छत्‍तीसगढ़ी मुहावरा

अँइठ-अँइठ के रहना : मन मार के रहना। (मन मसोस कर रह जाना)
पइसा के लाचारी मा अपन बेटा ला नइ बचा सकिस। बपरा हा अँइठ-अँइठ के रहिगे।
अँइठ के रहना : मन मार के रहना। (मन-मसोस कर रहना)
हीरामन संग कहुँचो नइ जावन भइया, एक घाँव रइपुर गे रेहेन ते दिन भर लाँघन टाँग दिस, अँइठ के रहिगेन।
अँइठ निकालना : गुमान मेटना। (घमंड तोड़ना)
ये दुनियाँ मा बड़े-बड़े तपसी अउ योद्धा होइन। भगवान हा उँकरो अइँठ निकालदिस, तब तोर-हमर असन के का ठिकाना।
अँइठू होना : जिद्दी होना। (यथावत)
ये टूरा हा अब्बड़ के अँइठू हे। जउन सोंच लेथे तउन ला करके छोंड़थे।
अँखमुंदा भागना : बिना गुने-बिचारे भागना। (बिना सोचे-विचारे दौड़ना)
रोहित हा हुरहा साँप ला देखिस ते परान बचाए बर मेंड़-पार ला कूदत अँखमुंदा भागिस।
अँगठा छापः अप्पड़। (निरक्षर)
रामदास हा अँगठा छाप हे ते का भइस, ओकर अनभो भारी हे।
अँगठी देखाना : धमकाना। (ललकारना)
कोनो ला अँगठी देखाए ले बुता नइ सधे फकालू, उल्टा बिगड़ जथे।

अँगरी देखाना : धमकाना। (ललकारना)
नियाँय मा रबे तब कोन अँगरी देखाही धरमू, अनियाँय करबे तब कोनो भी अँगरी देखा देही।
अँगठा देखाना : धोखा देना। (यथावत)
मितान ओला कथें, जउन हा सुख-दुख मा संग निभाथे। बिपत मा अँगठा देखाथे तउन हा का मितान ए?




अँगठी कलम करना : ईमानदार होना। (यथावत)
बड़ भागमानी रामू दाऊ हाबे, जउन ला अँगठी कलम करइया चैतू कस नउँकर मिले हे।
अँगठी चाबना : अचंभो मा पड़ना (आडम्बर में पड़ना)
एक ठन पेड़ मा दू किसम के आमा फरे देखेंव ते महूँ अचंभो मा पड़ गेंव मितान, दूनों हा देसिच आमा आय।
अँगठी देखाना : ललकारना। (यथावत)
आज काल तो चोरे मन साव ला अँगठी देखाथें। एकर ले अतियाचार अउ का होही।
अँगठी बताना : ललकारना। (यथावत)
अनियाँय करके अँगठी बताथे तउन हा सहउल नइ देय।
अँगना उचना : रात मा पिसाब ऊ बर उचना। (रात्रि में पेशाबादि उठना)
अँगना उचे के आदत सब ला बनाना चाही। एकर ले घर के हियाव घलो हो जथे।
अँगना खँचवा करना : खुसामद करना। (खुशामद करना)
पर के खातिर पर ला अँगना खँचवा करही तब कइसे निभाव होही।
अँगना मा परदी करना : बँटवारा होना। (बटवारा होना)
भाई हे तब एक दिन अँगना मा परदी तो परबे करही। ये तो सदा जुग के किस्सा आए।
अँगना मा फूलफूलना : घर मा लइका जनम धरना। ( घर में बच्चा पैदा होना)
बुढ़तकालमा बिरझू के अँगना मा फूल फूले हे तब परिवार मा खुसी तो छाबे करही।
अँगरा कस धधकना : मनमाने घुँसिया जाना। (तमतमा जाना)
खेलौना तो टूटे-फूटे के जिनिस आए। खेलत-खेलत लइका ले टूटगे। एमा अत्तेक घुँसियाए के का बात हे।
अँगरा बरसना : अब्बड़ घाम करना। (तेज धूप होना)
नौटप्पा मा अइसे अँगरा बरसथे के छइहाँ मा घलो जिवरा नइ जुड़ाए।
अँगरी चाँटना : खूब मिठाना। (अधिक स्वादिष्ट होना)
आज के साग हा अँगरी चाँटे के लइक मिठाए हे। नइ खाबे ते पछताबे।
अउ खाए के मन होना (और खाने का मन होना)
