छत्तीसगढ़ी लोक कला के धुरी ‘नाचा’

‘जुन्ना समय अउ अब के नाचा म अब्बड़ फरक होगे हे। जुन्ना नाचा कलाकार मन रुपिया-पइसा के जगह मान सम्मान बर नाचयं गावयं। गरीबी लाचारी के पीरा भुलाके कला साधना म लगे राहयं, कला के संग जिययं अऊ मरयं। आज काल में नाचा म दिखावा जादा होथे कला साधना कमतियागे। फिलिम के गाना संग भद्दापन के चलन बाढ़गे। येकरे सेती शिक्षित लोगन मन नाचा ल हीन भावना ले देखे ले धरलिन। गांव म सहर के रिवाज परेतिन असन पिछिया गे हे। गांव के अपन रीति रिवाज, संस्कार, वेशभूषा सब बदले-बदले असन लागथे।”
”सोसन अनियांव कुरीति ल मरइया तमाचा
आंसू पीके हंसवइया, नोहै खनइया खांचा
लोक कला संस्कीरिति के चिन्हारी भांचा
कहिथै रात, रात भर जागे देखबो नाचा”
छत्तीसगढ़ ल धान के कटोरा कहिथें अउ शांति के टापू घलो कहे जाथे। छग महतारी के करमइता दुलरवा बेटा मन पहाड़ अस दु:ख ल छाती म लादे, आंसू पीके नाचा, गम्मत म अपन दु:ख भुलाय के परयास करथे। छत्तीसगढ़ के जतेक कलाकार हावैं सबो के आंखी म गरीबी बेकारी सोसन के पीरा परगट दिखथे। घर-परिवार बाल गोपाल मन ल एक जुवर के जेंवन बर घलो जोहे ल परथे। कभू सामान्तवादी, जमींदारी बेवस्था त कभू सुवारथी राजनीति के घानी म पेरावत रथे। धन बिसाल हिरदे ये लोगन के, जम्मो पीरा भुलाके मंच म आथें। जनमानस के हिरदे म उछाह भरथे। हंसी ठिठोली दिल्ललगी मं हंसवाए के उदीम करथे येला जनचेतना लाये के, परयास घलो कहे जा सकत हे। छग के नाचा विधा म गीद, संगीत नाचा (नाचा) जनऊला के संग चोहल (गम्मत) म अंधविश्वास दाईज-डोर, सोसन छुआछूत के ऊपर बियंग रहिथे।
छग के लोककला, लोक संस्कीरिति अउ पुरखा के संस्कार के छप्पा छत्तीसगढ़िया ऊपर, आजो देखे बर मिलथे, जउन ह पीढ़ी दर पीढ़ी चले आवत हे। लोकगीत, भेसभूषा, बोली बतर, खानपान, तीज तिहार, बर-बिहाव मीत-मितान सब म छत्तीसगढ़िया ल अलग से पहिचाने जा सकथे। अपन-अपन परब म अलग-अलग गीद, गोबिन नाचा पेखन होत रथे। भोजली, जेवारा, पंथी, पण्डवानी, करमा, ददरिया, जस गीद, आल्हा, भरथरी, चंदैनी, बांस गीद, सुआ गीद, बिहाव गीद, राउत नांचा, अउ बस्तिरिहा अइसे किसम-किसम के गीद, गोबिन छत्तीसगढ़ के माटी म रचे बसे हे।
”लोक गाथा अउ परम्परा के कहिथयं नाचा ल धुरी
रचे बसे ये छत्तीसगढ़ म आल्हा, चंदैनी, भरथरी”
छत्तीसगढ़ म नाचा सन् 1928 म नाचा पार्टी रवेली के नाव से सुरू होइस। येला संवारे के काम दाऊ रामचंद्र देशमुख ह करिस। पाछू चलके लोककला, चंदैनी गोंदा अउ कारी के रूप म देस-परदेस म नाव कमाइस। दाऊ महासिंग चंद्राकर लोककला नाचा ल आगू ले जावत भटभेरा नाचा पार्टी बनाइस। नाचा जउन समे सुरू होइस। गांव म बिजली नई पहुंचे रहिस। नाचा कलाकार मन बम्बर (मशाल) के अंजोर म खडे-ख़ड़े नांचय गावयं। नाचा म छै: सात के संख्या जेमा चिकारा बजइया तबला, मोहरी, मंजीरा, गायक, जोक्कड़ परी अउ बम्बर (मशाल) वाले राहयं, जुन्ना समे के नाचा ल खडे साज या चिकारा नाचा कहय। ये नाचा म चिकारा वाले ल परमुख मानय। छोकरा पिला (पुरुष) ह नारी के भेस धरे, सुता, करधन लुगरा, पोलखा, पहिरे गोड़ मं घुंघरू बांधे हुबहु नारी भेस म मटक-मटक के जब नाचय