छन्नू अउ मन्नू

श्रीकांत ल नवा बइला लेना रिहिस। ओहर आमगांव के बजार गिस। उहां बइला बजार म श्रीकांत बइला मन ल देखन – परखन लगिस। ओला निमेष के दावन म बंधाये बइला जोड़ी भा गे।
बइला ब्यापारी निमेष बइला जोड़ी के कीमत बीस हजार बताइस। कहिस – ये मन ल लेके तो देख। अइसन बइला जोड़ी दीया धर के खोजे म नइ मिलही।
श्रीकांत, निमेष के बात मं हां ले हां मिलावत रिहिस फेर ओकर कीमत कम करवाये के फिराक म रिहिस हे। निमेष झट छन्नू नाम के बइला के पीठ ला ठोंकिस। ओकर पूंछी ल अइठिस। छन्नू ऊपर डहर उचक के अपन पहलवानी देखइस। निमेष छन्नू तीर मं बंधाय बइला ल छुइस त ओहर दुनों गोड़ म खड़ा होगे। निमेष किहिस – येकर नाम मन्नू हवय। छन्नू अउ मन्नू के पटथय घलो। अलग – अलग खूंटा म बांध दूहूं त दावन तोड़ देथे।
श्रीकांत के पारखी नजर बइला मन के ताकत ल भांप ले रिहिस। मोल भाव होइस अउ निमेष सोला हजार म दावन ठोंक दीस।
श्रीकांत रुपिया गिन बइला मन ल धर घर डहर चल परिस। छन्नू – मन्नू लकर – लकर रेंगे लगिन। बइला मन के रेंगई मं श्रीकांत नइ सक सकिस। श्रीकांत कांसरा ल बइला मन के सींग म फांस दीस।
रद्दा म भाटागांव परिस। एक ठिहा म कुछ गांव वाले म रहिस। ओमन बइला ल देखिस अउ श्रीकांत ल पूछिस- ये बइला कहां ले लावत हस। कतेक म ऐ मन ल बिसाय हस ?
– आमगांव के बाजार ले। पूरा सोला हजार लगगे।
– सस्ता म पागेस …।
– सस्ता कहां, सोला हजार इही कर परे नईहे। श्रीकांत हांसत किहिस।
– तैं फिकर झन कर। बइला मन तोला सोला के बत्तीस कमा के देही। गांव वाले मन भविष्यवाणी घलो कर दीन।
श्रीकांत ल गांव पहुंचे के जल्दी रिहिस। ओहर चाहत रिहिस के बेरा बुड़े के आगू गांव पहुंच जाय ताकि गांव वाले मन घलोक बइला ल देखै।
गांव के तीर पहुंचते सांठ श्रीकांत बइला मन के कांसरा ल सींग ले निकाल के धर लीस। गांव वाले मन बइला देखिन त देखतेच रहिगे। घर के मुहाटी म पहुंचते सांठ श्रीकांत के बाई सुनंदा लोटा भर पानी ले आइस। मुहाटी म ओरसा, आरती सजा ले अइस॥ बइला मन के आरती पूजा करिस। उंकर माथ म चांउर – गुलाल लगाइस। नरियर फुटिस। लोगन मन म परसाद बांटे गिस। श्रीकांत बइला मन ल अंगना मं ला के खूंटा मं बांध हरियर – हरियर कांदी उंकर आगू म डार दीस। बइला मन कांदी खाए लगिन।
बइला देखे बर बड़ अकन गांव वाले मन आये रिहिस। ओमे से कुछ ल खुशी होत रिहिस त कुछ ल जलन। गांव वाले मन नवा बइला ले के खुशी म श्रीकांत ल नेवता करवाये बर किहिस। श्रीकांत के कहिते सांठ सुनंदा भोजन रांधे बर भीडग़े।
अभी गांव वाले मन बइला देखत रिहिस के अमित अइस अउ कहिस – मनीष तैं इहां श्रीकांत के बइला देखत हस, ओ डहर तोर बइला गाड़ी नाला म अरहज गेहे।
– त दूसर के बइला मांग के काबर नइ ले आवस । मनीष किहिस।
– गांव भर के बइला ल फांद के देख डरेव, फेर गाड़ा टस के मस नइ होवस।
