जइसे खाय अन्न वइसे बनही मन

अहार के मनसे के जिनगी म परभाव परथे। ईमानदारी ले कमई करके बिसाय धन ले बनाय खाय के अलगे असर परथे। ये असर हमला दिखय नहीं, फेर जेखर जिनगी तप के परभाव ले सुग्घर हो गे हे उंकर म एक परभाव तुरते दिखथे। एला समझे खातिर वृन्दावन के एक ठन किस्सा बतावत हंव बिचार करिहा।
उहां के मंदिर म एक झन महात्मा रहत रहंय। एक रात के उन सुते रहिन। एकाएक उंकर मन म भगवान के गहना-गूठा ल चोराय के बिचार उठे लागिस। फेर का कथस मन के कहना ल घलो नि विचारिस अउ भगवान के गहना समेट के छू मंतर होगे।
रात पहागे। नदिया तीर पहुंचे रहय। रोजमर्रा के बूता ल निपटा के नहाइस धोइस त वोला अपन करनी ऊपर पछतावा होय लागिस। वो- ह वापिस मंदिर डहर लहुटगे। मंदिर म पहुंच के उहां के मंहत ल जे करे रहय तेला बकर दिस अउ भगवान के गहना ल दे दिस।
मंदिर के महंत घामा बड़े भारी संत रहिन। अपन मन म अइसना घटना काबर होइस तेला बिचारिन अउ वो महात्मा करा पूछिन के काल रात के खाना के बारे म पूछिन। जे चोरी करके भागे रहय ते महात्मा ह बताइस, काली के खाना मंदिर के भंडारा म खाय रिहिस।
महंत ह भंडारा म दान करइया सेठ ल बला के पूछिस के ‘ते ह भंडारा कराय बर दान कइसे करे?’ सेठ ह बताइस के महंत जी, चोरी के गहना बिसाय रहेंव तेमा बहुत फायदा होइस। त मंदिर म दान कर देंवव कहिके उही रुपिया ल भंडारा कराय बर दे रहेंव। महंत जी समझगे के अन्न के सूक्ष्म परभाव कइसे परथे। गलत रूप ले कमाय धन ल दान करे म असुभ फल मिलथे अउ लोक परलोक दूनो बिगड़थे।
न्यायोपार्जितेनैव द्रव्येण सुकृतं कृत्तम।
न कीर्तिरिहलोकेच परलोकेच तत्फलम्॥-देवीभागवत
राघवेन्द्र अग्रवाल
खैरघटा वाले
बलौदाबाजार

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