अँगरी चाँटत काबर बइठे हस, खाए के मन हे ते अउ माँग ले।
अँगरी देखाना : धमकाना। (ललकारना)
जेकर घर मा रहवासा हे, उही ला अँगरी देखाबे तब कइसे निभाव होही।
अँगरी धर के रेंगना : सहारा ले के चलना। (सहारे से चलना)
अब तो हमर इहाँ के बाबू हा अँगरी धर के रेंग डारथे।
अँगरी फोरना : अनख करना। (ईर्ष्या करना)
असनो परोसिन का काम के जउन हा बात-बात मा अँगरी फोरत रथे।
अँगरी बताना : ललकारना। (यथावत)
जउन हा इमानदार रही तउने हा अँगरी बताके गोठियाही।
अँगरी मा नचाना : बस मा करना। (वशीभूत करना)
आज के जबाना मा पइसा के भूख हा भारी हो गेहे। तभे तो पइसा वाले मन सब ला अपन अँगरी मा नचाथें।
अँगरी मा नाचना : बस मा होना। (वशीभूत होना)
बड़ सिधवा अउ मिहिनती टूरा ए, फेर जब ले बिहाव होए हे, बहू के अँगरी मा नाचत हे।
अँगोठ लेना : एकट्ठा करना। (इकट्ठा करना)
तिहार लट्ठा गेहे अब खेत-खार के बुता ला जल्दी-जल्दी अँगोठ ले।
अँचरा ढाँकना : सनमान करना (इज्जत करना)
बड़े घर के बहू मा एक ठन यहू बड़जन बात होथे के- नता देख के गरीब मन बर घलो अँचरा ढाँक लेथे। ए धरम ला हमन नइ निभा सकन।
अँचरा धरना : सहारा लेना। (सानिध्य प्राप्त करना)
बाप-मँहतारी के अँचरा धरके लइका हा बाढ़थे तब उँकर गुन हा कइसे नइ उतरही।
अँचरा मा गठियाना : याद रखना। (यथावत)
दाई-ददा के सिखौना गोठ हा लइका मन के भलई बर होथे, एकर सेती अँचरा मा गठिया के राखना चाही।
अँचरा मारना : नजर-डीठ धराना। (टोना करना)
कोन जनी कोन अँचरा मारे हे ते, लइका के रोवई हा थिराबे नइ करत हे।
अँजोरी पाख आना : सुख के दिन आना। (अच्छे दिन आना)
जब ले ससुरार आएस, रोते-धोवत दिन बिताएस मनटोरा, लइका मन के नउकरी लगे ले तोरो अँजोरी पाख आगे वो, अब राज करबे।
अँटिया-अँटिया के खाना : नंगत खाना। (खूब खाना)
कभू कालमा तो छप्पनभोग खाए ला मिले हे। कइसे अँटिया-अँटिया के नइ खाही।
अँधियार छाना : चेत-बुध नइ रहना। (बेहोश होना)
लहू-रकत मा अपन लइका ला देखिस ते बुधिया के आँखी मा अँधियार छागे। तुरते डागटर बलइन ओकर बर।
अँधियार मा बरछी फेंकना : अंताज लगाके बुता कमाना। (अनुमान से कार्य करना)
अँधियार मा बरछी फेंके ले बनउकी एकाते घाँव बनथे। नकसानी जादा होथे।
अंधियार मा राखना : परिसथिति नइते तथ्य के जानकारी नइ देना। (परिस्थिति या तथ्यों की जानकारी न देना)
ओकरे भाई मन ओला अँधियार मा राखिन तेकर सेती बपरा ला आज के दिन देखे ला परत हे।
अँधियारी कुरिया : अंताज ले बाहिर। (अनुमान से परे)
काकरो पेट के बात ला कोन जान सकत हे चैतराम! ओ तो अँधियारी कुरिया आए। भगवाने हा उजागर करही नोनी आए के बाबू तेला।
अँधियारी घपटना : दुख के दिन आना। (बुरे दिन आना)
ये तो भगवान के लीला आए गनेसिया, जब अँधियारी घपटना रथे, तब बुध घलो हर जथे।
अँधरौटी छाना : नइ दिखना। ( न दिखना)
सियान-सामरत आदमी ला अँधरौटी छा जथे बेटा! अँधियार हो गेहे जा, तीहीं घर तक पहुँचा के आजा।