मनीष श्रीकांत ल किहिस – श्रीकांत, तैं अपन बइला मन ल दे दे। ओकर संभव घलोक हो जाही।
– नहीं रे भाई, ये मन अभी थके हावय, सुस्तान दे।
– त का ये मन ल देखाय बर लाये हस। मोला तो लगथे, ये मन गाड़ा ल नइ खींच पाही।
श्रीकांत जिद्द म उतरगे। श्रीकांत बइला मन ल ढील दीस। बइला मन ल नाला मेर लइस। गाड़ा म ठसाठस धान जोराय राहै। ओहर नाला के चढ़हान म अटकगे रिहिसे। बइला मन ल गाड़ा म फांदे गिस।
बइला मन एक दू पग चढ़ाये फेर पाछू खसक जाये। मनीष किहिस – श्रीकांत, तोर बइला मन के कारज दिखगे। अतकी अकन चढ़ाव ल पार नइ कर पावथे।
सुन के छन्नू – मन्नू के तेवर चढग़े। ओमन आगू के दूनों घुटना ल मोडिऩ। पीछू के खुर म बल दीन अउ फुर्ती के साथ आगू के गोड़ ल उठा के आगू चल परिन।
बइला मन हांफे लगिन। ऊंकर मुंहू ले झांग निकलगे। कइसनों करके ओमन गाड़ा ल ऊपर खींच लाइन। मनीष ल बइला मन के तारीफ करना रिहिसे। ओहर बइला मन के परीक्षा लेना चाहत रिहिस हे जेमा बइला मन सफल होगे।
श्रीकांत गांव वाले मन संग अपन घर अइस। जेवन बनगे रिहिस। पहली दू ठन थारी म निकाल के छन्नू अउ मन्नू ल दीस फेर गांव वाले मन डकार के लेत ले खइन।
श्रीकांत रोज बिहिनिया ले उठते बइला मन ल दाना पानी दे। ऊंकर आगू म हरियर – हरियर कांदी डारै। मंझनियां तरिया ले जाय अउ रगड़ – रगड़ के नहवायै। बिहिनिया संझा कोठा के सफई करै। कहूं मच्छर दिखय त छेना जला के धुंगिया करय। कभू आलस के सेती छन्नू या मन्नू सुस्त दिखे त श्रीकांत पशु चिकित्सक ल बला लाय। जब तक छन्नू – मन्नू फुर्ती नइ देखा दे तब तक श्रीकांत के मन बेचैन रहै।
ओ दिन श्रीकांत गांव गे रिहिस। बइला मन के देख रेख के जिम्मा सुनंदा ऊपर आगे। ओहर बइला मन ल कांदी दे बर गिस। अचानक छन्नूके खूर म सुनंदा के गोड़ खुंदागे। सुनंदा हाय दई, हाय मरगेंव कहत। छन्नू ल गारी देवत कांदी ल वापिस लेगे। मन्नू ल छन्नू ऊपर गुस्सा अइस। अउ गुस्सा म कहिथे – अब भूखे मर। मालकिन जब हमर सेवा करथे, तब तैं ओला दुख काबर देस।
– तैं गलत अर्थ लगा बइठेस। मैं जान बूझके थोरे खूंदे हौं। ओ तो धोखा म खूंदागे।
– तैं लबारी झन मार, मोर ले धोखा काबर नइ होइस ?
छन्नू सफाई दीस। मन्नू नइ मानिस। छन्नू अपन लापरवाही बर माफी मांगिस। मन्नू नाराज रिहिस।
मंझनिया होगे। छन्नू – मन्नू ल न पानी मिलिस न कांदी। भूख म पोट – पोट मरत छन्नू कहिस – संगवारी, मोला जोर लगहा भूख लगत हे। अब तो तैं मान जा। मालकिन मोर से गुस्साय हावै। तहीं कांदी मांग।
बिक्कट करलई करैं म मन्नू मानिस। ओहर हम्मा – हम्मा बोमियाय लागिस। एकर मतलब सुनंदा समझगे। ओहर किहिस – भूखे मरौं। मैं कांदी नइ देवौ मतलब नइ देवौ।
श्रीकांत गांव ले आते लघियात बइला मन मेर जाथे। बइला मन मुंहू ओथरे अइठे रिहिन। श्रीकांत डेर्रागे। ओहर छन्नू ल सहलावत पूछिस – तैं चुपचाप काबर बइठे हस ?