तहां गांव भर देखनी उड़य। गायक ह कबीर भजन, मीरा भजन, काया खण्ड के जादा गीद गावय। आधा घण्टा या एक घण्टा के नांचा होवय जिहां-जिहां बुलावा होतिस बैलागाड़ी या साइकिल म पहुंच जावय। रंजभर मन म सुवारथ नहीं। रुपया-पइसा के न भूख। ये कलाकार मन गुरतुर बोली अऊ सम्मान के भूखे राहयं। नांचा गम्मत करके फेर अपन-अपन घर लहुटय। तहां रोजी मजदूरी म लग जावय। धीरे-धीरे गांव ले तहसील, जिला, राज्य देश भर म सोर उड़गे। खडे साल के जगह मंचीय लोक कला नांचा म बदल गे छत्तीसगढ़ माटी के महक देस-परदेस में बगरगे।
”पखना घलो के टघलइया ये कला
रोवत मनखे ल हंसवइया ये कला
कला होथे कलाकार के आत्मा
सोए इन्द्री ल जगवइया ये कला”
नांचा म गांव के अपन बोली दुधभाखा म संबाद होथे, संबाद घलो अइसे होथे कि हंसना, रोना, झगरना, लड़ई मया-पीरित के भाव सिरतो पीरित के भाव सिरतो परतीत होथे। गांव परवार समाज के चित्र देखे बर मिलथे। समाज के बिगड़े बेवस्था ल चोहल (नाटक) म लोक के आगू म परगट करथे। लोक हिरदे म नांचा बर अतेक परेम अउ सम्मान हवय कि चार कोसी दुरिहा के मनखे सुनके रातो रात नांचा देखे बर पहुंच जथे। रात भर तहां नांचा देखत मगन रहिथे। न कोनो हो हल्ला न हुड़दंग। बिना बाधा के रात भर नांचा होथे। रात कब पहाथे गम नई मिलय। नांचा म छोकरापीला (पुरुष) मन भाग लेथे। नारी पात्र के रोल (भूमिका) छोकरा मन करथे, जेला परी, नचकारिन कहिथयं। नाचा म परमुख बाजा (वाद्य) हारमुनियम, तबला, ढोलक, मंजीरा, झुमका अउ बेंजो रहिथे। हारमुनियम बजइया ल पेटी मास्टर या मनेजर कहे जाथे। तबलावादक ल तबलावादक ल तबलची ढोलक वाले ल ढोलकाहा, झुमकावाले ल झुकाहा, अउ बेनजो बजइया ल मास्टर के नाव से जाने जाथे। चार बांस गड़ा के ऊपर म तालपत्री बांध के दरी डार देथे। जेमा बाजा मास्टर मन बइठ सकय, होगे नांचा के मंच दसाये दरी म बाजा मास्टर मन बइठ के वंदना के संग संगीत तान छोड़थे। मंच म परी ह आके नाचथे, गाथे। दर्शक खुस होके रुपया पइसा भेंट करथे जेला नांचा मं मोजरा कहिथयं। परी नाचे के बाद म एक परकार के सुवागत नचौड़ी धुन बजाथे। जोक्कड़ छिट्ही कुरथा पयजामा पहिरे माथा म लाल चंदन लगाए पांव म घुंघरू बांधे ढेड़गा बेड़गा डण्डा धरे मंच म आथे तब दर्शक के उछाह दुगना हो जथे। काबर नाचा के परमुख कलाकार (नायक) जोक्कड़ होथे। तबला के ताल घुंघरू के लय मिलावत मंच म जब झुमर के नाचथे तब दर्शक अपन सुंवासा थाम के एकटक देखत मगन रहिथे। रात घलो ह जहिसे जागे नांचा देखत राहंय तइसे लागथे। नांचा वंदना के बानगी-
”सरस्वती ने स्वर दिए, गुरू ने दिए ज्ञान
माता-पिता ने जन्म दिए रूप दिए भगवान”
वंदना के बाद जोक्कड़ गीद गाथे, गीद काया खण्ड नसा, दारू मंद या कोनों बिसय ल लेके गाये जाथे एक परकार ले गीद गाथे, गीद काया खण्ड नसा, दारू मंद या कोनो बिसय ल लेके गाये जाथे एक परकार ले गीद म समाज सुधार के भाव रहिथे। काया खण्ड के एक बानगी
”ये पंछी के का हे ठिकाना
कब पिंजरा ले उड़ जाही रे
माटी के काया माटी म भइया
एक दिन मिल जाही रे।”
