्रकाशन के सुरूआत करीस तेन ह आज चालीस साल ले चलत हावय। अउ बहुत अकन अब छोटे-छोटे अंक छत्तीसगढ़ी के निकलत हावय फेर मड़ई म छपना आज भी एक स्तर के बात समझे जाथे।
इंहा के मंच म कोई बंधन नइए, कोई कॉलम नइए। छत्तीसगढ़ी भाषा म हर विधा ह छपथे। पहिली रंगीन भी निकलत रहिस हे।
बडे-बडे रचनाकार के रचना ऐमा छपे हावय। टिकेन्द्रनाथ टिकरिहा, भूपेन्द्र टिकरिहा, केयूर भूषण, हरि ठाकुर, परदेशीराम वर्मा, डॉ. नरेन्द्रदेव वर्मा, श्यामलाल चतुर्वेदी, पातेश्वर शर्मा, रमेशचंद्र मल्होत्रा, बबन गुप्ता, डॉ. बल्देव, दानेश्वर शर्मा, लक्ष्मण मस्तूरिया, डॉ. सत्यभामा आड़िल अउ आज के हमर शिक्षा सचिव नन्दकुमार जी के रचना घलो छपे हावय। येखर अलावा आज के सभी रचनाकार के रचना छपे हावय, बिलासपुर, बस्तर, गरियाबंद, महासमुंद, धमतरी के रचनाकार तो जुडे हावयं, दूरिहा-दूरिहा गांव-गांव के रचनाकार घलो एखर ले जुडे हावय।
सन् 2002 तक परमान्द वर्मा मड़ई के संपादन करत रहिन हे। ओखर बाद से मैं ह मड़ई देखत हावंव। छग राज्य बने के बाद रचनाकार मन के एक पूरा आ गे हावय। मड़ई ह वो सब रचनाकार मन ल एक छिन बर अपन अंगना म जगह जरूर देय हावय। हर बिसय के लेख, कहिनी, कविता येमा छपत हावय। खास तौर से छत्तीसगढ़ी लेख बर जगह बहुत कम हावय। छतीसगढ़ी कहिनी तो बहुत छपथे। मड़ई ह अपन अंक म ये लेख ल लेखक के स्वतंत्रत विचार के संग छापथे।
अवइया पचास साल म का होही काहत हावंय त मैं ह कहि सकथंव के पचास ते नहीं फेर अवइया दस साल म ये ह छत्तीसगढ़ी भाषा के परचम विश्व म लहराही। आज ये पेपर ह इंटरनेट म जाथे। ये पेपर के मड़ई अंक ल अमेरिका म घलो हमर छत्तीसगढ़िया भाई-बहिनी मन पढ़थे। आज ये ह विश्व म पहुंच गे हावय। मड़ई ह छत्तीसगढ़ी लिखे बर सबला प्रेरणा दिस। आज जब पाती आथे त पता चलथे के कई झन मन मड़ई ल पढ़-पढ़ के गीतकार बनगे हावय, अउ धीरे-धीरे ऊंखर मन के कविता म सुधार आवत हावय। कई झन गीतकार मन कहानीकार बनगे हावय। हमर नेवता जेन बीच-बीच म जाथे ओला पढ़के कुछ न कुछ तो लिखबे करथें। एक मंच मिले के बाद हिम्मत ह बाढ़ जथे। उही काम आज देशबन्धु के मड़ई अंक ह करत हावय।
आज एक पेज के मड़ई आने वाला समय म एक पूरा पेपर के रूप ले सकथे। ‘मड़ई’ ह हमेशा छत्तीसगढ़ के पर्यटन, संस्कृति, लोक कहिनी, जनऊला, हाना ल छत्तीसगढ़ी भाषा म छापथे। येखर ले भाषा ह पोट्ठ होवत हावय। आज हमला अपन भाषा ल पोट्ठ करे के जरूरत हावय। छग के जानकारी ल अपन भाषा म छापे ले गांव-गांव के मनखे मन जेन ह हिन्दी बने ढंग ले नई समझय, फेर पढ़े-लिखे हावय तेन ह बने पढ़ के समझ जथे। गांव के मजदूर ले लेके एक शिक्षक तक एखर पाठक हावय। भोजराम वर्मा एक मिस्त्री आय मकान बनाए बर र्इंटा ले ईंटा जोड़थे, फेर मड़ई के पाठक हावय। अउ हिन्दी, छत्तीसगढी दूनो म देशबन्धु में ओखर रचना छपथे। मड़ई म कई ठन कहिनी, लोक कहिनी छपथे। मत मतांतर अउ आपके पत्र म घलो अपन विचार भेजथे। ईंटा के संग-संग शब्द ले शब्द जोड़ के सुग्घर शब्द संसार के रचना करत हावय। गुनीराम किराना दुकान म बइठे-बइठे पइसा के संग-संग सुग्घर गीत के रचना करत हांवय। हमर भाषा के कई ठन वेबसाइट खुले हावय। आने वाला समय म ये ह बहुत समृद्ध होही।

सुधा वर्मा

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