जेकर गलती के सेती अब तक भूखे रेहे ल परिस ओकरे संग बातचीत करत देख मन्नू के गुस्सा तमतमागे। ओहर जोरदार मुड़ी ल हलइस। श्रीकांत ओला पुचकारिस। कहिस – तैं अतेक नाराज काबर हस, मालकिन तुमन ल तंग तो नइ करिस ?
श्रीकांत कोठा म नजर डारिस। उहां कांदी नई दिखिस। कोटना म देखिस त उहू जुच्छा रिहिस। श्रीकांत सुनंदा ल चिल्लइस। सुनंदा खोरवत अइस। श्रीकांत पूछिस – का तैं ये मन ला कांदी – पानी नइ दे हस ?
– कांदी दे बर आय रेहेंव त छन्नू मोर गोड़ ल खूंद दीस। सुनंदा छन्नू के शिकायत करिस।
श्रीकांत उल्टा सुनंदा बर बखुलागे – तोला एक कन लगिस का, ये मन ल दिन भर भूखे रख देस। तैं बिक्कट निरदयी हस।
सुनंदा चुपचाप लहुट गे। श्रीकांत कांदी ल के डारिस। बइला मन ला खाय ल किहिस। बइला मन कलेचुप बइठे रिहिन। पानी देखइस तभो ले बइला मन कलेचुप रिहिन। श्रीकांत किहिस – जब तक तुमन नइ खाहू, महूं नइ खावौं।
मन्नू , छन्नू कोती देखिस। दूनों एक – दूसर के इशारा समझगे – देखथन, ये हर कब तक नइ खाही ?
जेवन बनगे रिहिस। सुनंदा श्रीकांत ल खाय बर हांका दीस। श्रीकांत चु्प्पे रिहिस। छन्नू – मन्नू ह श्रीकांत के प्रतिज्ञा सा साकार होत देखिन। एक दूसर संग गोठियाइन – मालिक हमर मन संग बिक्कट पियार करथे। हमन ल खा लेना चाही। छन्नू – मन्नू कांदी खाये लगिन। श्रीकांत खुश होके खाये बर चल दीस।
एक दिन अमित अइस। कहिस – श्रीकांत, तैं इहां हाथ म हाथ धरे बइठे हस। ओ डहर बजरंगपुर म बइला दउंड़ हावै। उहां छन्नू – मन्नू ल ले चल।
– बजरंगपुर म पहलवान – पहलवान बइला आथे। उहां येमन हार जाही त मोर नाक कटा जाही।
आवाज छन्नू – मन्नू मेर पहुचिस। ओमन ल श्रीकांत के शंका ऊपर गुस्सा अइस। ओमन हुंकार भरिन। भुइंया ल खुर म खुरचिन, मुड़ ल जोर से हिलइन। अमित किहिस – श्रीकांत, तैं पीछू हटत हस। तोर बइला मन दउड़ बर तियार दिखत हावय।
श्रीकांत ल बइला मन ऊपर बिसवास होगे। ओहर ओमन ल बजरंगपुर लेगे। दउड़ शुरु होइस। सुसरी बाजते सांठ बइला मालिक बइला मन ल दउड़ाय लगिन।
छन्नू – मन्नू दूसर बइला जोड़़ी मन ले बिक्कट पिछवागे रिहिन। श्रीकांत ल गुस्सा अइस। किहिस – आखिर, तुमन मोर नाक ल कटवा देव न ?
