छत्‍तीसगढ़ी उपन्‍यास : जुराव

कामेश्‍वर पाण्‍डेय

Jurav Kameshwar Pandey‘कुस’ का बड़बड़ाइस, भीड़ के हल्ला-गुल्ला मं समझ मं नइ आइस। नवटपा के ओहरत सुरुज हर खिड़की मं ले गोंड़ जी के डेरी कनपटी लऽ तमतमावऽथे। भीड़ के मारे सीट मं बइठइया सवारी घलउ मन के जी हलकान हे। देंव हर ओनहा-कपड़ा के भीतर उसनाए कस लगऽथे। ऊपर ले पंखो हर गर्राटेदार तफर्रा लऽ फेंकऽथे। मनखे के मुँह बार-बार सुखावऽथे। कतको झन के दिमाग तो टन्न-टन्न करऽथे। डब्बा हर कोचकिच ले भर गै हे। सीट मं तो खूब करके रिजर्वेसन वाला मद्रासीच मन बइठे हें। छत्तीसगढिय़ा मन बर तमिल, तेलगु, कन्नड़, मलयाली, सबे मद्रासी। लिंक एपरेस हर ओमन लऽ अपन देस जाए बर सीधा अउ सुभीता परथे। बाकी लोकल बैपारी, कामगार, किसान बोगी मं भरे हें। सीट मन के बीच तक मं इहॉ-उॅंहा ले अकबकावत अउ बकबकावत मुंडीच-मुंडी। गठरी-मोटरी लेहे आदमी औरत धंसे परऽथें। ओला रोके के बहाना करत ‘कुस’ अपन डेरी गोड़ लऽ सामने प्रभा के सीट मं तान देहे हे जउन भीड़ के दबाव मं ओकर सरीर लऽ छूवऽथे। प्रभा ‘जय’ कती खसक के ए समस्या के निराकरन करिस अउ ‘कुस’ अपन गोड़ लऽ हटा लिहिस, लेकिन नीचे ओकर पॉंव तक अड़ाएच रखिस, ताकि भीड़ हर धॅंसे मत पावै। बइठइया तक मन लऽ अपन जघा मं हलाई-डोलाई हर मुस्किल हो गए हे, लेकिन ए फेरी वाले सिंकिया सूर मन कइसे अपन बड़े-बड़े बाल्टी, टुकनी, पेटी मन ल धरे, गुंथाए भीड़ लऽ अपन कोहनी में हुदरत अउ तॅंउरत कस आत्ते-जावत रथें।
(उपन्‍यास अंश)








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