जरत रइथौं (गजल)

रइहीं तरिया म मनखे, पानी आबे,
अमुआ डारी म बइठे जोहत रइहौं।

घर म सुरता भुलाये, बइठे रहिबे,
कोला बारी म मैंहा, ताकत रइहौं।

बिना चिंता फिकर तैं, सोये रहिबे,
बनके पहरी मैं, पहरा देवत रइहौं।

तैंहा बनके बदरिया, बरसत रहिबे,
मैं पियासे,पानी बर, तरसत रइहौं।

मोर आघू म दूसर लंग हंसत रहिबे,
घूंट पी पी के मैंहा रोवत रइहौं।

दिया बाती बन तैंहा बरत रहिबे,
मैंहा बन के पतंगा जरत रइहौं।

मनोहर दास मानिकपुरी

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