बीच-बीच मं हंसि, ठिठोली, जनऊला म दर्शक ल हंसा-हंसा के दिल जीत लेथे। नजरीया ल नचौड़ी धुन बजा के मंच म आए बर आरो देथे। लुगरा के अचरा (पल्लु) म मुड़ ढांके, सुता, करधन, गलौधी पहिरे मंच के दुरीहा ले आथेह

आई हो

पति बिना जग हे सुन्ना दीदी
पति बिना जग हावे सुन्ना दीदी
पति बिना जग हावे सुन्ना।
हाथ के चुरी मांग के सिंदूर अमर राहय दीदी,
पति बिना जग हवे सुन्ना।
नजरिया ह मुंड म लोटा बोहे दुनो जोक्कड़ के संग जब गोल घूम के नचौरी धुन म नाचथे। जहां एक घंव अउ मंच म घूम मच जथे, नजरिया अउ दुनो जोक्कड़ के बीच दर्शक ला हंसाय बर चुहलबाजी होथे। एकरे संग गम्मत सुरू होथे एक या दू घण्टा तक चलथे, जैमा बिगड़ता नाचा गोत्ता सोसन, गरीबी के ऊपर बिंयग रहिथे नाचा के कलाकार मन भले गांव-गंवई के अनपढ़ होथें तभो ले लोक कला म सधे कलाकार के रूप मं समाज के आगू म परगट होथे। हांसी बिंयग संवाद म शहर के कोनो बड़े कलाकार ल कमसल नई राहय इंहला देख, सुन के ऐसे नई लागय कि ये मन गंवई के अनपढ़ कलाकार आय। छल, कपट, लोभ, लालच, ईरखा ले दुरिहा रहिया ये कलाकार बिपत म घलो अपन कला साधना ल नई छोड़य। अइसन फरियर हृदय अउ गउ सुभाव के छत्तीसगढ़िहा कलाकार होथे।
कला साधना म अपन जिंनगी खपइया छत्तीसगढ़ी लोक कला ल देस परदेस म पहचान देवइया म दाऊ रामचंद्र देसमुख, दाउ महासिंग चंद्राकर, दाउ म दार जी, हबीब तनवीर, फुलवा राम यादव, कार्तिक राम सिन्हा, खुमान साव, लक्ष्मण मस्तुरिया संग कतको कला साधक सांस्कृतिक जोध्दा हवे। जउन कला ल तपस्या माके साधना करिन अउ छत्तीसगढ़ महतारी के मान रखिन। नाचा मंच के अउ कला साधक म झुमुक दास, न्यायिक दास, ठाकुर राम, फिदाबाई, बुलवा, रामानिन, जेठु पकला, सितबसंत, दानी दरबन, बरसन, चंपा, मदन निषाद, लालु गीता, भगवती, कार्तिकराम जइसन कलाकार नाचा म अपन जीवन ल अर्पित करिन। कतको नाचा पार्टी गांव के ननाव से चलत हे जोन म गनियारी चिकराज पारा, मस्तुरी रायखेड़ा, खल्लारी, कनकी, रिंगनी, रवेली, लखना, बेलर, जइसन गांव के कतको कलाकार हावय।
”जुन्ना समय अउ अब के नाचा म अब्बड़ फरक होगे हे। जुन्ना नाचा कलाकार मन रुपिया-पइसा के जगह मान सम्मान बर नाचय गावय। गरीबी लालचारी के पीरा भुलाके कला साधना म लगे राहय, कला के संग जियय अऊ मरय। आज काल में नाचा म दिखावा जादा होथे कला साधना कमतियागे। फिलिम के गाना संग भद्दा पन के चलन बाढ़गे। येकरे सेती शिक्षित लोगन मन नाचा ल हीन भावना ले देखे ले धर लिन। गांव म सहर के रिवाज परेतिन असन पिछीया गे हे। गांव के अपन रीति रिवाज, संस्कार, वेशभूषा सब बदले बदले असन लागथे। टीवी सीडी केसेट अउ नवां-नवां चैनल के उतरे ले अब तो अइसे लागथे कला ह नई रहिगें बैपार होगे। तभोले नाचा के महत्तम बनें हे येला आघू बढ़ाय के उदिम करे जातहे। नाचा लोक कला के धुरी ये जतने ल परही, तबहे छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी भाषा अउ छत्तीसगढ़िया के मान मरजाद अउ अपन संस्कीरिति ल बचाए रखे जा सकथे।
”छत्तीसगढ़ के लोक गीत अऊ,
लोक संस्कीरिती बड़ हे महान।
जरूरत हवय त हम ला अतके,
राखे ला परही एकर पहिचान।”
अनिल जांगडे ‘ग़ौंतरिहा’
ग्राम कुकुरदी बलौदाबाजार
जिला रायपुर

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