जइसे उनखर दिन फिरिस

Somnath Yadavआज के बैवस्था ल देख ले गुस्साये मय बडबड़ात रहेव तभे मुस्टी आगे, कइथे का होगे म? कुछु नई मुस्टी, सासन, परसासन के बवस्था ल देख के गुस्ता आत हे। बात करत बीच म रोक के मुस्टी ह मोला कइथे, तय ह गुस्सा झन हो बल्कि सान्तचीत हो के मोर बात ल सुन। मय ह एक किस्सा सुनात हव। एक राजा रहीस । राजा के चार लईका रहीस। रानी कई ठीक रहीस। पर बड़की रानी ह अन्य सबों रानी के लईका मन ल जहर दे के मार दे रहीस। अउ ये बात ले राजा ह बड़ खुश रहीस। काहे के वो ह नीतिवान। रहीस अउ जानत रहीस के चाणक्य ह आदेस करे रहीस। राजा अपन लईका मन ल भेड़िया समझौ। बड़की रानी के चारो लईका बड़े होगे अऊ राज गद्दी म बैठे बर रानी दाई लंग जिद्दी करे लगिन। एक दिन राजा ह चारो टूरा ल अपन पास बुला के कहिस, मय अब बुढ़ुवा हो गे हव। अब राज पाठ ल चलाना मुश्किल होवत हे। फेर कैसे करों एक गद्दी के अऊ तुमन झन हव। कैसे बइठ पाहौ, चारो बइठ भी जाहौ तब धक्का मुक्की होही अऊ गिर जाहौ। एखर ले अच्छा हे के तुमन के मय परीक्छा ले लेत हव। चारो झन राज के बाहर जाऔ, एक साल बाद वापस आहू तब मय ह देखहूं के कउन राजकुमार ह कतका धन कमाइस अऊ वो म कतका दिमाग लगाइस। जऊन राजकुमार सबले अच्छा हो ही वो ल राज गद्दी दे दुहूं। जो आज्ञा – कहिके राजा ददा के बेमन ढंग ले गोड़ छू ले बाहर रेंग दीन। दुसर राज म पहुंच के चारो राजकुमार चार रास्ता पकड़ीन अउ अपन किस्मत अजमाये निकल पड़ीन।
ठीक एक साल बाद राज भवन म चारो राजकुमार खड़े हो गईन। राज सिंहासन म राजा साहब बैठे रहीस । राज भवन के चारो मुड़ा मंत्रीगन, राज दरबारी मन बैइठे रहीन। राजा ह कहीस, राजकुमारी, मय सोचत रहेव के तुमन आपस म लड़ भीड़ डाले होहू अऊ कोनो एकाच ही वापस आहू पर चारों झन ल देख के बड़ आस्चर्य होत हे। चलव कोई बात नई हे – ये बताव के तुमन एक साल म कतका धन कमाया अउ कतका योग्यता हासिल कर पाया?
बड़का राजकुमार हाथ जोर के बोलिस – राजा ददा मय दूसर राज म पहुंचेव तब मय विचार करेव के राजा बने बर ईमानदारी अऊ परिसरम बहुत जरूरी हे। ऐखर ल मय ह एक सेठ के यहां बोरा ढोय के काम करे लगेव। एक साल म ईमानदारी ले सौ सोना के मोहर कमाये हव। ईमानदारी अउ परिसरम ले काम किये हव। ऐखर ले मय राज गद्दी म बइठे के अधिकारी हव। राजभवन म सन्नाटा छा गिस। राजा ह बड़े मंझला राजकुमार ल बलाईस। बड़े मंझला राजकुमार ल बताईस। राजा ददा, मय राज ले निकल के सोचेव, मय छत्रिय हव – छत्रिय बलसाली होथे ऐखर ले मय ह डाकूमन के गिरोह म शामिल हो गेव। अउ लूटमार करे लागेव। मोर ये धंधा खूब चले लगिस। बड़का भईया ह जहां काम बूता करत रहीस वो सेठ के यहां घलौव डाका डाले रहेव। एक साल म दस हजार सोना के मोहर हे मोर संग । मय सोच थव के एक राजा ल साहसी अऊ लूटेरा होना चाहिए। तभे वो हर राज के बिकास कर सकत हे। ऐखर ले ह ही ईमानदारी के हकदार हव। दस हजार सोना के मोहर सुनते ही दरबारी मन के आंख फटे रह गे। राजा ह छोटे मंझला राजकुमार ल आंख ले इसारा करथे। राजा ददा, मय दूसर राज म जाके व्यापार करेव। राजधानी म मोर बहुत बड़े दुकान रहीस। मय घी म तेल अउ सक्कर म बालू मिला के बेचत रहेव। राजा ले लेके जनता तक सब्बो ल साल भर घी शक्कर खिलावेय। राज के अफसर मन ल घूस समय म दे देत रहेव ओखर कारन मोला पकड़त भी नई रहीन। राजा ददा, बड़े भईया जऊन सेठ के यहां काम करत रहीस वो घलौव मोर मिलावटी माल खात रहीस। अउ बड़े मंझला डाकू भईया ल भी मिलावट वाला घी शक्कर मय ही खवाये हव। मोर कहना हे, के राजा ल बेईमान अऊ धूर्त होना चाहिए। तभे ही राजपाठ चल सकथे। मय ह एक साल म बीस हजार सोना के मोहर कमाये हव। सब्बो दरबारी मुंह फाड़े देखते रईगे। राजा ह अब छोटे राजकुमार ल बुलाईस। छोटे राजकुमार के पहिनावा अलगे रहीस। हो व सरीर म सादा मोटा कपड़ा पहीने रहीस। थोड़-थोड़ स्वामी महराज जैसे दिखत रहीस। छोटे राजकुमार बोलिस, राजा ददा, मय जब दूसर राज म पहुंचेव तब पहिली तो मोला कुछु नई सुजिस कई दिन तक भूखे प्यासे भटकत रहेव। भटकत-भटकत एक दिन एक बड़े कन भवन दिखाई दिस। लिखाये रहीस सेवा आसरम। मय भीतर गैव तब वहां के सान सौकत देख के दंग रहीगै। लगत रहीस के राज भवन म आ गय हो। वहां चार पांच मनखे मन बेइठे रहीस अउ सोना के मोहर मन ल गिनत रह। मय उनखर लंग पूछेव भइया तुम्हार धन्धा का ये? वो म ले एक जन बोलिस, त्याग अऊ सेवा, मय कहेव, भाई मन त्याग अऊ सेवा तब धरम ऐ। ये धन्धा कैइसे होइस वो मनखे मन चिढ़गे बोलिस तोर समझ म नई आही भाग यहां ले। सोना देख के मोर लालच बढ़ गे रहीस। मय पूछेव, भाई मन एतका सोना कैसे पायेंव?
वो फिर गुस्सा करिस अउ बोलिस, सेवा अउ त्याग। तय का बहरा हस? वो मन के बीच बईठे एक मनखे ल मोर पर दया आ गे। वो ह कहीस। तय का चाहत हस? मय कहेव, महु धन्धा सीखना चाहत हव। वो मनखे ह कहिस, तय हमार सेवा आसरम म भरती हो जा। बहुत जल्दी तोला सेवा अउ त्याग के धंधा ल सीखा देबो। ओखर बदला म हमन ल कुछू नई चाहिए। बस तोर जब धन्धा चले लगही तब तय ह अपन सद्धा अनुसार गुरु दकसिना दे देबे। राजा ददा, मय सेवा आसरम म सामिल हो गयव। उहां मोला सबे परकार के आराम रहीस, बने-बने खाना कपड़ा बड़ ठाठ बाठ रहीस मोर उहां। कुछ दिन बाद जहां के बड़का स्वामी महराज मोला बुलाइस अऊ कहिस, बेटा तय सब कला ल सीख गय हस। भगवान के नाम ल ले अऊ काम चालू कर दे। वो हर मोला सादा मोटा कपड़ा दिस अऊ कहिस, ए ल पहिन ले। बाहर कोती यही कपड़ा ह तोर रक्छा करही। बस, मय वही दिन ले मनखे सेवा संघ के नाम ले अपन धंधा चालू कर दिये। सब्बो डहर परचार कर दिये के मनखे के सेवा करे के बीड़ा उठाये गे है। हमला समाज ले देस ल आगे बढ़ाना हे। गरीब मन ल, भूखे नंगा मन ल लुलुवा लंगड़ा मन ल सहायता करना है। सब्बो मनखे मन ऐइसने पुन्य के काम ल हाथ बंटावा। राजा ददा, वो देस के मनखे मन बड़ भोकवा रहीन। दान के रुप म सोना, चांदी, अनाज, कपड़ा, लत्ता, अपन हैसियत के अनुसार दे लगिन। बड़का भईया के सेठ अऊ बड़का भईया घलौव चंदा दिस। मंझला भईया ह तव सोना के मोहर अऊ अनाज घलौव दे रहीस डाकू भी ह तब मोर चेला ल सौ सोना के मोहर दे रहीस। मोर किस्सा ह खतम हो गे। जइसे उनखर दिन फिरीस वइसने दिन सब्बो के फिरै।

डा. सोमनाथ यादव
बिलासपुर

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