छत्तीसगढ़ गीत म सिंगार रस

छत्तीसगढ़ी भाखा ल भले भारत सरकार ह भासा के मान्यता नइ देये फेर येमा जम्मो रस के गीत अउ गोठ समाय हे। तभे तो गीत म ये भाखा सही कोनो मीठ अउ धीरलगहा भाखा नइए केहे हे।
मोर भाखा संग दया-मया के, सुग्घर हावय मिलाप रे।
अइसन छत्तीसगढ़िया भाखा, ककरो संग झन नाप रे॥
ये भाखा के मिठास अतेक हे ते ककरो संग तुलना नइ करे जा सकय।
सिंगार रस म छत्तीसगढ़ी के कतको गीत हे जेला रेडियो अउ पोंगा रेडियो म सुने ल मिलथे जइसे टूरा अपन पिरोहील ल कइथे-
का तैं मोला मोहनी डार दिए गोंदा फूल। का तैं…
रूपे के रूखवा म तैं चढ़ गेये, मोर मन के मंदरस ल झार देयें ना।
परेमी ह अपन परेमिका के जम्मो अंग अउ गाहना इहां तक के ओकर लुगरा, पोलखर, आंखी-कान, चुंदी-मुंड़ी जम्मो के सुरता करथे जइसे-
टूरी के ऑंखी गोटारन के बांटी अऊ के हे हे
हिरनी कस तोर आंखी, गोरी, बइहा बना दिये मोला।
पिरोहिल के चुंदी अउ ओकर फुंदरा ल घलो गीत म गाय हे-
करिया-करिया चुंदी गुलापी फीता तोर।
मोला बना ले टूरी तोर दुनिया म होही सोर॥ अउ के हे हे…
करिया बादर कस चुंदी घपटे। सांप ह बेनी बनके लपटे॥
पिरोहिल के गोठ ल सुरता करके ओकर छाती म कइसे बान मारथे तेला देखव-
कोइली के गुरतुर बोली मैना के मीठी बोली जीवरा ल बान मारे रे। गोरी के टिकली अउ काजर ल देख कइसे मोहा जथे-
तोरे चंदा जइसे टिकली आंखी म झूले ओ दिन रतिहा।
जब ले मैं देखे हंव तोला गोरी, आंजे हच काजर आंखी के कोरी।
नोनी के रेंगना ह घलो बाबू ल कइसे लागथे तौनो ल देखव-
तोर रेंगना गजब नीक लागे वो,
अंगना म चीरइया फूले ना।
गोरी के हाथ के गोदना ह कइसे आंखी म झूलथे अउ सपना म आथे
दिन भर मोला भूख नई लागय, रात देखाथे सपना।
आंखी-आंखी म झूलत रइथे, ये टूरी तोर गोदना॥ अऊ कइथे-
मोर नाव के गोदना गोदा ले टूरी तोर हाथ म।
झन छूटय कभू ओ तोर हाथ ले मोर हाथ ह॥
टूरा के चेहरा घलो टूरी ऊपर बान मारथे त उहू पीरा म कलहरत रथे अउ कथे-
का बान मारे हच रे बइरी मोर नयना मा।
झूलत रइथे तोरे चेहरा, ये पिंजरा के अयना मा।
मया अतेक बाढ़ जथे ते टूरा ह टूरी ल उडा के आय बर कइथे-
काबर रातकन चंदा अंजोर म दूनो झन गोठिया लेतेन
नदिया के तीर हे, पुन्नी के रात हे।
थोरक बिलम ले संगी बाते अउ बात हे।
त गोरी ह कइथे मैं कइसे आहूं? ये अंजोर अऊ पैरी ह तोर मोर दुसमन हे। देखव कइसे कहे हे-
तैं ह आ जबे मैंना उड़त-उड़त तैं ह आ जबे।
मैं ह कइसे आंव न? मे ह कइसे आवंव न?
चंदा के अंजोर सुआ बैरी होगे न।
दूसर बइरी मोर पांव के पैरी होगे न॥
कइसनो करके आथे त टूरा ओकर रूप ल देखके मोहा जथे अउ कइथे-
तोरे रूप गजब मोला मोहि डारिच
कोन तरिया ह तोर चुरी-पटा मांजे हे।
कोन बादर ह तोर काजर ल आंजे हे।
जेन नोनी मन के पिरोहिल नइ राहय त ओमन पिरोहिल बिना कइसे झटपटाथे तेला देखव-
मोर ले छोटे-छोटे टूरी मन चल दीन हे ससुरार।
पथरा कस जवानी मोर होवथे सुवार।
अपन के पिरोहिल नइ राहय त कइसे भांय-भांय लागथे तेनो ल देखवं-
धनी बिन जग लागे सुन्ना वो नई भावय मोला सोना-चांदी, महल-अटारी।
घर-बार कुलुप लागे, बोली बात जुलुम लागे।
अन्न-पानी जाहर भइगे, गली-खोर सुन्ना लागे॥
डहर चलती नोनी अउ गुनगुनाथे देखव-
टूरा हावय अलबेला गोठियावय नहीं या।
दाई गेहे भांटा-बारी, बइठै ल आवय नहीं या॥
केउ झन नोनी मन के बाल बिहाव हो जथे उंकरो मन के रोना अउ गोहार ल सुनव का कइथे ममा दाई सुन तो-
येंसो गवन झन देबे वो बूढ़ी दाई
मैं बांस भिरहा कस डोलत हंव ओ2
बाली उमर नदान बरकइयां, लीच-लीच करथे मोर कनिहा ह ओ।
कुआं के आवत ले थक जही जांगर, कइसे के जाहूं मैं पनिया ओ॥
केउ झन मन डर्राय-डर्राय कस कथे-
दाई ओ कभू नई जावंव ससुरार म।
में तो दरर जहूं ये डउका के मार म॥
देखव जेन नोनी मन के बाल बिहाव होय रथे तिंकर बाबू मन के का हाल होथे उन मन कइसे काहत हें-
हमरो पूछइया भइया कोनो नइये गा।
गोरी नइए, कारी नइए, बुढ़िया, मोटियारी नइए।
मीठ-मीठ बोलइया, रांध के देवइया, भांटो के कहइया,
रात-दिन लड़इया भइया कोनो नइए गा।
बादर ल देख के अपन बहिनी मेर गोठियाथे-
देख तो नोनी बादर ल कइसे घप-घपावथे।
तोर भउजी के आंखी के काजर कस लागथे।
बड़े-बड़े बूंद येकर धरती म परथे।
गोरी के हांसी के आंसू कस झरथे॥
अऊ अपन अकेल्लेच ददरिया गाथे-
गँउहां डोमी ह जोंखी छाड़े हे।
मोरे भरे जवानी ह मोहनी
तोरे खातिर माड़े हे॥
अउ कथे रात-दिन तोर ऊपर चेत हे-
तोर सुरता म सुरता समा गे हे रे जवानी के दोस।
बादर ल ताना मार के कथे-
एको दिन तोर भूले-बिसरे मोर अंगना म बरसते बादर॥
हर दस कोसी म छत्तीसगढ़ के कोन्हा-कोन्हा म अइसने कतको गीत हे। छत्तीसगढ़ी म सब्बो रस के गीत ह हावय।
तुकाराम ‘असफल’
बैंजलपुर, बेमेतरा
जिला दुर्ग

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