झांझ – झोला

आगी कस अंगरा, दहकय रे मंझनिया ।
धूकनी कस धूकथे, संझा का बिहनिया ।।
हरके बरजे कस, पाना नई खरके ।
आंखी तरेंरे जब, कडके मंझनिया ।।
आगी कस अंगरा …………………

टूकूर – टूकूर देखे, नवा – नवा बहुरिया ।
भुकूर – भुकूर लागे, धनी मोर लहरिया ।।
आगी कस अंगरा …………………

चूह चुहागे पछीना, सरी अंग अंगिया ।
जरे घाम भोंभरा, ऐ…ओ परनिया ।।
आगी कस अंगरा …………………

पियासे हे तन – मन लेवई अउ चिरईया ।
डोंगरी पहाड अउ गांव का सहरिया ।।
आगी कस अंगरा …………………

झांझ झोला बरसे, आगी के गोला ।
कहां लुकाबो रे, नई बाचे चोला ।।
सांय – सांय करे अमरईया ।
आगी कस अंगरा, दहकय रे मंझनिया ।
धूकनी कस धूकथे, संझा का बिहनिया ।।

रामकुमार साहू ‘‘मयारू’’
ग्राम – गिर्रा (पलारी)
मो.नं. 98261 98219

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8 comments

  • Dr.Anil Bhatpahari

    garmi ke sughghar chitran karehav mayaru bhai banech maya kart rahav au aani bani ke kavittlikhtech rahav….9617777514

  • sarala sharma

    Laklakat gham ma jood chhawn kas lagis he kavita la parh ke, aapke kalam chalat rahay, hum chhawn
    Ma judawat rahibo.

  • जेठ के महीना के बड सुघ्घ्रर वर्णन करे हव ,बड निक लागिस अइसने अउ सुघ्घ्रर कविता के अगोरा म

  • Subhash Kurre

    संपादक जी जय जोहार
    मै हा एक ठन (क कहिथे नई जानव) भेजत हंवव ।
    एकर पूरा कहानी के आसा हे आप मनसे ।
    ” जस करनी जस करम गति, जस पूरबल के भाग ।
    जम्मू तो वैसे बोले तूम कस बोले काग ।।
    सुभाष कुर्रे दल्ली राजहरा
    बालोद

  • Subhash Kurre

    जेठ टोनहा
    कवित भाई दादूलाल जोशी “फरहद ” जी के “कुछ पंक्ति …..
    जेठ टोनहा, रंग सोनहा,
    भुईंया म दरार फाड़े हे चारो खूट उजियारे हे …….
    झेंगुरा धोखिया, झांज परलोखिया
    कईसन कनझट पारे हे…… चारो….
    करिया बादर एकमन आगर
    कोजनी काबर कति डहर मुखला टारे हे….चारो खूट …..
    जरत भोंभरा पलपला मा कांदा डारे हे … चारो खूट उजियारे हे. ,.
    सं सुभाष कुर्रे ……

  • शकुन्तला शर्मा

    रामकुमार भाई ! बढिया कविता लिखे हावस ग ! तोर कविता ल पढ के , एसी म बइठे हन तिहां
    घाम लागे लागिस हे । सम्यक अउ सटीक शब्द संयोजन । मजा आ गे ।

  • ram kumar sahu mayaru

    dhanvad didi jee utsahvardhan bar

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