छत्तीसगढ़ी हायकू

बिन पानी के।
सावन-भादो! जेठ।
मन उदास।
x
ठग-ठग के।
तैं बिलवा बादर।
कांहां बुलबे?
x
बिगन पानी।
कइसे होही खेती।
संसो लागथे।
x
बिचारे हस?
निरदई बादर।
मन के पीरा।
x
पीरा ओनहा।
पीरा दसना पी-ले।
खा ले पीरा ल।
विट्ठल राम साहू ‘निश्छल’
मौंवहारी भाठा
महासमुन्द

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  • बेहतरीन हायकु!!

    एक अपील:

    विवादकर्ता की कुछ मजबूरियाँ रही होंगी अतः उन्हें क्षमा करते हुए विवादों को नजर अंदाज कर निस्वार्थ हिन्दी की सेवा करते रहें, यही समय की मांग है.

    हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार में आपका योगदान अनुकरणीय है, साधुवाद एवं अनेक शुभकामनाएँ.

    -समीर लाल ’समीर’

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