मन्नू – छन्नू ल आंखी मारिस। दूनों के चाल बाढग़े। श्रीकांत घसिटाय लगीस। ओकर हाथ ले कांसरा छूटगे। छन्नू – मन्नू तय ठीहा म सब ले पहिली पहुंचगे। अमित श्रीकांत ल किहिस – श्रीकांत, तोला बइला मन म बिसवास नइ रिहिस। ये मन अव्वल आय हावय। चल, मोला मिठई खवा।
श्रीकांत मुसका दिस।
दिन – महीना – साल सरकिन। छन्नू – मन्नू ल श्रीकांत के घर आय दस बरस होगे। ऊंकर पसली मांस ले ऊपर झांके लगे रिहिस। आंखी धंसगे रिहिस। श्रीकांत नवा बइला जोड़ी ले के चक्कर म रिहिस। फेर किसान अरुण के कहे मन ओहर टेक्टर ले अइस।
अब खेत के जोताई, फसल के मिंजाई अउ सामान के ढुलाई टेक्टर से होय लगिस। छन्नू – मन्नू ल एक कोठा म छोड़ दे गीस। उहां मरत ल गंदगी रहय।
छन्नू – मन्नू गंदगी के बीच म रिहन। ऊंकर तन भर चिखला लगे रिहिस। पूंछी म माटी के लोंदा बंधागे। पूंछी हलाय म ओमन ल पीरा होत रिहस। महीना बीतगे, ओमन ल नहवाय नइगे रिहिस। ऊंकर तन भर किन्नी छाता बना डारिन।
छन्नू – मन्नू देखय – जउन पइसा के खर्चा उंकर दानापानी बर होय, ओला टेक्टर के डीजल बर करत हावय, ऊंकर रोग खतम करे म जेन पइसा डाक्टर ल देय जाय ओला मिस्त्री ल दे जाथे। जउन मालिक दिन – रात ऊंकर सेवा करै ओहर टेक्टर के पीछू भागत रहिथे।
मन्नू की जीभ करिया गे रिहिस। ओला तडक़फांस के रोग हो गे रिहिस। ओहर खान पीयन नइ सकत रिहिस। भूख म ओहर मरे असन पड़े राहय। छन्नू ओला चांटत राहय। एक दिन मन्नू के परान छूटगे। मन्नू के मरे तन ल गांव वाले मन द्वारा बड़ निर्ममता पूर्वक खींच के कोठा ले निकाले गीस। देख के छन्नू के आत्मा कलपगे।
मन्नू के संग बिताये दिन छन्नू ल पगला असन बना दीस। ओहर घेरी बेरी उठै – बइठै। कभू मोहाटी मेर आय त कभू कोंटा म खड़े रहय। ओकर कोठा म अपने संग लड़त रिहिस।
श्रीकांत मन्नू के मरे तन ल गांव के बाहर छोड़ के अइस। किहिस – सुनंदा, ए सुनंदा …।
सुनंदा आवाज सुन के अइस। पूछिस – काबर चिल्लावत हौ।
– अरे सुन तो, ये देख मन्नू के बदला म दू जोड़ी मोला जुता मिलिस।
श्रीकांत के बात सुन के छन्नू ल खुशी होइस के चलो मरे के बाद भी हम ककरो काम आथन ….।
गांव म कालू आय रिहिस। ओहर बुढ़वा – बीमार अउ अपंग जानवर मन ल ले के दूसर जघा दू पइसा कमा के बेच दे। श्रीकांत सोचिस – छन्नू ल घर म रखे से फायदा का, ओला बेच देथौं।
श्रीकांत, कालू ल बला लइस। कालू छन्नू ल देखिस। किहिस – ये एक हजार के लाइक हे। समझे मंय मरे ल लेवत हौं।
– कालू, तैं पानी के मोल तो झन मांग। श्रीकांत किहिस। मोल भाव होइस अउ चउदा सौ रुपिया म सौदा होगे।
कालू बइठे छन्नू ल लउठी का कोचक – कोचक के उठाना चाहिस पर छन्नू टस के मस नइ होइस। कालू ओकर गला म मोटा रस्सी बांध दीस अउ जोरदार खींचिस तभो ले छन्नू इंच भर नइ खींचाइस। गुस्सा के कालू लउठी ल घुमा के छन्नू ल मारना चाहिस के श्रीकांत के आंखी के आगू म छन्नू – मन्नू के संग बिताये दिन घुमगे। श्रीकांत ल लगिस के ओहर अपन बुढ़वा ददा ल कसाई के हाथ बेंचत हावय। ओहर कालू ल किहिस – कालू, तैं छन्नू ल झन मार …। मैं छन्नू ल नइ बेंचव …।
कालू के ऊपर उठे हाथ धीरे से नीचे आगे। श्रीकांत ओकर हाथ म पइसा ल धरात किहिस – ये रख तोर पइसा ल …। अउ चलते बन। कालू अकबकाय श्रीकांत ल देखते रहिगे अउ श्रीकांत छन्नू कोती अपन पांव ल बढ़ा दीस …।

सुरेश सर्वेद
राजनांदगांव छ.ग.

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