अंग-अंग भरना : बदन भर पीरा भर जाना। (पूरे शरीर में दर्द भर जाना)
देवारी बेखन अत्तेक बुता रथे के कमात ले अंग-अंग भर जथे।
अंग ओगरना : देहें आना। (मोटा होना)
बाबू हा कका घर रिहिसे, तब निच्चट दुब्बर-पातर रिहिसे। ममा घर के गेय ले बने अंग
ओगरिस हे।
अंग भरना : गला मिलना। (गले लगना)
दूनों भाई मा बड़ मयाँ हे। बिकट दिन मा मिलिन ते अंग भर मिलिन।
अंगार फूँकना : गुँस्सा आना। (गुस्सा आना)
बात-पुट लबारी मारथे, तब मोर तन मा अँगार फूँक देंथे।
अंग लगना : असर होना। (यथावत)
ये डोकरा हा रात दिन हरहरे-कटकट करत रथे। खाए अन अंग नइ लगे।
अंग लगाना : मयाँ करना। (प्रेम करना)
कतको बड़ अलहन कर डरे, महतारी अपन लइका ला अंग लगाबे करही।
अंडा जइसे सेना : बचा अउ लुका के राखना। (बचा और छिपाकर रखना)
का जी के आमा, तेला अंडा कस सेवत हे। कहूँ कीमती जिनिस होतिस ते कोन जनी
का करतिस ते।
अंडा मा डंडा परना : मटियामेट करना। (सत्यानाश करना)
दिन भर के जाँगर पेरे ले पेट के पुरतिन पइसा सकलाथे, वहू ला मंद-मउँहा मा उड़ाबे तब घर के हालत तो अंडा मा डंडा परे कस हो जही।
अंडा सेना : घर मा बइठ के अकारन समे गवाँना। ( घर में बैठकर व्यर्थ समय गँवाना)
खेत-खार कमाए बर जाबे के घर मा बइठ के अंडा सेत रबे।
अंतस फाटना : उचाट लागना। (दिलटूट जाना)
अंतस फाटे के बाद कहुँ सरग के सुख ला कुढ़ो देबे, तभो का काम के ? मन मा खुसी नइ रही तब।
अंधरा समझना : मुरुख समझना। (मूर्ख समझना)
अपन जइसे सबो ला अंधरा समझत हस तउने हा सबले बड़े अलहन आय।
अंधेर करना : अनियाँय करना। (अन्याय करना)
एक झन बेटा ए कहिके रामसिंग हा दुलार मा राखिस, ते ओकर बेटा हटोई हा उल्टा अंधेर करत हे। रद्दा रेंगत मनखे मन ला मार-पीट देंथे।
बिकट देरी करना। (बहुत देर करना)
तुरते आवत हँव तरिया पार मा अगोरबे केहे, ते यहा का तोर अवई ए, अंधेर कर डरे।
अंधेर होना : बहुँत होना। (बहुत होना)
ऐसो तो धान-पाँन मा ठिकाना नइ हे। बन-बूटा हा घलुक अंधेर हो गेहे।
अई आना : जातरी आना। (विनाशकालनिकट आना)
तोर अई आ गेहे का रे बोधन, रटहामुहाँ मुनगा पेड़ के टिलिंग मा चघत हस।
अउ ते अउ : अउ कुछु नइ ते। (और कुछ नहीं तो)
बेटा ला सोरियावत सखाराम के ददा हा गाँव ले आए हे, तभो ले सखाराम हा अउ ते अउ ओला एक गिल्लास पानी बर घलो नइ पूछिस।
अकरस जोतना : आघू चलके नफा कमाए खातिर उदीम करना। (भविष्य में लाभ के निमित्त
कार्य करना)
देवारी तिहार बर पइसा खातिर सबो फिफियाए रथें, तभो ले अकरस जोतथें। काबर के मंझोत मा धान लुवई के जब्बर बुता रथे।
अकास मा गोड़ मढ़ाना : अनसम्हाँर खुसी होना। (अत्यधिक उत्साहित होना)
भगवान के किरपा ले तुँहर घर खुसी छाए हे, तब अकास मा गोड़ झन मढ़ा, नइ ते अइसे गिरबे के उठे ला नइ सकबे।
अतियाचार करना। (अत्याचार करना)
तोला कोन पूछे, बड़े-बड़े राजा-महाराजा ला देखे हन, जउन हा अकास मा गोड़ मढ़इस तउन हा मुँड़भसरा गिरे घलो हे।
