टेंकहा बेंगवा

लोक कथा
दाई बपरी करम छड़ही कस औंट के रहिगे। सोचिस बेटा तो मोर केहे के उल्टा करथे, मोला डोंगरी ऊपर अपन माटी गती कराना हे, त नदिया मं पाटे बर केहे लागही। अइसे विचार के चेतईस देख बेटा मरहू ताहन नदिया मं पाटबे न।
नान्हे बेंगचुल (मेंचला) मूंगा कस चििचिकी हरियर राहय। पिला बकेना, बछरू बेंदरा, अऊ सबे जीव परानी के लइकई रुवाप मन मोहना होथे। तसने बहू राहय। घात उदबिरीस अऊ टेंकहा। महतारी के बरजना ओकर बर अऊ टेचराही देखाय के ओखी राहय। दाई कहाय- देख बेटा, अभी लइका हस, डोंगरी ऊपर झिन जाय कर, नदिया तीर खेले कर। फेर बेंगचुल उसर, पुसर के डोंगरी चढ़य। दाई जिसन काहय ओकर उलटाच करय अऊ मने मन बुकबुकाय।
दिन, महिना बीतत गीस, हरियर में चकाके टेंकहा चाल घला भोगात गीस। महतारी बपरी, ओकर रंग ढंग ल देख के, भतरे भतर गुंगवाय, संसों करंय, सूतत जागत ओकरे बर गुनत राहय। ये झगराहा, टेचराहा, पोक्खो चेलिक होगे। बरकस देहें… पांव देखके, ओकर जंहुरिया मन दखल जाथें, फेर हरके-बरजे ला माने नहीं। सेठरा पर गेय हे। कइसे जींही खाही… महतारी संसों मन धुनाके सिनसिनाही हो गिस। अजार संचरगे। एक बेर घातेज मया करके बुढ़ी दाई कथे, जोरहा टर्रम-टर्रम गीद गाके सुना दे बेटा, मन थिराही मेंचका धीरे कुन गा दीस।
दाई बपरी, करम छंड़ही कस औंट के रहिगे। सोचिस बेटा तो मोर केहे के उल्टा करथे, मोला डोंगरी ऊपर अपन माटी-गती कराना हे, त नदिया मं पाटे बर केहे लागही। अइसे बिचार के चेतईस, देख बेटा, मरहूं ताहन नदिया मं पाट बे न… अऊ थोरेच दिन मं डोकरी मर गे। दई के मरे ले बेंगवा ला भारी धक्का पहुंचिस। पछताईस उम्मर भर दाई के एकोठन बात नी मानेंव। नीचट अधरमी होथों। दाई के छेदाती बाचा ल नई टारों। अइसे हर गुन के वोहा दाई ला नदिया मं पाटिस।
अब वो बेंगवा, सुधर गीस। संहराय के लईक बनगे, अपन महतारी ला सुरर के सुरता करय। ओकर मठ के सोरा जतन करे। फेर ओला फिकर हमाय राहय- जे दिन बरसा होही, नदिया मं पूरा आही, ताहन दाई के मठ तो बोहा जाही, दिन रात गुनय-धुनय, मठ कइसे बांचय। बरसा होय, ताहन ओकर मन बोंबिया जावय अऊ जोर जोर से टर्रम टर्रम टर्र… टर्र… करय। तीही चलन आज ले चलत हे। पानी बरसथे, त ओकरे बिस्तार बेंगवा मन कल्हर कल्हर के चिचियाथे- टर्रम टर्रम- टर्र… टर्र…।

येहा कोनो उड़ान छू गोठ नोहय रे भई आय नी हीं?

किसान दीवान
पो. नर्रा (बागबाहरा)
जिला- महासमुन्द (छ.ग.)

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