छत्‍तीसगढ़ी गज़ल – जंगल ही जीवन है

जम्‍मो जंगल ला काटत हन गॉंव सहर सम्‍हराए बर।
काटे जंगल किरिया पारत गॉंव सहर जंगलाये बर।।
जंगल रहिस ते मंगल रहिस, जंगल बिन मंगल नइये।
पौधा रोपन गम्‍मत करथन, फेर मंगल ला मनाये बर।
हरियर रूख, कतको सोंचेन, भितरी म बड़ हरियाबो।
बपरा ते दुनिया छोड़न, रोथन काबर हरियासे बर।
रिसा गइन करिया बादर मन, नास देखके जंगल के।
पहिली बरसे, अब तो रोथें, मन ला बस फरियाये बर।
कुरसी मन जंगल के बदला सकुनी सही चुकावत हे।
उदिम करत हे मनखे कतरके, जंगल फेर बनाए बर।
जंगल छोड़े बंदर भालू सहर म अउ खूंखार बनिन।
दांत अउ नख खुरसी बनगे, लगिन देस ला खाये बर।
जंगल सही बड़े मन ह अब, छोटे मन ला खावत हें।
देस भक्ति अब धंधा बनगे, धन रूपिया ला कमाये बर।
मदरस भरे लबालब छत्‍ता, फेर माछी मन भूख मरंय।
चूहकत हें भालू मन सत्‍ता चढ़के अबड़ मोटाये बर।
अब रजधानी जंगल बनगे, सबो जानवर जुरियागे।
कोनो खोजंय सिकार, लुकाये कोनो, जान बंचाए बर।
बेंदरा मन कूदत हें, धरके हॉंथ म सत्‍ता के हथियार।
ऑंखी खोलव मन ला जोरव देस ला अपन बचाये बर।
मनखे बनके फेर जगावन जंगल जीवन के खातिर।
अलगे राखव सहर ल, जीवन ला हरियासे खातिर।

डॉ. प्रभंजन शास्‍त्री
बागबहरा

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One comment

  • shakuntala sharma

    प्रभंजन भाई ! बहुत सुन्दर ग़ज़ल लिखे हवस, तोला बहुत बहुत बधाई |

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