अकास ले पतालनापना : अपन ताकत अउ पहुँच ले जादा बात करना। (अपनी शक्ति और सामर्थ्य से अधिक बातें करना)
हकालूदास हा अकासले पतालनापथे तेकर सेती ओकर बात ला कोनो नइ पतियाएँ।
अकेल्ला राज करना : बिना कोनो अड़चन के सुख भोगना। (बिना व्यवधान के आनंद लेना)
तोर कट्टर बिरोधी ला तो भगवान उचालिस परताप सिंग, अब तो अपन इलाका के राजनीति मा अकेल्ला राज करबे।
अक्कलके अंधरा होना : मुरुख होना। (मूर्ख होना)
झींक-झापड़ा ला लेसबे केहे रेहेंव ते झाला ला लेस डरे रे अक्कल के अंधरा नइ तो, अब फेर झाला बनाए ला परही।
अक्कलखपाना : उपाय खोजना। (यथावत)
कोनो भी समसिया के हल अक्कलखपाए ले होथे। रोए-ललाए ले समसिया नइ सलटे।
अक्कलगवाँना : मति हर जाना। (बुद्धि काम न आना)
होनी के आघू काकरो बस नइ चलै बसंता, होनी हा जब होना रथे, तब बड़े-बड़े के अक्कलगवाँ जथे।
अक्कलचरे बर जाना : चेत नइ रहना। (ध्यान नहीं रहना)
इही अलहन झन होए कहिके घेरी-बेरी समझाएँव, तब तोर अक्कलकहाँ चरे बर गे रिहिस रे भोकवा, उही अलहन ला कर के आगेस।
अक्कलदउँड़ाना : बड़ सोंच -बिचार करना। (खूब सोच -विचार करना)
कम खरचा मा बढ़िया मकान बिनाये बर अक्कल दउँड़ाए ला परथे, तब बनथे।
अक्कलबाँटना : उपाय बताना। (यथावत)
आज जम्मों मनखे बुधियार हो गेहें। जेकर बुध नइ पुरे तउन ला पइसा मा अक्कलबँटइया मिलजथे ।
अक्कलमा गोबर भराना : मुरुख होना। (मूर्ख होना)
अत्तिक पढ़े-लिखे के बाद घलो ओकर अक्कल मा गोबर भराए हे तेला कइसे कर डारबे ।
अक्कलमा पथरा परना : मुरुख होना। (मूर्ख होना)
तोर अक्कलमा पथरा परे हे का रे, अत्तिक समझाथों तभोले नानचुक बात ला घलो नइ समझस ।
अक्कललड़ाना : उपाय खोजना। (यथावत)
खेत मा कसनो करके पानी तो पल जाए, अइसे सोंच के अब्बड़ अक्कल लगाएँव फेर एको काम नइ अइस ।
अघा जाना : मन भर जाना। (तृप्त होना)
ये लइका ला खाए बर हदरत रथे अउ खाए ला देबे ताँहले एके कन मा अघा जथे ।
अघोरी होना : खक्खी होना। (अतृप्त रहना)
ये टूरा हा मार्इं अघोरिच हो गेहे। जतका रथे ततका ला खा डारथे ।
अटकर करना : (i) अनमान लगाना। (अनुमान लगाना)
एसो के धान हा बढ़िया दिखत हे। अटकर कर तो रामपरसाद, कतका हो जही ।
(ii) सुरता करना। (स्मरण करना)
बड़ बेर के अटकर करत रेहेंव, देखे-देखे कस लागत हे… कोन आए कहिके। तोर भाखा ला ओरखेंव,
तब जानेंव ए तो ननपन के मितान गोपाल आए ।
अटकर पंचेः अनमान गे। (अनुमान से)
भगवान ला देनच रिहिसे, तभे तो अटकर पंचे के दवई मा बुधारू के खेत मा सोन उबजगे ।
अटर्रा होना : बिन पुछंता के होना। (तिरस्कृत होना)
बैसाखू हा अपन अटेलहा सुभाव के कारन अटर्रा हो गेहे ।
अट्ठी बगराना : चारो मुँड़ा लगे छेंकना। (चारो तरफ से घेरना)
डकैत मन बेंक ला लूट के भागत रिहिन हें। पुलिस मन तुरते अट्ठी बगरइन ते डकैत मन पकड़ा गें ।
अथान डारना : जतन के राखना। (सुरक्षित रखना)
नवाँ पनहीं बिसाए हस तेला पहिरतेस नइ रे, यहा भोंभरा मा खाली पाँव रेंगत हस। नवाँ पनहीं के अथान डारबे का ?
अदरमा फाटना : भारी बिपत आना। (भारी विपत्ति आना)
पुटुर-पुटुर मारेच लगे कुछु नइ होए बाबू ! जब अदरमा फाटथे तब बड़े-बड़े के बुध हर जथे ।
अधरे-अधर कूदना : बुता पूरा होए के पहिली लगे मगन होना। (कार्य पूर्ण होने के पूर्व ही उत्साहित होना)
तोर नउकरी लग गे, तउन हा बने होइस फेर कागत-पतरी ला तो आवन दे, अधरे-अधर के कुदई हा बने नोहे।
अनठेहरी गोठियाना : ठेसरा मारना। (व्यंग्य कसना)
खुद के चाल मा कीरा परे हे अउ दूसर बर अनठेहरी गोठियाथे तउन हा नइ सुहाय।
अन-पानी छोंड़ना : मरे के लइक होना। (मरणासान्न होना)
चिंता बिमारी जब घेरथे तब कतको के अन-पानी छुट जथे।
अपन आँखी मा नींद आना : बुता ला सियम करे लगे संतोस होथे। (कार्य को स्वयं करने से
संतोष मिलता है)
मोला बिगारी के बुता पसंद नइ आए भइया, अपन आँखी मा नींद आथे। मिहीं कमा डारहूँ ।
अपन-अपन परना : अपन-अपन बचाव नइते सुवारथ मा लगे रहना। (अपनी-अपनी सुरक्षा या स्वार्थ में संलग्न रहना)
जब भगदड़ मचथे तब कोनो ला काकरो सुध नइ राहय। सब ला अपन-अपन परे रथे ।
अपन काम ले काम राखना : अपने काम ले मतलब राखना। (अपने काम से मतलब रखना)
बिरान के झगरा-झंझट मा परे लगे का फायदा ? अपन काम लगे काम राखना चाही ।
अपन खुसी लगे करना : अपन सउँख ले करना। (अपनी इच्छा से करना)
कोनो बुता होए, अपन खुसी ले करे मा अलगे मजा आथे ।
अपन गाल ला थपरा मारना : खुदे के अनहित करना। (स्वयं का अहित करना)
ओकर बिपत मा ते अपन गाल ला थपरा मारके मितानी निभाए। आज तोर ऊपर बीपत आए हे तब तोर मितान कहाँ गे ?
अपन घर के बड़े होना : बिसेस सुविधा के ताक मा रहना। (विशेष सुविधापेक्षी होना)
होही अपन घर के बड़े। समाज मा तो चार-सुभौती रेहे ला परही ।
अपन घर जानना : लाज-बीज छोंड़ के बेवहार करना। (संकोच छोड़कर व्यवहार करना)
खाए-पीए बर जउन लजाथे तउने भूख मरथे, फेर ला का के लाज ? ये
ला अपने घर समझ ।
अपन जानना/समझना : अत्मयती समझना। (आत्मीय समझना)
बिरझू ला तोला अपन जान के हलाकान करथे बोधनी, ओकर बात मा रिस झन करे कर ।
अपन बनाना : हिरदे जीतना। (आत्मीय संबंध बनाना)
अपन बनाके संग छोड़बे तब में हा कइसे करहूँ ? मोर तो जीना अउ मरना एके हो जही ।
अपन बर सेर होना : अपन बर ताकती होना। (अपने लिए ताकतवर होना)
अपन बर सबो सेर होथे मन्नु लाल, समाज
मा सेर बनके देखा तब तोर बहादुरी ला जानबो ।
अपन मुहूँ मा थपरा मारना : अपन सउँख ला दबाना। (अपनी इच्छा का दमन करना)
अपन मुहूँ ला थपरा मार के लोग-लइका बर चार पइसा सकेले हन ।
अपन मुहूँ मा बोलना : कबूल करना। (बात को स्वीकार करना)
अपन मुहूँ मा बोले हन तब निभाबो घलो। एमा कोनो संसो के बात नइ हे ।
अपन रद्दा आना अउ अपन रद्दा जाना : काकरो लफड़ा मा नइ परना। (किसी के लफड़े में नहीं पड़ना) मतलब अपन रद्दा आबे अउ अपन रद्दा जाबे तब कोनो काबर कुछु बोलही ।
अपन रद्दा रेंगना : अपन बुता ला चेत करना। (अपने कार्य पर ध्यान देना)
सुलीन लगा के जीना हे तब अपन रद्दा रेंग, नइ ते दुनियाँ तो मेकरा के झाला आए। भँवरी कस किंदरा दीही ।
अपन हाँत मा लेना : अपन देख-रेख मा राखना। (अपने नियंत्रण में रखना)
जब जम्मों कारोबार ला भइया ला अपन हाँत मा राखे हे ।
अपने आँखी मा नींद आना : सियम के करे ले संतोस मिलना। (स्वयं के करनेसे संतोष मिलना)
बिगारी के बुता हा कत्तेक नित्ता रही,
अपने आँखी मा नींद आथे ।




अपने ला चलाना : अपनेच बात मनवाना। (अपनी ही बात मनवाना)
सबो के सुनना चाही, अपनेच ला चलाए ले बुता नइ बने ।
अपने ला देखना : सुवारथ मा रहना। (स्वार्थी होना)
जउन हा अपने ला देखथे तउन हा समाज के भला नइ कर सके। समाज के भला करे बर बिगड़ जन हिरदे चाही ।
अपने सोन रासिल होना : अपने आदमी नइ ते जिनिस मा खोट होना। (अपने ही व्यक्ति या सामान में दोष होना)
अपने सोन ला रासल हे तब कोन-कोन ला समझाबे। दुनियाँ तो निंदच करइया आए ।
अबक-तबक होना : मरगे के लइक होना। (मरनासन्न होना)
गेंदलाल बबा हा अबक-तबक होगे हे। आज ओला पान-परसाद खवात हे ।
अम्मल मा होना : गरभ मा होना। (गर्भवती होना)
सुकवारो के बहु अम्मल मा हाबे तभोबड़ बुता कमाथे। हाँत रीता नइ राहय बपरी के ।
अरई लगाना : बानी लगाना। (पीछे पड़ना)
हरहिंछा बुता कमाए के अलगे मजा हे। अरई लगाए लगे बुता बिगड़ जथे ।
अरी के तेल बरी मा निकालना : समे के फायदा लेना। (अवसर का लाभ लेना)
लड़ई-झगरा करके अपन नकसानी करेस ते करेस, मोर नकसानी काबर करत हस। अरी के तेल बरी मा निकाहत हस का ?
अलकर मा घाव होना : राज के बात ला बताए बर बिबस होना। (गुप्त बात को बताने के लिए विवश होना)
काकरो निंदा-चारी गाए ले का मिलही फेर अलकर मा घाव हो जथे तब बताएच ला परथे ।
अलग-बिलग होना : बँटवारा होना। (बँटवारा होना)
जेकर घर भाई-भाई मा एक-दूसर बर पीत मारे के आदत नइ राहय तिकरे घर जल्दी अलग-बिलग होथे ।
अलसा के मरना : दुख सहि के मरना (कष्ट सहकर मरना)
जादा अत्याचारी करही तउन ला अलसा के मरबेच करही ।
अहट भर खाना : पेट भर खाना। (यथावत)
हीरामन हा अहट भर खाथे अउ ताकत भर कमाथे।
ओकर काम-बुता मा कोनो कसर नइ राहय ।




चंद्रकुमार चंद्राकर जी के कोश ले, संतोष चंद्राकर जी, गुण्‍डरदेही के ब्‍लॉग ले.

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